तुलसीदास

और अधिकसूर्यकांत त्रिपाठी निराला

     

    एक

    भारत के नभ का प्रभापूर्य
    शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य
    अस्तमित आज रे–तमस्तूर्य दिङ्मंडल;
    उर के आसन पर शिरस्त्राण
    शासन करते हैं मुसलमान;
    है ऊर्मिल जल, निश्चलत्प्राण पर शतदल।

    दो

    शत-शत शब्दों का सांध्य काल
    यह आकुंचित भ्रू कुटिल-भाल
    छाया अंबर पर जलद-जाल ज्यों दुस्तर;
    आया पहले पंजाब प्रांत,
    कोशल-बिहार तदनंत क्रांत,
    क्रमशः प्रदेश सब हुए भ्रांत, घिर-घिरकर।

    तीन

    मोगल-दल बल के जलद-यान,
    दर्पित-पद उन्मद-नद पठान
    है बहा रहे दिग्देशज्ञान, शर-खरतर,
    छाया ऊपर घन-अंधकार—
    टूटता वज्र दह दुर्निवार,
    नीचे प्लावन की प्रलय-धार, ध्वनि हर-हर।

    चार

    रिपु के समक्ष जो था प्रचंड
    आतप ज्यों तम पर करोद्दंड;
    निश्चल अब वही बुंदेलखंड, आभा गत,
    निःशेष सुरभि, कुरबक-समान
    संलग्न वृंत पर, चिंत्य प्राण,
    बीता उत्सव ज्यों, चिह्न म्लान; छाया श्लथ।

    पाँच

    वीरों का गढ़, वह कालिंजर,
    सिंहों के लिए आज पिंजर;
    नर हैं भीतर, बाहर किन्नर-गण गाते;
    पीकर ज्यों प्राणों का आसव
    देखा असुरों ने दैहिक दव,
    बंधन में फँस आत्मा-बांधव दु:ख पाते।

    छह

    लड़-लड़ जो रण बाँकुरे समर
    हो शयित देश की पृथ्वी पर,
    अक्षर, निर्जर, दुर्धर्ष, अमर, जगतारण
    भारत के उर के राजपूत,
    उड़ गए आज वे देवदूत, 
    जो रहे शेष, नृपवेश सूत—बंदीगण। 

    सात

    यों, मोगल-पद-तल प्रथम तूर्ण
    संबद्ध देश-बल चूर्ण-चूर्ण;
    इसलाम-कलाओं से प्रपूर्ण जन-जनपद;
    संचित जीवन की क्षिप्रधार,
    इसलाम—सागराभिमुखऽपार,
    बहतीं नदियाँ, नद; जन-जन हार वशवद।

    आठ

    अब, धौत धरा, खिल गया गगन,
    उर-उर को मधुर, तापप्रशमन
    बहती समीर, चिर-आलिंगन ज्यों उन्मन।
    झरते हैं शशधर से क्षण-क्षण
    पृथ्वी के अधरों पर निःस्वन
    ज्योतिर्मय प्राणों के चुंबन, संजीवन!

    नौ

    भूला दु:ख, अब सुख-स्वरित जाल
    फैला—यह केवल-कल्प काल—
    कामिनी-कुमुद-कर-कलित ताल पर चलता;
    प्राणों की छवि मृदु-मंद-स्पंद,
    लघु-गति, नियमित-पद, ललित-छंद;
    होगा कोई, जो निरानंद, कर मलता।

    दस

    सोचता कहाँ रे, किधर कूल
    बहता तरंग का प्रमुद फूल?
    यों इस प्रवाह में देश मूल खो बहता;
    'छल-छल-छल' कहता यद्यपि जल,
    वह मंत्र मुग्ध सुनता 'कल-कल';
    निष्क्रिय; शोभा-प्रिय कूलोपल ज्यों रहता।

    ग्यारह

    पड़ते हैं जो दिल्ली-पथ पर
    यमुना के तट के श्रेष्ठ नगर,
    वे हैं समृद्धि की दूर-प्रसर माया में;
    यह एक उन्हीं में राजापुर,
    है पूर्ण, कुशल, व्यवसाय-प्रचुर,
    ज्योतिश्चुंबिनी कलश-मधु-उर छाया में।

    बारह

    युवकों में प्रमुख रत्न-चेतन
    समधीत-शास्त्रा-काव्यालोचन
    जो, तुलसीदास, वही ब्राह्मण-कुल-दीपक;
    आयत-दृग, पुष्ट-देह, गत-भय,
    अपने प्रकाश में निःसंशय
    प्रतिभा का मंद-स्मित परिचय, संस्मारक।

    तेरह

    नीली उस यमुना के तट पर
    राजापुर का नागरिक मुखर
    क्रीड़ितवय-विद्याध्ययनांतर है संस्थित;
    प्रियजन को जीवन चारु, चपल 
    जल की शोभा का-सा उत्पल,
    सौरभोत्कलित अंबर-तल, स्थल-स्थल, दिक-दिक।

    चौदह

    एक दिन, सखागण संग, पास,
    चल चित्रकूटगिरि, सहोच्छ्वास,
    देखा पावन वन, नव प्रकाश मन आया;
    वह भाषा-छिपती छवि सुंदर
    कुछ खुलती आभा में रँग कर,
    वह भाव कुरल-कुहरे-सा भरकर भाया।

    पंद्रह

    केवल विस्मित मन, चिंत्य नयन;
    परिचित कुछ, भूला ज्यों प्रियजन—
    ज्यों दूर दृष्टि की धूमिल-तन तट-रेखा,
    हो मध्य तरंगोकुल सागर,
    निःशब्द स्वप्नसंस्कारागर;
    जल में अस्फुट छवि छायाधर, यों देखा।

    सोलह

    तरु-तरु वीरुध्-वीरुध् तृण-तृण
    जाने क्या हँसते मसृण-मसृण,
    जैसे प्राणों से हुए उऋण, कुछ लखकर;
    भर लेने को उर में, अथाह,
    बाँहों में फैलाया उछाह;
    गिनते थे दिन, अब सफल-चाह पल रखकर।

    सत्रह

    कहता प्रति जड़, “जंगम-जीवन!
    भूले थे अब तक बंधु, प्रमन?
    यह हताश्वास मन भार श्वास भर बहता;
    तुम रहे छोड़ गृह मेरे कवि,
    देखो यह धूलि-धूसरित छवि,
    छाया इस पर केवल जड़ रवि खर दहता।''

    अठारह

    “हनती आँखों की ज्वाला चल,
    पाषाण-खंड रहता जल-जल,
    ऋतु सभी प्रबलतर बदल-बदलकर आते;
    वर्षा में पंक-प्रवाहित सरि,
    है शीर्ण-काय-कारण हिम अरि;
    केवल दुख देकर उदरंभरि जन जाते।''

    उन्नीस

    फिर असुरों से होती क्षण-क्षण
    स्मृति की पृथ्वी यह, दलित-चरण;
    वे सुप्त भाव, गुप्ताभूषण अब हैं सब;
    इस जग के मग के मुक्त-प्राण!
    गाओ—विहंग!—सद्ध्वनित गान,
    त्यागोज्जीवित, वह ऊर्ध्व ध्यान, धारा-स्तव।''

    बीस

    “लो चढ़ा तार—लो चढ़ा तार,
    पाषाण-खंड ये, करो हार,
    दे स्पर्श अहल्योद्धार-सार उस जग का;
    अन्यथा यहाँ क्या? अंधकार,
    बंधुर पथ, पंकिल सरि, कगार,
    झरने, झाड़ी, कंटक; विहार पशु-खग का!''

    इक्कीस

    “अब स्मर के शर-केशर से झर
    रँगती रज-रज पृथ्वी, अंबर;
    छाया उससे प्रतिमानस-सर शोभाकर;
    छिप रहे उसी से वे प्रियतम
    छवि के निश्छल देवता परम;
    जागरणोपम यह सुप्ति-विरम भ्रम, भ्रम भर।''

    बाईस

    बहकर समीर ज्यों पुष्पाकुल
    वन को कर जाती है व्याकुल,
    हो गया चित्त कवि का त्यों तुलकर उन्मन;
    वह उस शाखा का वन-विहंग
    उड़ गया मुक्त नभ निस्तरंग
    छोड़ता रंग पर रंग—रंग पर जीवन।

    तेईस

    दूर, दूरतर, दूरतम, शेष
    कर रहा पार मन नभोदेश,
    सजता सुवेश, फिर-फिर सुवेश जीवन पर,
    छोड़ता रंग, फिर-फिर सँवार
    उड़ती तरंग ऊपर अपार
    संध्या ज्योति : ज्यों सुविस्तार अंबर तर।

    चौबीस

    उस मानस ऊर्ध्व देश में भी
    ज्यों राहु-ग्रस्त आभा रवि की
    देखी कवि ने छवि छाया-सी, भरती-सी—
    भारत का सम्यक् देशकाल;
    खिंचता जैसे तम-शेष जाल,
    खींचती, वृहत् से अंतराल करती-सी।

    पच्चीस

    बंध भिन्न-भिन्न भावों के दल
    क्षुद्र से क्षुद्रतर, हुए विकल;
    पूजा में भी प्रतिरोध-अनल है जलता;
    हो रहा भस्म अपना जीवन,
    चेतना-हीन फिर भी चेतन;
    अपने ही मन को यों प्रति मन है छलता।

    छब्बीस

    इसने ही जैसे बार-बार
    दूसरी शक्ति की की पुकार—
    साकार हुआ ज्यों निराकार, जीवन में;
    यह उसी शक्ति से है वलयित
    चित देश-काल का सम्यक् जित,
    ऋतु का प्रभाव जैसे संचित तरु-तन में!

    सत्ताईस

    विधि की इच्छा सर्वत्र अटल;
    यह देश प्रथम ही था हत-बल;
    वे टूट चुके थे ठाट सकल वर्णों के;
    तृष्णोद्धत, स्पर्धागत, सगर्व
    क्षत्रिय रक्षा से रहित सर्व;
    द्विज चाटुकार; हत इतर वर्ग पर्णों के।

    अट्ठाईस

    चलते-फिरते पर निस्सहाय,
    वे दीन, क्षीण कंकालकाय;
    आशा-केवल जीवनोपाय उर-उर में;
    रण के अश्वों से शस्य सकल
    दलमल जाते ज्यों, दल से दल
    शूद्रगण क्षुद्र-जीवन-संबल, पुर-पुर में।

    उनतीस

    वे शेष-श्वास, पशु, मूक-भाष,
    पाते प्रहार अब हताश्वास;
    सोचते कभी, आजन्म ग्रास द्विजगण के
    होना ही उनका धर्म परम,
    वे वर्णाधम, रे द्विज उत्तम,
    वे चरण—चरण बस, वर्णाश्रम—रक्षण के।

    तीस

    रक्खा उन पर गुरु-भार, विषम
    जो पहला पद, अब मद-विष-सम,
    द्विज लोगों पर इस्लाम-क्षम वह छाया,
    जो देश-काल को आवृत कर
    फैली है सूक्ष्म मनोनभ पर,
    देखी कवि ने समझा अब—वर, क्या माया।

    इकतीस

    इस छाया के भीतर हैं सब,
    है बँधा हुआ सारा कलरव,
    भूले सब इस तम का आसव पी-पीकर।
    इसके भीतर रह देश-काल
    हो सकेगा न रे मुक्त-भाल,
    पहले का-सा उन्नत विशाल ज्योतिःसर।

    बत्तीस

    दीनों की भी दुर्बल पुकार
    कर सकती नहीं कदापि पार
    पार्थिवैश्वर्य का अंधकार पीड़ाकर,
    जब तक कांक्षाओं के प्रहार
    अपने साधन को बार-बार
    होंगे भारत पर इस प्रकार तृष्णापर।

    तैंतीस

    सोचा कवि ने, मानस-तरंग,
    यह भारत-संस्कृति पर सभंग
    फैली जो, लेती संग-संग, जन-गण को;
    इस अनिल-वाह के पार प्रखर
    किरणों का वह ज्योतिर्मय घर,
    रविकुल-जीवन-चुंबनकर मानस-धन जो।

    चौंतीस

    है वही मुक्ति का सत्य रूप,
    यह कूप-कूप भव-अंध कूप; 
    वह रंक, यहाँ जो हुआ भूप, निश्चय रे।
    चाहिए उसे और भी और,
    फिर साधारण को कहाँ ठौर?
    जीवन के, जग के, यही तौर हैं जय के।

    पैंतीस

    करना होगा यह तिमिर पार—
    देखना सत्य का मिहिर-द्वार—
    बहना जीवन के प्रखर ज्वार में निश्चय—
    लड़ना विरोध से द्वंद्व-समर,
    रह सत्य-मार्ग पर स्थिर निर्भर—
    जाना, भिन्न भी देह, निज घर निःसंशय।

    छत्तीस

    कल्मषोत्सार कवि के दुर्दम
    चेतनोर्मियों के प्राण प्रथम
    वह रुद्ध द्वार का छाया-तम तरने को—
    करने को ज्ञानोद्धत प्रहार—
    तोड़ने को विषम वज्र-द्वार;
    उमड़े, भारत का भ्रम अपार हरने को।

    सैंतीस

    उस क्षण, उस छाया के ऊपर,
    नभ-तम की-सी तारिका सुघर;
    आ पड़ी, दृष्टि में, जीवन पर, सुंदरतम
    प्रेयसी, प्राणसंगिनी, नाम
    शुभ रत्नावली-सरोज-दाम
    वामा, इस पथ पर हुई वाम सरितोपम।

    अड़तीस

    ‘जाते हो कहाँ?' तुले तिर्यक्
    दृग, पहनाकर ज्योतिर्मय स्रक्
    प्रियतम को ज्यों, बोले सम्यक् शासन से;
    फिर लिए मूँद वे पल पक्ष्मल—
    इंदीवर के-से कोश विमल;
    फिर हुई अदृश्य शक्ति पुष्कल उस तन से।

    उनतालीस

    उस ऊँचे नभ का, गुंजनपर,
    मंजुल जीवन का मन-मधुकर,
    खुलती उस दृग-छवि में बँधकर, सौरभ को
    बैठा ही था सुख से क्षण-भर,
    मुँद गए पलों के दल मृदुतर,
    रह गया उसी उर के भीतर, अक्षम हो।

    चालीस

    उसके अदृश्य होते ही रे,
    उतरा वह मन धीरे-धीरे,
    केशर-रज-कण अब हैं हीरे—पर्वतचय;
    यह वही प्रकृति पर रूप अन्य;
    जगमग-जगमग सब वेश वन्य;
    सुरभित दिशि-दिशि, कवि हुआ धन्य, मायाशय।

    इकतालीस

    यह श्री पावन, गृहिणी उदार;
    गिरि-वर उरोज, सरि पयोधार
    कर वन-तरु, फैला फल निहारती देती,
    सब जीवों पर है एक दृष्टि,
    तृण-तृण पर उसकी सुधा-वृष्टि,
    प्रेयसी, बदलती वसन सृष्टि नव लेती।

    बयालीस

    ये जिस करके रे झंकृत स्वर
    गूँजते हुए इतने सुखकर,
    खुलते, खोलते प्राण के स्तर भर जाते;
    व्याकुल आलिंगन को, दुस्तर,
    रागिनी की लहर, गिरि-वन-सर
    तरती; जो ध्वनित, भाव सुंदर कहलाते!

    तैंतालीस

    यों धीरे-धीरे उतर-उतर;
    आया मन निज पहली स्थिति पर;
    खोले दृग, वैसी ही प्रांतर की रेखा;
    विश्राम के लिए मित्र-प्रवर
    बैठे थे ज्यों, बैठे पथ पर;
    वह खड़ा हुआ, त्यों ही रहकर यह देखा।

    चवालीस

    फिर पंचतीर्थ को चढ़े सकल
    गिरिमाला पर, हैं प्राण चपल
    संदर्शन को, आतुर-पद चलकर पहुँचे।
    फिर कोटितीर्थ देवांगनादि
    लख सार्थक-श्रम हो विगत-व्याधि
    नग्न-पद चले, कंटक उपाधि भी, न कुँचे।

    पैंतालीस

    आए हनुमद्धारा द्रुततर,
    झरता झरना वीर पर प्रखर,
    लखकर कवि रहा भाव में भरकर क्षण-भर;
    फिर उतरे गिरि, चल किया पार 
    पथ-पयस्विनी सरि मृदुल धार; 
    स्नानांत, भजन, भोजन, विहार, गिरि-पद पर।

    छियालीस

    कामदगिरि का कर परिक्रमण
    आए जानकी-कुंड सब जन;
    फिर स्फटिकशिला, अनसूया-वन सरि-उद्गम;
    फिर भरतकूप, रह इस प्रकार,
    कुछ दिन सब जन कर वन-विहार
    लौटे निज-निज गृह हृदय धार छवि निरुपम।

    सैंतालीस

    प्रेयसी के अलक नील, व्योम;
    दृग-पल कलंक;—मुख मंजु, सोम;
    निःसृत प्रकाश जो, तरुण क्षोम प्रिय तन पर;
    पुलकित प्रतिपल मानस-चकोर
    देखता भूल दिक् उसी ओर;
    कुल इच्छाओं का वही छोर जीवन-भर।

    अड़तालीस

    जिस शुचि प्रकाश का सौर-जगत्
    रुचि-रुचि में खुला, असत् भी, सत्,
    वह बँधा हुआ है एक महत् परिचय से;
    अविनश्वर वही ज्ञान भीतर,
    बाहर भ्रम, भ्रमरों को, भास्वर;
    वह रत्नावली-सूत्रधर पर आशय से।

    उनचास

    देखता, नवल चल दीप युगल
    नयनों के, आभा के कोमल;
    प्रेयसी के, प्रणय के, निस्तल विभ्रम के,
    गृह की सीमा के स्वच्छभास—
    भीतर के, बाहर के प्रकाश,
    जीवन के, भावों के विलास, शम-दम के।

    पचास

    पर वही द्वंद्व के भी कारण,
    बंध की शृंखला के धारण,
    निर्वाण के पथिक के वारण, करुणामय;
    वे पलकों के उस पार, अर्थ
    हो सका न, वे ऐसे समर्थ;
    सारा विवाद हो गया व्यर्थ, जीवन-क्षय।

    इक्यावन

    उस प्रियावरण प्रकाश में बंध,
    सोचता, “सहज पड़ते पग सध;
    शोभा को लिए ऊर्ध्व औ’ अध घर बाहर,
    यह विश्व, सूर्य, तारक-मंडल,
    दिन, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष चपल;
    बंध गति-प्रकाश में बुद्ध सकल पूर्वापर।

    बावन

    “बंध के बिना, कह, कहाँ प्रगति?
    गति-हीन जीव को कहाँ सुरति?
    रतिरहित कहाँ सुख? केवल क्षति-केवल क्षति;
    यह क्रम-विनाश; इससे चलकर
    आता सत्वर मन निम्न उतर;
    छूटता अंत में चेतन स्तर, जाती मति।

    तिरपन

    “देखो प्रसून को वह उन्मुख!
    रंग-रेणु-गंध भर व्याकुल-सुख,
    देखता ज्योतिर्मुख; आया दु:ख-पीड़ा सह।
    चटका कलि का अवरोध सदल,
    वह शोधशक्ति, जो गंधोच्छल,
    खुल पड़ती पल-प्रकाश को, चल परिचय वह।

    चौवन

    जिस तरह गंध से बँधा फूल,
    फैलता दूर तक भी, समूल;
    अप्रतिम प्रिया से, त्यों दुकूल-प्रतिमा में
    मैं बँधा एक शुचि आलिंगन,
    आकृति में निराकार, चुंबन;
    युक्त भी मुक्त यों आजीवन, लघिमा में।

    पचपन

    सोचता कौन प्रतिहत-चेतन—
    वे नहीं प्रिया के नयन, नयन;
    वह केवल वहाँ मीन-केतन, युवती में;
    अपने वश में कर पुरुष-देश
    है उड़ा रहा ध्वज-मुक्तकेश;
    तरुणी-तनु आलंबन-विशेष, पृथ्वी में?

    छप्पन

    वह ऐसी जो अनुकूल युक्ति,
    जीव के भाव की नहीं मुक्ति,
    वह एक भुक्ति, ज्यों मिली शुक्ति से मुक्ता;
    जो ज्ञानदीप्ति, वह दूर, अजर,
    विश्व के प्राण के भी ऊपर;
    माया वह, जो जीव से सुघर संयुक्ता।

    सत्तावन

    मृत्तिका एक कर सार-ग्रहण
    खुलते रहते बहुवर्ण सुमन,
    त्यों रत्नावली-हार में बँध मन चमका,
    पाकर नयनों की ज्योति प्रखर,
    ज्यों रविकर से श्यामल जलधर,
    बहु वर्गों के भावों से भरकर दमका।

    अट्ठावन

    वह रत्नावली, नाम-शोभन
    पति-रति में प्रतनु, अतः लोभन
    अपरिचित-पुण्य अक्षय क्षोभन धन कोई;
    प्रियकरालंब को सत्य-यष्टि;
    प्रतिमा में श्रद्धा की समष्टि;
    मायायन में प्रिय-शयन व्यष्टि भर सोई;—

    उनसठ

    लखती ऊषारुण, मौन, राग,
    सोते पति से वह रही जाग;
    प्रेम के फाग में आग त्याग की तरुणा;
    प्रिय के जड़ युग कूलों को भर
    बहती ज्यों स्वगंगा सस्वर;
    नश्वरता पर अलोक-सुघर दृक्-करुणा।

    साठ

    धीरे-धीरे वह हुआ पार
    तारा-द्युति से बंध अंधकार;
    एक दिन बिदा को बंधु द्वार पर आया;
    लख रत्नावली खुली सहास;
    अवरोध-रहित बढ़ गई पास;
    बोला भाई; हँसती उदास तू छाया—

    इकसठ

    “हो गई रतन, कितनी दुर्बल;
    चिंता में बहन, गई तू गल?
    माँ, बापूजी, भाभियाँ सकल पड़ोस की
    हैं विकल देखने को सत्वर;
    सहेलियाँ सब, ताने देकर;
    कहती हैं, बेचा वर के कर, आ न सकी!

    बासठ

    तुझसे पीछे भेजी जाकर
    आईं वे कई बार नैहर;
    पर तुझे भेजते क्यों श्रीवरजी डरते?
    हम कई बार आ-आकर घर
    लौटे पाकर झूठे उत्तर;
    क्यों बहन, नहीं तू सम, उन पर बल करते?

    तिरसठ

    “आँसुओं भरी माँ दु:ख के स्वर
    बोलीं, रतन से कहो जाकर,
    क्या नहीं मोह कुछ माता पर अब तुमको?
    जामाताजी वाली ममता
    माँ से तो पाती उत्तमता।
    बोले बापू, योगी रमता मैं अब तो—

    चौंसठ

    “कुछ ही दिन को हूँ कूल-द्रुम;
    छू लूँ पद फिरे, कह देना तुम।
    बोली भाभी, लाना कुंकुम-शोभा को।
    फिर किया अनावश्यक प्रलाप,
    जिसमें जैसी स्नेह की छाप!
    पर अकथनीय करुणा-विलाप जो माँ को।

    पैंसठ

    “हम बिना तुम्हारे आए घर;
    गाँव की दृष्टि से गए उतर;
    क्यों बहन, ब्याह हो जाने पर, घर पहला
    केवल कहने को है नैहर?—
    दे सकता नहीं स्नेह-आदर?—
    पूजे पद, हम इसलिए अपर?'' उर दहला।

    छियासठ 

    उस प्रतिमा का, आया तब खुल
    मर्यादागर्भित धर्म विपुल,
    धुल अश्रु-धार से हुई अतुल छवि पावन,
    वह घेर-घेर निस्सीम गगन
    उमड़े भावों के घन पर घन,
    फैला, ढक सघन स्नेह-उपवन, यह सावन।

    सड़सठ 

    बोली वह, मृदु-गंभीर-घोष,
    मैं साथ तुम्हारे, करो तोष।
    जिस पृथ्वी से निकली सदोष वह सीता,
    अंक में उसी के आज लीन—
    निज मर्यादा पर समासीन;
    दे गई सुहद् को स्नेह-क्षीण गत गीता।

    अड़सठ

    बोला भाई, तो चलो अभी,
    अन्यथा, न होंगे सफल कभी
    हम, उनके आ जाने पर, जी यह कहता।
    जब लौटें वह, हम करें पार
    राजापुर के ये मार्ग, द्वार।
    चल दी प्रतिमा। घर अंधकार अब बहता।

    उनहत्तर

    लेते सौदा जब खड़े हाट,
    तुलसी के मन आया उचाट;
    सोचा, अबके किस घाट उतारें इनको;
    जब देखो, तब द्वार पर खड़े,
    उधार लाए हम, चल बड़े!
    दे दिया दान तो अड़े पड़े अब किनको?

    सत्तर

    सामग्री ले लौटे जब घर,
    देखा नीलम-सोपानों पर
    नभ के, चढ़ती आभा सुंदर पग धर-धर;
    श्वेत, श्याम, रक्त, पराग-पीत,
    अपने सुख से ज्यों सुमन भीत;
    गाती यमुना नृत्यपर, गीत कल-कल स्वर।

    इकहत्तर

    देखा, वह नहीं प्रिया, जीवन;
    नत-नयन भवन, विषण्ण आँगन;
    आवरण शून्य वे बिना वरण-मधुरा के
    अपहृत-श्री, सुख-स्नेह का सद्म;
    निःसुरभि, हंत, हेमंत-पद्म!
    नैतिक-नीरस, निष्प्रीति, छद्म ज्यों, पाते।

    बहत्तर

    यह नहीं आज गृह, छाया-उर,
    गीति से प्रिया की मुखर, मधुर;
    गति-नृत्य, तालशिंजित-नूपुर, चरणारुण;
    व्यंजित नयनों का भाव सघन
    भर रंजित जो करता क्षण-क्षण;
    कहता कोई मन से, उन्मन, सुन रे, सुन।

    तिहत्तर

    वह आज हो गई दूर तान,
    इसलिए मधुर वह और गान,
    सुनने को व्याकुल हुए प्राण प्रियतम के;
    छूटा जग का व्यवहार-ज्ञान,
    पग उठे उसी मग को अजान,
    कुल-मान-ध्यान श्लथ स्नेह-दान-सक्षम से।

    चौहत्तर

    मग में पिक-कुहरित डाल-डाल,
    हैं हरित विटप सब सुमन-माल,
    हिलतीं लतिकाएँ ताल-ताल पर सस्मित।
    पड़ता उन पर ज्योतिः प्रपात,
    हैं चमक रहे सब कनक-गात,
    बहती मधु-धीर समीर ज्ञात, आलिंगित।

    पचहत्तर

    धूसरित बाल-दल, पुण्य-रेणु,
    लख चारण-वारण-चपल धेनु,
    आ गई याद उस मधुर-वेणु-वादन की;
    वह यमुना-तट, वह वृंदावन,
    चपलानंदित यह सघन गगन;
    गोपी-जन-यौवन-मोहन-तन वह वन-श्री।

    छिहत्तर

    सुनते सुख की वंशी के सुर,
    पहुँचे रत्नधर रमा के पुर;
    लख सादर, उठी समाज श्वसुर-परिजन की;
    बैठाला देकर मान-पान;
    कुछ जन बतलाए कान-कान;
    सुन बोली भाभी, यह पहचान रतन की।

    सतहत्तर

    जल गए व्यंग्य से सकल अंग, —
    चमकी चल-दृग ज्वाला-तरंग,
    पर रही मौन धर अप्रसंग वह बाला;
    पति की इस मति-गति से मरकर,
    उर की उर में ज्यों, ताप-क्षर,
    रह गई सुरभि की म्लान-अधर वर-माला।

    अठहत्तर

    बोली मन में होकर अक्षम,
    रक्खो, मर्यादा पुरुषोत्तम!
    लाज का आज भूषण, अक्लम, नारी का;
    खींचता छोर, यह कौन और
    पैठा उनमें जो अधर चौर?
    खुलता अब अंचल, नाथ, पौर साड़ी का!

    उनासी

    कुछ काल रहा यों स्तब्ध भवन,
    ज्यों आँधी के उठने का क्षण;
    प्रिय श्रीवरजी को जिवाँ शयन करने को
    ले चली साथ भावज हरती
    निज प्रियालाप से वश करती,
    वह मधु-शीकर निर्झर झरती झरने को।

    अस्सी

    जेंए फिर चल गृह के सब जन,
    फिर लौटे निज-निज कक्ष शयन;
    प्रिय-नयनों में बंध प्रिया-नयन चयनोत्कल
    पलकों से स्फारित, स्फुरित-राग
    सुनहला भरे पहला सुहाग,
    रग-रग से रंग रे रहे जाग स्वप्नोत्पल।

    इक्यासी

    कवि-रुचि में घिर छलकता रुचिर,
    जो, न था भाव वह छवि का स्थिर—
    बहती उलटी ही आज रुधिर-धारा वह,
    लख-लख प्रियतम-मुख पूर्ण-इंदु 
    लहराया जो उर मधुर सिंधु,
    विपरीत, ज्वार, जल-बिंदु-बिंदु द्वारा वह।

    बयासी

    अस्तु रे, विवश, मारुत-प्रेरित,
    पर्वत-समीप आकर ज्यों स्थित
    घन-नीलालका दामिनी जित ललना वह;
    उन्मुक्त-गुच्छ चक्रांक-पुच्छ,
    लख नर्तित कवि-शिखि-मन समुच्च
    वह जीवन की समझा न तुच्छ छलना वह!

    तिरासी

    बिखरी छूटीं शफरी-अलकें,
    निष्पात नयन-नीरज पलकें,
    भावातुर पृथु उर की छलके उपशमिता,
    निःसंबल केवल ध्यान-मग्न,
    जागी योगिनी अरूप-लग्न,
    वह खड़ी शीर्ण प्रिय-भाव-मग्न निरुपमिता।

    चौरासी

    कुछ समय अनंतर, स्थित रहकर,
    स्वर्गीयाभा वह स्वरित प्रखर
    स्वर में झर-झर जीवन भरकर ज्यों बोली;
    अचपल ध्वनि की चमकी चपला,
    बल की महिमा बोली अबला,
    जागी जल पर कमला, अमला मति डोली—

    पिचासी

    “धिक! धाए तुम यों अनाहूत,
    धो दिया श्रेष्ठ कुल-धर्म धूत,
    राम के नहीं, काम के सूत कहलाए!
    हो बिके जहाँ तुम बिना दाम,
    वह नहीं और कुछ-हाड़, चाम! 
    कैसी शिक्षा, कैसे विराम पर आए!''

    छियासी

    जागा, जागा संस्कार प्रबल,
    रे गया काम तत्क्षण वह जल,
    देखा, वामा, वह न थी, अनल-प्रतिमा वह;
    इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान,
    हो गया भस्म वह प्रथम भान,
    छूटा जग का जो रहा ध्यान, जड़िमा वह।

    सत्तासी

    देखा शारदा नील-वसना
    हैं सम्मुख स्वयं सृष्टि-रशना,
    जीवन-समीर-शुचि-निःश्वसना, वरदात्री,
    वाणी वह स्वयं सुवादित स्वर
    फूटी तर अमृताक्षर-निर्झर,
    यह विश्व हंस, है चरण सुघर जिस पर श्री।

    अट्ठासी

    दृष्टि से भारती से बँधकर
    कवि उठता हुआ चला ऊपर;
    केवल अंबर-केवल अंबर फिर देखा;
    धूमायमान वह घूर्ण्य प्रसर
    धूसर समुद्र शशि-ताराहर,
    सूझता नहीं क्या ऊर्ध्व, अधर, क्षर रेखा।

    नवासी

    चमकी तब तक तारा नवीन,
    द्युति-नील-नील, जिसमें विलीन
    सो गई भारती, रूप-क्षीण महिमा अब;
    आभा भी क्रमशः हुई मंद,
    निस्तब्ध व्योम-गति-रहित छंद;
    आनंद रहा, मिट गए द्वंद्व, बंधन सब।

    नब्बे

    थे मुँदे नयन, ज्ञानोन्मीलित,
    कलि में सौरभज्यों, चित में स्थित;
    अपनी असीमता में अवसित प्राणाशय;
    जिस कलिका में कवि रहा बंद,
    वह आज उसी में खुली मंद,
    भारती रूप में सुरभि-छंद निष्प्रश्रय।

    इक्यानवे

    जब आया फिर देहात्मबोध,
    बाहर चलने का हुआ शोध,
    रह निर्विरोध, गति हुई रोध-प्रतिकूला,
    खोलती मृदुल दल बंद सकल
    गुदगुदा विपुल धारा अविचल
    बह चली सुरभि की ज्यों उत्कल, निःशूला—

    बानवे

    बाजीं बहती लहरें कलकल,
    जागे भावाकुल शब्दोच्छल,
    गूँजा जग का कानन-मंडल, पर्वत-तल;
    सूना उर ऋषियों का ऊना
    सुनता स्वर, हो हर्षित, दूना,
    आसुर भावों से जो भूना, था निश्चल।

    तिरानवे

    जागो जागो आया प्रभात,
    बीती वह, बीती अंध रात,
    झरता भर ज्योतिर्मय प्रपात पूर्वांचल;
    बाँधो, बाँधो किरणें चेतन,
    तेजस्वी, हे तमजिज्जीवन;
    आती भारत की ज्योतिर्धन महिमाबल।

    चौरानवे

    “होगा फिर से दुर्धर्ष समर
    जड़ से चेतन का निशिवासर,
    कवि का प्रति छवि से जीवनहर, जीवन-भर;
    भारती इधर, हैं उधर सकल
    जड़ जीवन के संचित कौशल;
    जय, इधर ईश, हैं उधर सबल माया-कर।

    पिचानवे

    “हो रहे आज जो खिन्न-खिन्न
    छुट-छुटकर दल से भिन्न-भिन्न
    यह अकल-कला, गह सकल छिन्न, जोड़ेगी,
    रवि-कर ज्यों बिंदु-बिंदु जीवन
    संचित कर करता है वर्षण,
    लहरा भव-पादप, मर्षण-मन मोड़ेगी।

    छियानवे

    “देश-काल के शर से बिंधकर
    यह जागा कवि अशेष, छविधर
    इनका स्वर भर भारती मुखर होएँगी;
    निश्चेतन, निज तन मिला विकल,
    छलका शत-शत कल्मष के छल
    बहतीं जो, वे रागिनी सकल सोएँगी।

    सत्तानवे

    “तम के अमार्ज्य रे तार-तार
    जो, उन पर पड़ी प्रकाश-धार;
    जग-वीणा के स्वर के बहार रे, जागो
    इस कर अपने कारुणिक प्राण
    कर लो समक्ष देदीप्यमान—
    दे गीत विश्व को रुको दान फिर माँगो।”

    अट्ठानवे

    कुछ हुआ कहाँ, कुछ नहीं सुना,
    कवि ने निज मन भाव में गुना,
    साधना जगी केवल अधुना प्राणों की,
    देखा सामने, मूर्ति छल-छल
    नयनों में छलक रही अचपल
    उपमिता न हुई समुच्च सकल तानों की।

    निन्यानवे

    जगमग जीवन का अन्त्य भाष—
    “जो दिया मुझे तुमने प्रकाश,
    अब रहा नहीं लेशावकाश रहने का
    मेरा उससे गृह के भीतर;
    देगा नहीं कभी फिरकर,
    लेता मैं, जो वर जीवन-भर बहने का।”

    सौ

    चल मंदचरण आए बाहर,
    उर में परिचित वह मूर्ति सुघर
    जागी विश्वाश्रय महिमाधर, फिर देखा—
    संकुचित, खोलती श्वेत पटल
    बदली, कमला तिरती सुख-जल,
    प्राची-दिगंत-उर में पुष्कल रवि-रेखा।

     
    स्रोत :
    • पुस्तक : निराला संचयिता (पृष्ठ 62)
    • संपादक : रमेशचंद्र शाह
    • रचनाकार : सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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