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महानगर में मज़दूर

mahangar mein mazdur

रमेश प्रजापति

रमेश प्रजापति

महानगर में मज़दूर

रमेश प्रजापति

और अधिकरमेश प्रजापति

    अभी-अभी आए हैं पूर्वांचल से

    या शायद मालदा से

    रेलगाड़ी में चढ़कर दिहाड़ी मज़दूर

    पेट में मचलती इच्छाएँ

    और हाथों में लिए रोज़ी-रोटी का हुनर

    मुस्कुरा रहे हैं उतर के

    महानगर के प्लेटफाॅर्म पर

    उमंग से दमक रहा है उनका चेहरा

    यह उनके जीवन के

    अच्छे दिन हैं

    बुरे दिनों को अँगूठा दिखाते

    मेहनत के पसीने से

    टुकड़ा-टुकड़ा बिखरी ख़ुशियों को समेटकर

    भेजने को आतुर हैं वक़्त की धूल में लिपटे

    उदास घरों में

    स्मृतियों में कौंधते ही

    खाली बर्तनों की खनखनाहट

    और दमकते ही घरभर के उदास चेहरे के

    उनके लिए कोई मायने नहीं रखता रात-दिन होना

    इन्हें नहीं अखरता काम का छोटा-बड़ा होना

    इनकी आँखों में झाँकती है उस भूखी माँ की लाचारी

    जिसने कुछ दिन पहले

    वक्त के हाथों

    मासूम बेटियों को बेच दिया कोड़ियों के भाव

    संवेदनाओं से दूर खड़ा शहर

    अपनी ज़रूरतों की ख़ातिर

    जवानी के साथ-साथ निचोड़ लेता है इनकी

    हड्डियों का फास्फोरस तक

    हाड़ कँपा देने वाली ठंड़ में

    मिट्टी में खेलते अधनंगे बच्चे को छोड़कर

    श्रम में तल्लीन रहते

    उफ़! तक नहीं करते दिहाड़ी मज़दूर

    और

    भूखे-प्यासे, धूप, पानी से बे-ख़बर

    ढोते रहते हैं अपनी पीठ पर

    महानगर की ख़ुशियाँ

    एक दिन भाषा की दुहाई देता हुआ महानगर!

    इंकार कर देता है इन्हें पहचानने से

    इमारतों की नीव में दबी पसीने की बूँदों को

    भूखे बच्चों की कुनमुनाहट को

    बल्कि इनकी ख़ुशियों के फूलों पर

    धड़धड़ाता गुजर जाता है

    महानगर के विकास का पहियज्ञं

    स्रोत :
    • रचनाकार : रमेश प्रजापति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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