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आदमी बनने की प्रक्रिया में

adami banne ki prakriya mein

रमेश प्रजापति

रमेश प्रजापति

आदमी बनने की प्रक्रिया में

रमेश प्रजापति

और अधिकरमेश प्रजापति

    बहुत दिनों से छत पर नहीं हुई

    कबूतरों की मटरगस्ती

    फीका पड़ गया चाँदनी का मुँह

    उदासी के अथाह जल में डूब गई उमंगें

    बहुत दिनों से लंबी यात्रा पर गए पिता

    लौटे नहीं माँ के सपनों में

    घुच्ची आँखें ढूँढ़ती रही

    अपना ख़ूबसूरत रंग धरती के सब रंगों में

    बहुत दिनों से जंगल में नहीं बजा मृदंग

    गुमसुम खड़े कुढ़ते रहे पेड़

    रातभर वायलिन की धुन पर थिरकता रहा पूँजीवाद

    बहुत दिनों से रमुआ काका की बूढ़ी आँखों में भरा रहा

    जवान होती बेटी का डर

    एक ख़ौफ़नाक सन्नाटा पसरा रहा हर तरफ़

    बहुत दिनों से बच्चों का पेट गुदगुदाती रही भूख

    माँ रोज तसल्ली की रोटी खिलाकर सुलाती रही

    बहुत दिनों से हमारे भीतर एक अनचींहा डर बैठा है

    जिसके साए तले रोज जी रहे हम

    बहुत दिनों से

    वह आदमी बनने की प्रक्रिया में है

    परंतु हर बार उसकी पूँछ धोखा दे जाती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रमेश प्रजापति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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