भारत संचार निगम लिमिटेड

अष्टभुजा शुक्‍ल

भारत संचार निगम लिमिटेड

अष्टभुजा शुक्‍ल

और अधिकअष्टभुजा शुक्‍ल

    ठाने है

    भारत संचार निगम

    कि अपनी चुप्पी को

    दर्ज करा ले जाएगा गिनीज़ में

    देर-सबेर

    भारत का

    बातूनी नागरिक भी

    उतारू है।

    एक-एक साँस में

    कैसेट भर बात करने को

    दोनों की परेशानी

    द्वित्व होकर

    बनती है परेशानी वर्ग

    एक नए तरह का

    वर्ग संघर्ष शुरू हो गया है

    भारत में

    चुप्पी और बातचीत के बीच

    सत्तरह बार लगाओ

    तो डेढ़ बार बजकर

    पिंपियाने लगती है घंटी

    लग जाए दुर्भाग्य से

    तो आधी बात कहो

    आधी बात सुनो

    आधी समझो ख़ुद

    जैसे कोई बात नहीं

    प्यार कर रहे हों!

    बहुत बड़े बुझक्कड़ हो

    तो सुनी हुई

    सहायक क्रियाओं की सहायता से ही

    दुनियाँ की सबसे कठिन पहेली की तरह

    बनाओ कोई महावाक्य

    वैसे महावाक्य भी

    एक तरह का ब्रह्मवाक्य ही है

    उसी काल को

    जिस काल से होड़ लेने के लिए ठाने थे कवि शमशेर

    और हमारे समय के लोग

    जिसे पीट रहे हैं नगाड़े की तरह

    या भारत संचार निगम

    सुना रहा है यहाँ-वहाँ के कुछ शब्दों में

    रिक्त स्थान भरो

    अपने सामान्य ज्ञान से

    झंझट इतनी

    कि अपना दुखड़ा सुनाओ

    तो भी लोग प्यार करने लगते हैं फ़ोन पर

    लोग परेशान

    कि इतनी देर में तो

    पैदल चलकर पहुँच जाते

    और बात भी हो जाती आमने-सामने

    खीझे हैं लोग

    कि पटक दो फ़ोन

    या ले लो तलाक़

    भारत संचार निगम से

    या कर लो कोई दूसरा घर

    जहाँ केवल तीन रुपए पचास पैसे में

    मिल जाए पूरा अमेरिका

    एक मिनट तक

    एक मिनट तक

    अमेरिका का ऐश्वर्य ले लो अमेरिका के विचार

    अमेरिका की आज़ादी अमेरिका के व्यभिचार

    अमेरिका की ताक़त अमेरिका की हुंकार

    अमेरिका का अध्यात्म अमेरिका का विस्तार

    अमेरिका को दूरबीन अमेरिकी यक़ीन

    बाईं ओर रसिया हो और उसके बाएँ चीन

    केवल तीन रुपए पचास पैसे में आमीन! आमीन!

    परेशान उपभोक्ताओं की

    परेशानी से परेशान हो गया है

    भारत संचार निगम

    अपने से जोड़े रहने के लिए

    बनाने में मशग़ूल है नई-नई योजनाएँ

    कि कैसे कम से कम पैसों में

    अधिक से अधिक बात कर सकें

    देश के सम्मानित ग्राहक

    कि कैसे घटे दर और कैसे बढ़े समय

    कहने की आवश्यकता नहीं

    कि अधिक से अधिक

    बातें करना ही

    भारत का भरत वाक्य ठैरा जो!

    भारत संचार निगम

    जब नाख़ुश होता है

    तो गाली देता है जनता को

    और भारत की जनता जब ख़ुश होती है

    तब गरियाती है ख़ुद को

    आख़िर ख़ुश ही कर लिया

    भारत की जनता को

    भारत संचार निगम ने

    और जनता गाली देने लगी ख़ुद को

    इस अफ़सोस से

    कि वह अभी तक क्यों गाली दे रही थी निगम को?

    अपार ख़ुशी में

    अबे-तबे और माँ-बहनों तक

    उतर आई जनता

    सड़कों पर चक्का जाम करने लगी

    भारत संचार निगम की

    इस घोषणा से

    कि दस पैसे में बात कीजिए

    पूरे एक मिनट तक ठाठ से

    किन्हीं दो लोगों के साथ

    जिस दिन यह घोषणा हुई

    नई से नई सब्ज़ी ख़रीदी गई उस दिन

    मछलियाँ सड़ गईं दुकानों पर

    मुर्गे बचे नहीं बाज़ार में

    आलू सत्ताइस रुपए किलो बिका

    तीन रुपए की कॉल दर पर

    घंटों बात की लोगों ने

    कि अब दस पैसे में एक मिनट तक बात होगी

    अपने चुक्कू-मुक्कू प्यारे देश में

    उस शुभ दिन को

    भारत के इंग्लैंड प्रेमियों ने 25 दिसंबर माना

    कांग्रेसियों को लगा कि 2 अक्टूबर है

    संघियों ने गोडसे दिवस समझा

    तो वामपंथी दोस्तों ने 1 मई

    15 अगस्त और 26 जनवरी झगड़ने लगे प्यार से

    कि उस दिन के लिए

    पहले कौन इस्तीफ़ा देगा सदन से?

    इतनी हाथी ख़ुशी हुई

    कि ऊँटों की तरह चलने लगे लोग

    मतपत्र, मुहर, पेटियाँ और वोटिंग मशीन

    फेंक आए तालाबों में

    जो जहाँ था वहीं धरने पर बैठ गया

    कि चाँद-सूरज के रहने तक

    बरक़रार रहेगा यही भारत संचार निगम

    हिसाब-किताब करने में भी

    तेज़ होते हैं भारतवासी बहुत

    और हिंदी वाले तो अक्सर

    दूसरों की चाय के आदी होते हैं

    और लेखा-बही के तो क्या कहने

    आख़िर चित्रगुप्त ने

    दूसरे मुल्कों की मुनीबी क्यों इनकार कर दी?

    तो दस पैसे में एक मिनट अर्थात साठ सेकंड

    यानी एक रुपए में दस मिनट यानी छह सौ सेकंड

    यानी एक घंटे के सिर्फ़ छह रुपए

    और इतनी नन्ही पूँजी है दस पैसा कि अब उसके सिक्के को

    आप देख ही नहीं सकते खुली आँखों से

    ऐसे ही दस पैसों के दस अदृश्य सिक्कों से

    बनता है एक रुपया

    जिसे भिखारी भी हिक़ारत से देखता है अब

    जबकि भारत संचार निगम

    आपसे सिर्फ़ दस पैसे माँग रहा है

    बदले में एक मिनट तक बात

    इतने में आप चाहें तो

    किसी लड़की की इज़्ज़त लूट लें फ़ोन पर

    किसी से फिरौती माँग लें

    या आदेश कर दें लाठीचार्ज का

    अथवा बता दें आर.डी.एक्स. रखने की जगह

    या कब मिलेंगे किस मोड़ पर

    लेकिन थोड़ा लगाकर ज़्यादा पा लेने की भी

    एक समस्या है भारतवासियों में

    अगर आप बात करने के लिए

    एक रुपए दैनिक ख़र्च करने की

    माली हालत में हैं

    तो विकसित देश की ओर

    पलायन वेग से बढ़ते आपके पास

    पेशाब करने को फ़ुर्सत नहीं

    कितना समय लग जाता है दूसरों का बिस्तर झाँकने में

    कितना समय लग जाता है औरतों को जलाने में

    कितना ख़र्च हो जाता है आलोचकों का मुँह बंद करने में

    कितना चला जाता है फ़ोटो खिंचवाने में

    कितना पटाने, कितनी योजना बनाने

    कितना नाराज़ होने, कितना मनाने में

    जिसे आज पेशाब करने की फ़ुर्सत नहीं

    वही पहले समय पर पेशाब कर सकता था

    रावण जितनी देर तक लब-ए-रोड पर

    सो सकता था कुंभकरण जितनी देर तक अंतःपुर में

    लेकिन समय जाते देर नहीं लगती

    एक रुपए तो हाथ के मैल की तरह

    भारत संचार निगम के

    कटोरे में डाल देंगे आराम से लोग

    लेकिन कैसे बचाएँगे दस मिनट का समय

    किसकी जेब काटकर लाएँगे भला?

    तो समय काटने और कटाने की

    कोई मशीन होनी चाहिए हमारे पास

    और उसी ख़ुशी के क्षणों में से

    यानी 25 दिसंबर में से थोड़ा-सा समय काटकर

    थोड़ा 15 अगस्त और 26 जनवरी में से

    थोड़ा समय मुर्गे की बाँग से काट कर

    थोड़ा रविवार थोड़ा टाइम बम में से

    कट-कट कर जमा होता रहे हमारी भविष्यनिधि में

    और महीने की आख़िर में

    हम निकाल सकें कर्ज़ बात करने के लिए

    अपनी जमा-पूँजी में से

    फिर छोटी-छोटी क़िस्तों में कटा कर

    भर दें अपने खाते बिना किसी टेंशन के

    तो संचार भी हो गया

    पैसा भी हो गया

    हिसाब-किताब भी हो गया

    समय भी हो गया

    लेकिन फिर परेशान हो गए लोग

    यह एक नए प्रकार की परेशानी थी

    और परेशानी थी दो लोगों के नंबर चुनने की

    एक मोबाइल और एक पी. एंड टी. का नंबर चुनने की

    और चुनाव में ही

    सबसे ज़्यादा असमंजस में रहते हैं भारतवासी

    तो एक विचार इस तरह से आया

    कि बेस वाला नंबर घर का दे दिया जाए

    पता नहीं कब कहाँ हो आदमी

    तो खोज-ख़बर लेता रहेगा बाहर से

    लेकिन समस्या यह उठी

    कि पता नहीं कैसा हो पति-पत्नी के बीच

    संबंध पता नहीं कैसा हो बेटी-बेटे के साथ

    अथवा माँ-बाप के साथ जाने कैसा संबंध हो

    दूसरा मोबाइल नंबर किसी साझीदार का दे दिया जाए

    तो कितनी देर तक हो सकती है कामचलाऊ बातचीत

    तीन मिनट में ही तो काम की बातें ख़र्च हो जाती हैं

    बहुत खींचो तो चार मिनट चलेंगी

    हद से हद पाँच मिनट तक

    उसके बाद दोनों ओर से

    “और सब ठीक है न?

    हाँ-हाँ ठीक है

    ठीक है, ठीक है अच्छा, ठीक है”

    ठीक उसी समय

    सियासत ने सोचा

    कि एक नंबर मज़हब का दे दें दूसरा एक माफ़िया का

    लेखक ने सोचा

    कि एक नंबर संपादक का दे दें दूसरा एक आलोचक का

    भ्रष्टाचार ने सोचा

    एक नंबर पुलिस का दे दें दूसरा एक राजनीतिक का

    बकरी ने सोचा

    कि एक नंबर किसी हिरन का दे देगी

    लेकिन डायल करती तो अचानक बाघ का नंबर लग जाता

    प्रेम के बाज़ार में

    सबसे ज़्यादा परेशान हुए प्रेम के सौदागर

    कि इतनी सस्ती दरों पर

    किस-किससे उठाया जाए प्रेम का लाभ

    प्रेम के रूप हज़ार हैं

    तो एक-एक प्रेमी में प्रेम के लाखों दिल

    ठठाकर हँस रहा है भारत संचार निगम

    और बात-बात पर बारूद हो जाने वाले

    भारत के लोग हैरान, परेशान और चुप

    पहरेदार नींद में हैं

    जिनसे उम्मीद थी

    वे भी उम्मीद में हैं

    जिन्हें विषय-प्रवर्तन करना था

    मंच पर वे लगातार

    विषय-परिवर्तन कर रहे हैं

    और नीचे लोग खर्राटे मार रहे हैं

    सोच रहे हैं लोग

    यहाँ तक कि फ़ीस चुकाकर परामर्श ले रहे हैं

    कि ऐसे कौन-कौन से दो लोग हों अपने

    जिनके लिए इतनी मेहनत से बचाया जाए समय

    इतने कम पैसों में बात कर सकें

    घंटे आध घंटे

    उन मुहावरों में

    जो पाँचवें कान तक पहुँचे तो समझें

    कि बात के सिर का पता पूँछ का

    पागल होंगे साले

    गाँजा पीकर बतिया रहे होंगे

    गुप्तचरों के लिए भी सिरदर्द

    और दुभाषिए की ऐसी-तैसी

    ऊहापोह में हैं लोग

    ऐसे दो लोगों का चयन करने में

    जिनके साथ उनके

    नेपथ्य में जाकर बातचीत कर सकें

    कुछ देर तक

    जीवन की उस आदिमता में

    जहाँ इतनी बातें होने पर भी ख़त्म हों

    अगले दिन के लिए भी

    रह जाएँ कुछ बातें

    एक नई टेक के साथ

    एक ही ताले की दो चाबी नहीं हैं दो नंबर

    कि कौन कब आए और कौन कब चला जाए

    अब साथ रहना उतना ज़रूरी नहीं

    जितना कि साथ दिखाई देना ज़रूरी है

    पहले का अनुबंध ही आज की मजबूरी है

    तो क्या इतने अकेले होते गए हम

    कि हमारी अपनी चाल से अपनी चलन से

    अपने हिसाब-किताब से

    अपने संचार और अपने समय से

    इतने लोगों को खो दिया हमने

    कि अपनी-अपनी दुनिया में

    बात करने के लिए

    दो लोग भी ठीक से नहीं बचे हमारे पास

    कि दो लोगों का नंबर देने में इतनी ऊहापोह में हैं हम

    अपनी निजताओं के संसार में

    सार्वजनीकरण तो कब का चला गया

    क्या अपना निजीकरण भी नहीं कर सके हम?

    भरे-भरे लोगों में ख़ाली की नौबत

    मूँज सब निकल चुकी बचे सिर्फ़ सरपत

    जब इतनी भयानक ऊहापोह हो

    तो भूले हुए लोगों को याद कीजिए

    याद उसे ही नहीं कहते

    जो अक्षरशः और क्रम से याद हो

    अन्वय में भी हो सकती है याद

    बिंबों में हो सकती है

    और किसी अन्य को देखकर

    सकती है अन्य की याद

    अब भी वक़्त है कि

    अकेलेपन के इस दौर में

    ठीक-ठीक दो लोगों को याद कीजिए

    जिनसे बातें हो सके घंटे-आधे घंटे ऐसी

    कि कल के लिए भी बची रहे कोई नई बात

    और बातों का सिलसिला ख़त्म हो

    एक बार फिर

    ऐसा अवसर लेकर आया है

    भारत संचार निगम

    कि चुप्पी और बातचीत के बीच

    शुरू हो सके एक नया वर्ग संघर्ष

    लेकिन फिर परेशान है

    भारत संचार निगम

    कि भारत के उपभोक्ताओं को

    इतनी सस्ती चीज़ों का

    उपभोग करने में भी आती है शर्म

    और ऊहापोह में हैं लोग

    दो लोगों का चयन करने में...।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अष्टभुजा शुक्ल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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