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पइसै से सारी चमक-दमक, पइसै से इज्जत मरजादा,

पइसे से सारा धरम-करम, पइसै माई पइसै दादा।

अस दुनिया मा के अहै, कि जे पइसा के आगे छोट भा,

केकर दुर्बलता नारि भै, केकर बल साहस नोट भा।

जौ नौट मिलइ तो चाहे जेतना, नेम होइ सब टूटि जाए,

ईमान डिगै, सम्मान जाइ, पइसा आवै कुल छूटि जाए।

पइसै कइ माया बड़े साह, चोरन से हाथ मिलावा थीं,

पइसै की लालच बड़े-बड़े, कूकुर अस पूँछ हिलावा थीं।

पइसा बाढ़ा तौ रकम-रकम, बोलत अउर रकम होइगे,

धरमू से बनिगे धरमराज, परसू से परषोत्तम होइगे।

मंदिर पइसा मस्जिद पइसा, गुरुद्वारौ हाथ बढ़ावा थै,

ओतनै बड़ा भगत होइगा, जे जेतनै ढेर चढ़ावा थै।

जेकरी गाँठी पइसा नाहीं, गुन भरा होइ मुल के मानै,

गाँठी से कंचित पोढ़ होइ, हकिमौ छानैं, अपुनौ छानै।

रुपिया कै जौ बनवै छनने, तौ बड़े बड़न का छानि देइ,

जेका जस चाहै ढील देइ, जेका जस चाहै तानि देइ।

बस पइसै बड़का गुरू अउर, सब चेला गुनिया निरगुनिया,

पइसै के मंतर पर नाचइ, मूड़े के बल सारी दुनिया।

पइसै के बल बड़की कुर्सी, हथियाइ लेंइ झगडू सम्मड़,

पइसै नाचे छम छम बाजै, कुड़क-कुड़क घम्मड़-घम्मड़।

पइसै से भारी भीर महानगरंन ठसा-ठसी बाटै,

पइसै से सारी दाँव पेंच पइसै से रसाकसी बाटै।

पइसै के जादू के बस, राजा महराजा मंतरी अहैं,

पइसै के बल पर चोर अहइँ, पइसै के बल संतरी अहैं।

पइसा कै थोरी देखि, चहै जस खास होइ मुल घिन छूटै,

जे बाटै दच्छिना नकद, कुल दुनिया कइ असीस लूटै।

हाजमा बढ़इ अस पापन के परबत तक लीलि पचाइ लेइ,

केतनौ बड़ त्यागी होइ मुला, पइसा देखतै मुह बाइ देइ।

स्रोत :
  • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 26)
  • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
  • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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