हे महानगर! जब तेरे बाज़ारों की धूल की परत
मंदिर तक में आ छा जाती है तो—
सड़कों पर ज़ोरदार मुट्ठियाँ ताने, शाप देती—
भीड़ के कलेजे में आँधियाँ उठती हैं तो—
जब संघर्ष से प्राप्त धर्मगत, वर्गगत भेद की
उपलब्धियाँ चारों ओर से टकराकर चूर-चूर हो जाती हैं तो—
मेरे जीवन तपोवन में दिल तक जड़ जमाए
वृक्ष क्यों खीझ कर सिर हिलाते हैं?
उनकी छाया के विस्तार में आश्वासन पाने वाले
इस नए जग के बारे में सोच-सोच कर मन क्यों क्रन्दन करता है?
ढेर सारे सुख भोग के साधनों को दिया है न
ढकेलने को, उठा लेने को, धूल झाड़ने को,
जन लहर के अंध आवेश में फिसले बिना
लक्ष्य की ओर आँख गड़ाए पाँव जमाए,
वे समर्थ हैं—टूटे भाण्डों के बेकार बोझे को उतार फेंकने में
तपते मार्गों में चलने वाले तेरे बच्चे।
क्या कल वे अपने विकसित हृदय को छत्र बना
तान न देंगे, संसार को शीतलता पहुँचाने को?
हज़ारों फणों पर धरती को टिकाने वाला धर्म
जब अपनी केंचुल उतार फेंकता है तो भय कैसा?
- पुस्तक : नैवेद्य (निवेद्यम्) (पृष्ठ 175)
- रचनाकार : बालमणि अम्मा
- प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
- संस्करण : 1996
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