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प्रवत्स्यत्पतिका-(1)

prvatsyatpatika (1)

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

प्रवत्स्यत्पतिका-(1)

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

और अधिकभुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

    तरुण वयस बिति गेल,

    भेल नहि दरशन रे।

    हमर करम विधि फूटल,

    हाए! हमर सन रे॥

    भेल आश-अवसान,

    मोह मोर टूटल रे।

    शिव-शिव, निरदय प्राण,

    तइओ नहि छूटल रे॥

    मधुयामिनि, मधुमास,

    मधुप मृदु गाबए रे।

    अनुरागिनि, मधुराग,

    तनिक नहि भावए रे॥

    नयन-नीर झर अहनिसि,

    धार बहाएब रे।

    बन मन तरणि, ताहि चढ़ि,

    पहु लग जाएब रे॥

    चोँच मढ़ाएब सोन,

    घुँघरू पहिराएब रे।

    काक भाखि जँ भाख,

    सकुन ठहराएब रे॥

    सुतल छलहूँ हम गेह,

    सपन लखि पाओल रे।

    आएल मोहन हमार,

    मुरलि-ध्वनि गाओल रे॥

    चौँकलहुँ, टूटल निन्द,

    निठुर नहि पाओल रे।

    मनक उछाह, मनोरथ,

    मनहिँ गमाओल रे॥

    धैरज धरु सुकुमारि,

    'भुवन' आशिष देथि रे।

    पुरए अहँक मन-काम,

    श्याम पुनि सुधि लेथि रे॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 77)
    • संपादक : अजीत मिश्र
    • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2024

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