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किसन कइ खोज

kisan kai khoj

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    सुधि आवै नारद के बात जब जब-तब,

    पीर उठै मन मा करेज कसि करकै।

    केतनौ सँभारै नहिं सँभरै-सँभारे तन,

    बायीं आँख बाईं भुजा बाम अंग फरकै।

    भड़कै निहारि परछाईं आप आपन ही,

    होइ कहूँ खट्ट जिया धकधक धरकै।

    काल बस कंस कै बिलानी भूख नींद उड़ी,

    दिनवा पहार रात तिलतिल सरकै।

    छानि मारौ गगन पताल सारी ब्रजभूमि,

    जहाँ मिलि जाय सीस धड़ से उड़ाय दो।

    चुपचाप किसन को लायके हवाले करें,

    नंद जसोदा को सनेस ये सुनाय दो।

    बिना रोंक-टोंक के तलासौ घर घर घुसि,

    सेखी जो बघारै लूकी लपक लगाय दो।

    बचि के जाय कौनौ ओर से कन्हाई सुनौ,

    बिरज की भूमि आज ऊधम मचाय दो।

    तुमहौ कन्हाई, नहीं तुम हौ कन्हाई नहीं,

    तुम हो कन्हाई, नहीं तुम तौ किसन हो?

    मुरली छिपाइ कहूँ मोप को थमाय दिहे,

    झूठ-मूठ गूढ़ि रहे बात कि रतन हो।

    मोर पंख फेंकि फाँक मूड़ हौ मुड़ाइ लिहे,

    आँखिन में कीचर हैं पंकज नयन हो।

    धूर में लपेटे बसुदेव जी के बेटे चाहे,

    कितनौ छिपाओ मुल करियाबरन हो।

    थर-थर काँपन लगी है सारी ब्रजर्भाम

    सोक कै लहर उठी गाँव गाँव घर-घर।

    भर-भर बयन चैन दिन रैन भूलि,

    नयन चुअत मानों ओरी चु झरझर।

    दूध दही माखन मलाई सब लूट लेत,

    कंस के सिपाही गाही गाही दौरि दर-दर।

    डर-डर भागि रही भीर गोप गोपिन की,

    पापिन कै पल्टन खदेरि कहै धर-धर।

    जुरी भीर दंगल की कंस के महल बीच,

    बड़े-बड़े मल्ल दंड पेलि रहे घूमि के।

    मद मे प्रचंड बना क्रोध में तमकि तना,

    द्वार पे कुवलिया चिघारै झूमि-झूमि के।

    चले घनस्याम बलराम चले साथ-साथ,

    पीछे-पीछे चले ग्वाल बाल जिय हूमि के।

    देखन को कौतुक कन्हाई के कसाई संग,

    चले चहुँ ओर से सुभट ब्रजभूमि के।

    देखत ही किसन कन्हाई को चिघार उठा,

    सूँड़ फटकारि के जमकि गया द्वार पे।

    वार पर वार बार-बार के कुवलिया के,

    नटवर किसन बचाते गए वार पे।

    रुकि गई साँस ग्वाल बालन की देखि हाय,

    कान करत कोऊ चीख पे गुहार पे।

    देखत ही देखत ढनगि परा ढोल जिमि,

    सरग सिधारा गज कान्ह के प्रहार पें।

    बन गए काल से बिकट बिकराल कान्ह,

    देखि हवा बड़े बड़े मल्लन के खिसकी।

    मूकन से मारि के निकारे प्रान मुस्टिक के,

    देखि के चनूर की निकरि परी सिसकी।

    पल में दबोच ताहि सरग रसीद किए,

    टूटि गई सीमा सारी किसन के रिस की।

    कंस को पकरि के जकड़ि लिए बाँहन में,

    कहाँ चले मामा है तलास अब किसकी।

    एक ही प्रहार में बिलग भये रुँड-मुंड,

    पूरी हुई कथा कंस कुटिल कराल की।

    नंद जसोदा के नयन झरे झर-झर,

    गहि बनवारी चुमकारी लेत भाल की।

    भरि आईं अँखिया मुदित मन गोपिन की,

    फुल उठी छतियाँ खुसी से ग्वाल बाल की।

    बंसरी बजाइ पीत पट फहराइ चले,

    फिरी ब्रजभूमि में दुहाई नंद लाल की।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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