किराए पर रोने वाली औरतें धरने पर बैठी हैं
kiraye par rone wali aurten dharne par baithi hain
चंद्रकांत देवताले
Chandrakant Devtale
किराए पर रोने वाली औरतें धरने पर बैठी हैं
kiraye par rone wali aurten dharne par baithi hain
Chandrakant Devtale
चंद्रकांत देवताले
और अधिकचंद्रकांत देवताले
बर्बरों को
मुग्ध दृष्टि से निहारने के उपक्रम में
भीड़ में कुछ लोग आँखों को पोंछते हैं
कुछ ऐनक को
रेतघड़ी अपना काम करती है जिस तरह
ठीक उसके विपरीत
हड़बड़ी में फेंटा जा रहा है समूचा परिदृश्य
ताशपत्तों जैसा नहीं
नदियाँ, इमारतें बड़ी-बड़ी इबारतें
शामिल हैं इसमें
जिसे कोई भँवर में भूलभुलैया कह रहा है
ज्ञात और अज्ञात के बीच की
एक फुसफुसाहट
अंकुरित हो रही थी जिसमें आशंकाएँ
दाँतों के बीच चिबदा गई हैं
कुर्सियाँ, तस्वीरें, नेम-प्लेट, प्रतिमाएँ
इधर से उधर उलट-पुलट हो रही हैं
ज़ुबानें हड्डियाँ बत्तीसी इत्यादि के एक्स-रे
दे ही नहीं सकते सही रिपोर्ट
फिर भी जाँच पर शक मत करो
कोई दबी और संदिग्ध आवाज़ में
विश्वास दिलाने की असफल कोशिश करता है
आने वाले दिनों के बारे में
बौद्धिक विमर्श, विवाद और ख़ून-खच्चर तक क्रियाकर्म की तरह जारी हैं
किराए पर रोने वाली औरतें
धरने पर बैठी हैं
फ़िलवक़्त वे कोई मदद नहीं कर सकतीं।
- पुस्तक : जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा (पृष्ठ 239)
- रचनाकार : चंद्रकांत देवताले
- प्रकाशन : संवाद प्रकाशन
- संस्करण : 2008
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