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खेलने की उम्र में खाने लगा था मैं

khelne ki umr mein khane laga tha main

अनुराग अनंत

अनुराग अनंत

खेलने की उम्र में खाने लगा था मैं

अनुराग अनंत

मार खाने और गाली खाने के बीच के अंतर को

मैंने अपनी भूख के ठीक बग़ल रखा

और तराज़ू बराबर हो गया

मैंने धोखा खाया

और फिर बहुत दिनों तक कुछ खाने को जी नहीं किया

पेट पीठ से सट गया

उदासी नदी के किनारे बैठी रही

मेरे भीतर के जाने कितने राम

छपाक-छपाक कर कूद गए नदी में

किसी थाने में कोई केस दर्ज नहीं हुआ

किसी अदालत में कोई मुक़दमा नहीं चला

जाने कितनी मौतें न्याय की राह देखती रहती हैं

अभागी प्रेमिकाओं की तरह—सूनी माँग लिए

मैंने मुँह की खाई तो पता चला प्रतियोगिता अन्याय का अखाड़ा है

प्रत्येक प्रतियोगिता से ठीक पहले एक प्रतिस्पर्धा होती है

नियम बनाने के अधिकार पर क़ब्ज़े की प्रतिस्पर्धा

और इसी प्रतिस्पर्धा का परिणाम लगभग तय कर देता है प्रतियोगिता का भविष्य

उसका परिणाम

हार जाने से कहीं ज़्यादा दुःखद होता है

लगभग हार जाना

हार के तय होने से ज़्यादा आतंकित करता है

हार का लगभग तय होना।

स्रोत :
  • रचनाकार : अनुराग अनंत
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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