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झाड़े रौ महगुआ

jhaDe rau mahagua

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

झाड़े रौ महगुआ

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    स्वारथ जग परमारथ से डरु

    दुसरे पेट काटि ठूसि-ठूसि भरु रे,

    जहाँ लौ निगाह जाइ, कूद फाँद करु रे,

    आनकै हड़पि के उतान होइ डकरु रे।

    खाइ पाउ खाउ नाहीं मारि के अड़ाउ,

    लइके नेता जी कै नाउ धुजा गाड़े रौ महगुआ।

    दुइ पइसा कै टोपी दैके झाड़े रौ महगुआ।

    बहै पछियाँव तौ पुरुब मुह कइले,

    जेकै देख बड़ी तै उहीं के पूछ धइले,

    लात खाइ लपकि चरन धूर लइले

    सिखु दाँव पेंच आँख खोलि के चितइले।

    टेढ़ी चल चाल, छोड़ देस कै बवाल,

    ओढ़ि बघवा कै खाल तै दहाड़े रौ महगुआ।

    दुइ पइसा कै टोपी दैके झाड़े रौ महगुआ।

    नेताजी के घर कै नकेल हथियाइ ले,

    गोड़ मीजि-मीजि के फुसुकि बतियाइ ले,

    बीबी पघिलाइ ले, गदेल पटियाइ ले

    मड़ई के तरे तरे बखरी उठाइ ले।

    काढ़ि-काढ़ि खीस माँग-माँग बखसीस,

    होइ पाँच पचीस, तनी ताड़े रौ महगुआ।

    दुइ पइसा कै टोपी दैके झाड़े रौ महगुआ।

    छोड़ दे बिचार यार मान अपमान कै,

    गीत गाउ मंतरी की आन-बान-सान कै,

    ठेका लइले सड़क सराब की दुकान कै

    पाठसाला इंदिरा अवास निरमान कै।

    चढ़िज अकास रोज-रोज एक बाँस,

    भले पुछिया विकास कै उखाड़े रौ महगुआ।

    दुइ पइसा कै टोपी दैके झाड़े रौ महगुआ।

    करुरे कमाल तनी थाने के दलाल बन,

    जबरा साधि-साधि निमरा काल बन,

    काटि के कमीसन के माल मालामाल बन

    चढ़ि के बुलट यार गुदड़ी के लाल बन।

    रेत-रेत काट, रोज खड़ी कर खाट,

    ठाट बाट किहे लाट पछाड़े रौ महगुआ।

    दुइ पइसा कै टोपी दैके झाड़े रौ महगुआ।

    यूँकै वाले यूँकै इतौ दुनिया काम रे,

    भाई बंद माई बाप दुनिया दाम रे,

    दाम बिना दुनिया कै निंदिया हराम रे

    गाँठी होइ दाम करै दुनिया सलाम रे।

    चमचा महान, तोर चमकी दुकान,

    काम सगरे जहान बिगाड़े रौ महगुआ।

    दुइ पइसा कै टोपी दैके झाड़े रौ महगुआ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 54)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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