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जननी के प्रति

janani ke prati

उमा भगत

उमा भगत

जननी के प्रति

उमा भगत

और अधिकउमा भगत

    भेदभाव के इन कठिन दिनों में

    प्रकृति ने मुझे बचाए रखा है

    जब भी दुपट्टे की भार से मन उजबुजाया

    तब हल्की हवा ने उसे सरकाया है

    मुझे बचाया है

    वही जिसने मुझे जना है

    जब-जब किसी सरकारी बबुनी ने

    रोज़गार के बारे में पूछा मुझे

    एक गहरी खाई के उस पार से

    तब भी मुझे प्रकृति ने ही बचाया है

    बारिश शुरू हो जाती है

    और खाई के इस पार

    उस पार

    दोनों पार बराबर बरसती है

    संभव हो कि उनके पास छतरी हो

    और वह ख़ुद को ख़ुशनसीब महसूस करें

    पर मेरे लिए यह दुःख की बात होगी

    सभी जगहों पर अनामंत्रित मैंने ख़ुद को

    खुले आसमान में तारों के बीच आमंत्रित पाया है

    जब बारिश होती है तो असमानता की सभी लकीरें

    बहाकर एक ही समुद्र में ले जाती हैं

    प्रतियोगिता के बीच दबी मैं जब ख़ुद से हारी हूँ

    तब तब मृत्यु आसान जान पड़ी है पर

    गंगा में डूबता सूरज देखने के लोभ से मैं ज़िंदा हूँ

    मुझे गंगा ने, सूरज ने, हवाओं ने ही ज़िंदा रखा है

    भेद-भाव से ऊँच-नीच से

    जब भी असमानता को जानने की इच्छा से

    प्रेम और मोह को समझने की इच्छा से

    मैं वेद-पुराणों की तरफ़ मुड़ी

    उनकी धर्म आपदधर्म की बातों ने

    किंतु परंतु

    यद्यपि तथापि ने

    मुझे और उलझाया है

    तब प्रकृति ने मुझे बचाया है

    वही जिसने मुझे जना है

    अपने से हारकर जब भी मैंने

    आँखें बंद कर मृत्यु को महसूस करना चाहा है

    तब सूरज की किरणों ने ही तो

    जगाया है

    बचाया है

    स्रोत :
    • रचनाकार : उमा भगत
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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