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इहीं पयसरम की बदौलत

ihin payasram ki badaulat

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

इहीं पयसरम की बदौलत

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    चलतै कहूँ पयसरम कै कुदारी

    होतै सगर देस दुनिया भिखारी

    मन्दिर मस्जिद गिरजा सेवाला

    भगवान होते होतै पुजारी।

    इहीं पयसरम की धुरी पर टिकी बा

    धरा और धरम की प्रगति के कहानी

    इहीं पयसरम से उहाँ ताज चमकै

    इहीं पयसरम से सजी राजधानी।

    बिना पयसरम के परा तुच्छ अनगढ़

    हिमालय के पाथर कीमत कहाँ बा

    छेनी चली तौ उहै राम बनिगा

    कि सिर केउ उठावै गनीमत कहाँ बा।

    उड़तै सरग मू धरम के पताका

    कलस के दरे का जनी काउ होतै

    मुसकात देवता मूरत भला तौ

    नमन के बरे का जनी काउ होतै।

    अगर पयसरम के डगर पर चलतें

    सगर के सुतन कै पुछैया होत

    इहीं पयसरम की नसेनी से उतरी

    भगीरथ होते मइया होतै।

    बड़े पयसरम से धरम करम

    लोक परलोक कै सब कहानी गढ़ी गै

    निगम अउर आगम कथा बार्ता

    सब इहीं पयसरम की जबानी पढी गै।

    बिना पयसरम के दाना पानी

    छुधा के समन कै कहानी होतै

    होतै कहूँ पयसरम कै कथा तौ

    हया सरम के निसानी होते।

    रोटी कपड़ा कल कारखाना

    नहर कूप सर ताल वापी होतै

    उतरतिन गंगा हिमालय से खाले

    धरती भगीरथ नापी होतै।

    बिना पयसरम कौन पौरुख के गिननी

    कि पाथर भला कौन करतब देखावै

    कि जैसे नदी की लहरिया मुरदा

    हवा के इसारा मूड़ी हिलावै।

    बिना पयसरम गति कि जगहा अगति

    जौ नलनील होते सीता मिलतै

    करम कै कथा जौ होतै कहूँ तौ

    धरम कै प्रथा बनि के गीता मिलतै।

    समुंदर थहउतै भला कैसे मनई

    जौ कर पयसरम कै पतवार होतै

    कोलंबस डिगामा चहै जे उतरते

    बिना खेये नैया कहाँ पार होते।

    परा पयसरम कै चरन चीन्ह जब से

    अँजोरिया इतिहास कुछ अउर होइगा

    इहाँ गाय के पूछ पकरे परा

    एक कूकुर उड़ाकन के सिरमौर होइगा।

    मोटर गाड़ी, बाड़ा, बाड़ी

    चल और अचल जौन दौलत खड़ी बा

    बखरी, बिरवा, खेती बारी

    इहीं पयसरम की बदौलत खड़ी बा।

    खिलतै सुमन महकतै दुनिया

    लसा फूल फल से बगीचा होतै

    होतै कतौं मधु मधुमास होत

    सिर के पसीना से सींचा होतै।

    केहू जात एहमू केहू जात ओहमू

    एक ढंग होतै एक राह होतै

    नौ घाट होते कहूँ पयसरम कै

    बिपति की नदी कै कहाँ थाह होते।

    चलाएन जहाँ बिस्वकरमा बसूली

    जहाँ पयसरम कै चरन धूर परिगै

    उचरिगा दरिद्दर खूँटा उहाँ से

    सिर से सनीचर छाया उतरिगै।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 71)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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