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गोदो की प्रतीक्षा में

godo ki pratiksha mein

कुमार विकल

कुमार विकल

गोदो की प्रतीक्षा में

कुमार विकल

और अधिककुमार विकल

    गोदो*!

    तुम कभी नहीं आते।

    हम सभी जानते हैं

    तुम कभी नहीं आओगे।

    फिर भी हम सभी तुम्हारी प्रतीक्षा में रहते हैं

    सुनते हैं, तुम भेड़ों के मालिक हो,

    दूर चरागाहों में रहते हो,

    और तुम्हारी श्वेत धवल दाढ़ी बहुत भली लगती है।

    तुम जब आओगे—

    बेकारों को रोज़गार, भूखों को रोटी

    उम्र-क़ैदियों को छुट्टी, बच्चों को चॉकलेट—

    औ' कॉफ़ी-हाउस में बैठे लोगों के बिल दे जाओगे।

    इसलिए तो—

    फ़ुटपाथों पर बैठे मज़दूर

    रेल-पुलों पर ऊँघ रहे भिखमंगे

    जेलों में चक्की पीस रहे क़ैदी

    गलियों में खेल रहे बच्चे

    काफ़ी-हॉउस में मेज़ों पर झुके हुए चेहरे

    हर आहट पर चौंक-चौंक जाते हैं

    लेकिन...

    तुम कभी नहीं आते।

    हम सभी जानते हैं,

    तुम कभी नहीं आओगे,

    फिर भी हम सभी तुम्हारी प्रतीक्षा में रहते हैं

    क्योंकि तम हर रोज़ हमें

    कल आने का संदेश भेजते रहते हो।

    *गोदो—सैमुअल बैकेट के नाटक Waiting for Godot का प्रमुख मात्र है। इस सारे नाटक में गोदो कभी मंच पर नहीं आता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निषेध (पृष्ठ 160)
    • संपादक : जगदीश चतुर्वेदी
    • रचनाकार : कुमार विकल
    • प्रकाशन : ज्ञान भारती प्रकाशन
    • संस्करण : 1972

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