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गँउना मा जाड़ा गवा आइ

ganuna ma jaDa gava aai

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

गँउना मा जाड़ा गवा आइ

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    धीरे-धीरे दिन छोट भवा, तनिकै तनिकै बढ़ चली रात

    जब सुरजै जागइ सात बजे, तौ मनई कै का बिसात।

    कथरिन मा मुँह मूंदे -मूंदे, दिन पहर चढ़े रतियइ देखाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    नीचे पुआल उप्पर कथरी, कथरी पर सोवइँ सात जना

    गुड्डू जैसिरी किलोपा कोबा, आजी माई तिल्लोकना।

    केउ मूड़े कइती सरकि गवा, केउ गोड़वारी मू ढनगि जाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    सब धुँआ-धुँआ चारिउ कइती, कुँअना मा जस आगी लागी

    पेटे के भीरि भिनउखै से, परबतिया आजु अहइ जागी।

    गै गूँज गीत के कड़ी-कड़ी, साथै मा जँतवा घुरघुराइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    गटई तालुक गाँती बाँधे, जनकिया दुआर बहारा थै

    बाबू के बड़की कोट पहिरि, जयसिरिया गोबर काढ़ा थे।

    टहनी अस हाँथ गोड़ तनिकउ, जौ हवा चलइ तौ थरथराइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    सर्दी से निकुरा सटा रहै, मुँहबउना घूमइ मुँह बाए

    पलटनिहा दादा के जरसी, गोड़े मूँड़े तक लटकाए।

    खुन्थहवा कन्टोप लगाए, घौलरवा बानर जनाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    पछियाँव चला सुर-सुर-सुर-सुर, बस निकुरइ मा ओलियाइ गवा,

    कानन मा तौ जइसे कौनउ, बरछी के धार छुआइ गवा।

    दैतवा बाजै किट-किट-किट-किट, सारी देहियाँ गिनगिनाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    तपता बरि गवा चौतरा पर चौतरफा जुरी जमात अहै

    बात बातै मा महदेवना कै, गंजी जरि- जरि जात अहै।

    चरचा छिड़ जाइ गए दिन कै बुढ़ऊ का हुक्का गुड़गुड़ाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    अरहर झमकावै मूँड़ मटर के माथे रोली चन्नन भा,

    अब नए साल के आगम पर, जइसे सबकै अभिनन्नन भा।

    आलू कै आलीसान फसिल लखि-लखि के जियरा झूमि जाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    खेते-खेते मेड़े-मेड़े, मोतिन कै हार सजाए बा,

    सरसउ फूली जानौ कौनौ, नाती के गवन लिआए बा।

    नई नवेली अस धरती के का लखि-लखि के मुसकियाइ।

    गँउना मा जाडा गवा आइ॥

    जेकरे पयसरम सजी धरती, जे अन्न देइ जे भूख हरइ,

    जे आपन खून-पसीना दै, यहि दुनिया कै भण्डार भरइ।

    अब ओकर बारी आइ अहै, अब जुड़ाइ जागै अघाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    अब लौटावा लच्छिमी सहर से, लउटइँ गवईं गाँव चलें,

    जौनी झोपड़ी मा जनम लिहिन, वहि जनम जनम के ठाँव चलै।

    अब नए साल की संझा से मड़इन कै काया जगमगाइ।

    गँउना मा जाड़ा गवा आइ॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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