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अपने देसवा कै जिउ परान, सुख सम्पति धन के ठौर गाँव,

गउनै के बल सब टंट घंट, यहि धरती के सिरमौर गाँव।

आपन बगिया आपन दुआर, आपन मड़ई आपन ओसार,

अपनत्व डोर मा सबै बँधे, नाऊ पंडित धोबी कहाँर।

अपने पाँयन पर खड़ा जुगन से एकै अकथ कहानी बा,

पयसरम करै तौ राज करै, हिकमत सब कै जानी बा।

ओनकै लोटिया ठाँवै बूड़ी, जे बइठ हाँथ पर धरे हाँथ,

जे लेहे कुदारी कमर कसे, ओनके हाथन मा जगन्नाथ।

कुल नहर चलै नलकूप चलै,केतनौ के बदरा बरसि जाय,

धरती से मोती तब उपजै जब बहै पसीना चकचकाइ।

केतनौं अकास माँ उड़ै केहू, चाहै सागर माँ पौरि रहै,

जब पेट जरै चारा खातिर, सब गउनै कैती दौरि रहै।

चाहे बड़का नेता चाहे, बड़के नेता के पिछलग्गू,

चाहे साहब,चाहे सूबा, चाहे ओनकै लग्गू भग्गू।

गउना के अथक पयसरम के बल सबका बेड़ा होइ पार,

ना मानै जनम देवइया का, ओनहू गउना के करजदार।

कुल त्याग तपस्या धरम करम सब टिका गाँव के माथे बा,

दुनिया की किसमत के लकीर जोखई भरोस के हाथे बा।

जुंग-जुग से परा अँधेरे माँ जे धरती मा बाटेन अँजोर,

ओतहू के रात ओरान आजु, ओनहूँ के अँगना भवा भोर।

अब नवा-नवा रोजगार खुला, अब नई नई काया होइगै,

घूरे का दिन फेरै वाले कै, गउनौ पर दाया होइगै।

अब हरी बेगारी छोड़ि, हिरन्नू रिकसा झूमि चलाइ रहे,

पहिले दपकत की चलत रहे, अब फिल्मी गावत आइ रहे।

भै सुरू खोदाई नहरा कै, सड़कन पर धुरमुस चलै लाग,

पंडित की बगिया के पच्छिउँ, कोने पर बिजुरी बरै लाग।

अब बीड़ी बनवैं मियादीन, लरिका-परिका सब लिहे साथ,

जौने हाथन से भीख लिहेन, हाथ बनि गए जगन्नाथ।

अंतोदय कै जादू देखा, बाबू बेहना होइ गएन खान,

जब से घरमा दुकान खोलिस, पहलुआ बनि गवा पहलवान।

पुटई पंडित छोड़ेन बजार, लै लेइँ तमाकू गाँवै माँ,

लोटा टाठी जूता चप्पल, छूरी चाकू गाँवै माँ।

कोल्हू पेरत पुरखे मरिगे, अब छिन मा काम तमाम होइ,

आटा पीस तेलौ पेरै, अब बिजुरिन से सब काम होइ।

कल्लू जोलहा के इहाँ खुला, अब आलीसान बजाजा बा,

महतारी जोलहिन रही मुला, अब ओकर बेटवा राजा बा।

अब छनै पकौड़ी राधे कै, तोहि पर मोहि गाहक टूटि रहे,

केउ कहै कि बढ़िया चाय बनी, केउ कहै कि सोझै लूटि रहे।

कालीन बुनैं अब घेर्राऊ, पहलादी गाड़े अहैं लूम,

झक-झक-झक-झक-खट-खट-खट-खट गउना मा चारिउ कैत घूम।

गनपति बड़का मिस्तरी बना, कन्नी बसुली लटकाइ चले,

पहिले हमार, पहिले हमार, पीछे-पीछे सब धाइ चले।

बच्चा हलवाई कै दुकान, अस छनै जलेबी गरम-गरम,

ओहमुर मुल्ला, ओहमुर पंडित, सब एक जात, सब एक धरम।

सरकारी खुलिगा अस्पताल, मनई रातिउ माँ टिकै लाग,

अब केथा बरे के सहर जाइ, जब इहाँ दवाइउ बिकै लाग।

खुलि गवा मदरसा बारह तक, दरहीं बनिगा आलू गोदाम,

दिन रात चकल्लस मची रहै, के लखै छाँह के लखै घाम।

तब रहा मदरसा सहरै मा, गाड़िउ के टेसन दूर रहा,

पेटे कै झंखनि रही मुला, सब कैत इमान जरूर रहा।

अस कसि के काया कलप भवा, जे देखै उहै बुहाल अहै,

जे गउना के परगति रोके, अब के माई के लाल अहै।

स्रोत :
  • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 7)
  • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
  • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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