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एत्ती किरपा करे रहैं

etti kirpa kare rahain

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

एत्ती किरपा करे रहैं

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    हिंदू कही वै खलियावैं ये हूलै इसलाम कहे,

    कही रहीमा बनवै कीमा वे बोटियावैं राम कहे,

    ओनकै मंदिर ओनकै मसजिद दुइनौ आपन धरे रहें

    केउ गरीब पर जुलुम ढावैं एत्ती किरपा करे रहैं।

    हम गरीब कै देह अददही हमरे बलबूत कहाँ,

    ओनकै एकौ औझड़ थामी हमरे जोर अकूत कहाँ,

    रोज नई तरकीब निकारैं दुनिया के मति हरे रहें

    केउ के फटे गोड़ डारैं एत्ती किरपा करे रहैं।

    नेता, अफसर, मुल्ला, पंडित तब्बौ बंटाधार हियाँ,

    चरैं देस सब चरतै बाटेन के बाटै रखवार हियाँ,

    अपुना चरैं पूत हित जोगवैं नातिउ खातिर धरे रहैं

    सेंध काटि जिन आल्हा गावैं एत्ती किरपा करे रहैं।

    पेटे अगिन सनीचर गोड़े हम धावत दिन रात चली,

    एक सवारी टेसन अड्डा गोहरावत दिन रात चली,

    वे नहायँ दूधन पूतन चाहे जेतना फरे रहैं

    राह गली जिन काँटा बोवैं एत्ती किरपा करे रहैं।

    लच्छन एक कुलच्छन चारी अस बिगड़ी तकदीर हियाँ,

    लूट सके सोइ लूट लुटेरन कइ चारिउ मू भीर हियाँ,

    पँड़रू लेंइ चबाइ छिनै मा जेतना अंहरू बरे रहैं

    के के पेटे सींग मारैं, एत्ती किरपा करे रहैं।

    इन्नर परी अहै ओहमुर, ओनके जन्नत मा हूर अहै,

    पाई जे दाम लगाई नाहीं कोसन दूर रहै,

    ओनके राम रहीमा ओनके बस ओनहीं के घरे रहें

    हमका मरे सरग देखावें एत्ती किरपा करे रहे।

    लरिके राह निहारत होइहैं चल जिउ अपने गाँव चली,

    अपनी सरधा के मंदिर चल धुरियाये पाँव चली,

    मजहब की छाती पर बइठा भल भै कोदौं दरे रहें

    हमरे राम के धरम पूछें एत्ती किरपा करे रहैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 43)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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