Font by Mehr Nastaliq Web

संधियाँ लेकर

sandhiyan lekar

देवेंद्र 'देव'

देवेंद्र 'देव'

संधियाँ लेकर

देवेंद्र 'देव'

और अधिकदेवेंद्र 'देव'

    अब तलक तो,

    छटपटाहट थी,

    मुझे वातावरण से

    किंतु अब स्वीकार

    मैंने कर लिया,

    यह आवरण

    आमरण,

    कोई शिकायत

    अब नहीं तुमसे करूँगा।

    आस्था, विश्वास के,

    सब ध्वस्त हो बैठे क़िले

    बस मिले

    अवशेष,

    कोरी भावना के

    कामना के

    हाँ, मेरी आराधना के।

    प्रतिशोध—

    इतना बढ़ गया, कि

    दब गया मेरा समर्पण

    संदेह की सेनाओं के

    पैरों तले,

    अभी लौटे कहाँ,

    अनुचर

    तुम्हारे

    घर गए जो—

    संधियाँ लेकर

    फिर भी, कुछ सम्भावना थी

    शेष,

    मुझको आगमन से

    पर नयन से,

    ना कभी

    सहयोग की आशा रखूँगा।

    मैं,

    कह नहीं पाऊँगा

    तुम यह जानते थे

    किंतु फिर, क्यों चाहते थे

    सत्य को साबित करूँ

    मैं तर्क से—

    संघर्ष से मनवाऊँ अपनी बात

    आघात इतना

    सह सकूँगा मैं

    क्यों नहीं, सोचा था तुमने?

    अब कभी

    पनपी अगर यह चाह, तो

    दम घोंट दूँगा

    किंतु अब, ना स्नेहमय

    फिर द्वार पर दीपक रखूँगा,

    अब तलक तो छटपटाहट थी...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संधियाँ लेकर (पृष्ठ 60)
    • रचनाकार : देवेंद्र 'देव'
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1998

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY