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चाही आइ एहन रघुनन्दन

chahi aai ehan raghunandan

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चाही आइ एहन रघुनन्दन

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    प्रतियोगिता परीक्षा देलनि, चुन्नू जखन अनेको खेप,

    घड़ुछामे पकलहा आमपर, सुतरि गेलनि तेसर ढेप।

    मेडिकलक बनलाह छात्र, नाम लिखौलनि टाटा जाय,

    भूखन भैया तहिएसँ, सोचऽ लगला घाटाक उपाय।

    सुच्चा सरिसौ तेल लगा कऽ, नित्तह देथि मोँछपर ताव,

    बढ़बे करतनि मोल बाउकेर, दिन-दिन हमरो बढ़त प्रभाव।

    पाँच बरख धरि पड़त पुराबय, करथि सभक लग एकरे चर्च

    चारि हजार सलाना निजगुत, तकर अलावे पॉकिट खर्च।

    एकसरमे भूखन भैया बैसल-बैसल मनमोदक खाथि,

    मनसूबासँ आसिन मासक, पाड़ा जकाँ मोटायल जाथि।

    बहरघराकेँ तोड़ि, एहिठाँ बान्हब पक्का एक दलान,

    एकरा एना बनायब, ओकरा ओना करब से बनबथि प्लान।

    हस्ताक्षरक जगहपर अपने, भने लगाबथु औँठा छाप,

    मुदा पाँच बरखेक बादसँ, कहबौता डाक्टरकेर बाप।

    जागलमे सोचथि से सोचथु, सुतलोमे एतबे सपनाथि,

    गर्मी रहनि तते फुकने जे, पूसो-माघो मास भफाथि।

    देखबामे चुन्नू चन्ना सन, दस बीघा आस्था-पात,

    आब हजार-बजारक गप की? पाँच लाखसँ कम की बात?

    कनकछड़ी सन कनियाँ आनब, विदाइमे मोटरकार,

    घरमे बैसल टेलीवीजनपर, देखब सौँसे संसार।

    मनोरथक तँ पूल नमरि कऽ, गान्धी-सेतुहुकेँ टपि गेल,

    स्वर्गक सीढ़ी लागल लगमे, बूझऽ लगला अपना लेल।

    धैर्य धारि, कछमछ करैत कहुना कऽ कटलनि पाँचो साल,

    कन्यागतक घटक सब देथिन, परिचय जाथि लगौने टाल।

    दू नम्बर धन्धी समाजमेसँ, क्यौ आबि गेलनि यजमान,

    जे निधोख भऽ एहन काज लय, बहबय टाका पानि समान।

    तुरत पठौलनि तार गामसँ, 'जहिना छी तहिना चल आउ,

    मैञाँ अब-तब कऽ रहली तेँ, आबि अपन मुँह कने देखाउ।'

    चुन्नू टाटामे पढ़ैत छल, प्रगतिशील ततबा भऽ गेल,

    कऽ देलकनि भूखन भैया केर, योजित सबटा प्लाने फेल।

    युवक सभामे टका गनयबाकेँ, कहने छल बड़का रोग,

    ताही रोगेँ ग्रस्त करक हित, पिता लगौने छलथिन योग।

    मैत्रा आङनमे अरिपन दऽ, करइत छलथिन सब ओरियान,

    अब-तब की करइत छथि अबिते, भेटि गेलनि प्रत्यक्ष प्रमाण।

    देखितहिँ भूखन भैया हुलसल, बरियाती लय देल हकार,

    जुटल लोक, चुन्नूकेँ लगलनि, जेना हँसेरी हो तैयार।

    कन्यागतक घरक कोड़ो धरि, खीचि जेना आनत सब लूटि,

    साँझ होइत धरि गाम-गामसँ, गेलथिन सकल कुटुम्बो जूटि।

    सभक बीच जा बजला चुन्नू, सुनथु समस्त समाजक लोक,

    टका गनयबापर कानूनन, लागल छै सरकारी रोक।

    हमरे संग पढ़ै छथि निर्धन, मित्र हमर छथि परम अभिन्न,

    तनिक पिताकेँ देखल कन्या-दानक चिन्तासँ अति खिन्न।

    हुनक देखि दयनीय दशा, भऽ द्रवित वचन हुनका दऽ देल,

    करब विवाह ओतहि हम सेहो, मनमे दृढ़ निश्चय कऽ लेल।

    'जखन धनुष तोड़ल बिनु पुछनहि, मर्यादा पुरुषोत्तम राम,

    तखन हमर निश्चय अनुचित नहि', कहि चुन्नू लय लेल विराम'।

    पुनि बाजल—विद्या बल अर्जब, देब पिताक मनोरथ पूरि,

    मुदा टका गनबाय समाजक, बीच करथु नहि हमरा दूरि।

    सुतक बात सुनि भूखन भैया, खसला चारू नाल चितंग,

    चुन्नू चलल विवाह करऽ लय, मात्र चारि बरियाती संग।

    चाही आइ एहन रघुनन्दन, करथि समाजक जे उद्धार,

    पुत्र तथा पुत्रीक बीच पुनि, रहि नहि सकय विषम व्यवहार।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 285)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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