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देवरिया की लड़कियाँ

devariya ki laDkiyan

विवेक कुमार शुक्ल

विवेक कुमार शुक्ल

देवरिया की लड़कियाँ

विवेक कुमार शुक्ल

और अधिकविवेक कुमार शुक्ल

    दीये की लौ की तरह

    मद्धम-मद्धम जलती हैं वे

    अपनी देह की आँच में

    प्रेम उतरता है उनके जीवन में सूर्यास्त की तरह

    जब वे सूखे कपड़े लाने छत पर जाती हैं

    गोधूलि का यह समय ही होता है उनका निजी एकांत

    जब वे प्रेम से बतियाती हैं अपनी भाषा में

    उनके प्रेम को पार करने होते हैं

    भाई, पिता, परिवार, रिश्तेदार, मुहल्लेवालों के चक्रव्यूह

    कॉलेज आते हुए वे धीमी कर लेती हैं अपनी चाल

    या बारहा उतर जाती है उनकी साइकिल की चेन

    कि वे देख सकें प्रेम को नज़र भर

    उनके प्रेमपत्रों में अक्सर होती हैं वर्तनी की ग़लतियाँ

    जैसे भाषा साथ दे रही हो उनका

    भाषा जिसमें सीमित कर दिए गए हैं उनके शब्द—

    हींग, ज़ीरा, बघार, बन्ना तक

    उनके पास नहीं हैं शब्द

    देह में उमड़ती तितलियों की उड़ान के लिए

    उनसे छीन लिए गए हैं शब्द

    वसंत, स्पर्श, कंपन, मधुमास

    कि वे हाथ से निकल जाएँ

    वे लिखती हैं प्रेम को

    दाल की बघार

    धनिए की ख़ुशबू

    अमावट का खट-मिठ्ठा स्वाद

    वे चाहती हैं कि प्रेम को सँजो सकें

    देह के मर्तबान में—

    आँवले के अचार की तरह

    चक्रव्यूह में रास्ता तलाशती लड़कियाँ

    कभी-कभी पा लेती हैं प्रेम

    तो पिता बात करना बंद कर देते हैं उनसे

    भाई सालों नहीं बाँधते राखी अपने हाथ पर

    रिश्तेदार कहते हैं कि कर दिया जाए उनका श्राद्ध

    मान लिया जाए उन्हें मृत

    उन्हें चुनना होता है—

    प्रेम और घर में किसी एक को

    घर से निकली इन लड़कियों के

    नए घर में अक्सर मिलता है

    अमर स्टूडियो के पोस्टकार्ड पिक्चरों का एक कोलाज

    जिस पर लिखी होती हैं—

    ‘होगी प्यार की जीत’ या ‘love Wins’ जैसी सतरें

    घर की तरह ही नदारद होता है

    इस कोलाज से फ़्रेम

    जैसे छोड़ आई हों

    लक्ष्मण-रेखाओं का चौखटा बहुत पीछे

    देवरिया की लड़कियाँ!

    स्रोत :
    • रचनाकार : विवेक कुमार शुक्ल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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