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दैजा कै मारी कलझि –कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै

daija kai mari kalajhi –kalajhi panDit kai parabatiya marigai

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

दैजा कै मारी कलझि –कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    गीता गायत्री कै धरती, यहि दया धरम की माटी मा,

    तप जोग साधना के मंदिर केसर की गमकत घाटी मा,

    बर जहाँ राम, समधी दसरथ, गीतन मा लहरइ गंगा जल,

    सीता सावित्री सुलगइँ दैजा की छुतही परिपाटी मा।

    गै भरी माँग भा बड़ा जसन मुल टटकै अहिबतिया मरिगै।

    दैजा कै मारी कलझि-कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै।

    तरुआ खियान तौ बर पाएस जब पुरखन के परताप भवा,

    बगिया बेंचिस करजा काढ़िस दर-दर का रिनिहा बाप भवा,

    समधी का मुँह होइ गवा टेंढ़ बर मड़ए से रिसियाइ गवा

    दुरगा लछिमी की धरती पर कन्या कै जन्मै पाप भवा।

    फाँसी पर लटकी रमरतिया, कुँअना मा सुरसतिया मरिगै,

    दैजा कै मारी कलझि-कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै।

    माई की आँखिन कै पुतरी, बप्पा के राजदुलारी गै,

    भउजी के मुह बोली ननदी, भइया कै बहिन पियारी गै,

    दपकत निकरी मुल परी जाल मा बधिकन के होइके बेहाल

    सँसवाई गै उललाई गै फिर तेल छिरिक के बारी गै।

    सारी देहियाँ कलझारि उठी होतै आधी रतिया मरिगै,

    दैजा कै मारी कलझि-कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै।

    ननदी पकड़ै, ससुआ मारै, देवरा झोंटी धै झूलि जाइ,

    थोरी-थोरी बतिया लइके, ससुरउ कोखवा मा हूलि जाइ,

    बिन दाना-पानी देंह जरी लुगरी मा लाज छिपाय रही

    जेकरे साथे भाँवर घूमी आपन करतब भूलि जाइ।

    बज्जर अस छतिया, भोगत-भोगत नाना दुरगतिया मरिगै,

    दैजा कै मारी कलझिकलझि पंडित कै परबतिया मरिगै।

    हाँथो जोरिस, गोड़उ पकड़िस, दया बरे घिघियान बहुत,

    केतनउ उछरी केतनउ कूदी, जब सांसत भै अफतान बहुत,

    सबके मूड़े चढ़िगा परेत, सबका करेज पाथर होइगा,

    मुहना मा लत्ता ठूँसिन, जब रे बप्पा कहि चिल्लान बहुत।

    जइसे कुँअना मा भाँग परी कुल घरवा कै मतिया मरिगै,

    दैजा कै मारी कलझि-कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै।

    बा कहाँ दया, गा कहाँ धरम, कस परिपाटी कइसन समाज,

    मनई कै जियरा टका सेर, कस नगरी, कौन राज,

    सबके घर माटी का चूल्हा, सब फूँकै सब के आँस चुवै,

    जे कभौं सिकारी बाज बने, ओनहू के मूड़े गिरै गाज।

    आपन बिटिया रानी दुसरे कै कोहड़ा के बतिया मरिगै,

    दैजा कै मारी कलझि-कलझि पंडित कै परबतिया मरिगै।

    ...

    छंद

    पेटे चढ़ा हुमकै छोटका, बड़का बगली लगि मारत भोंड़ा,

    रात दिना कै चिचोर मँची, छतिया लरकी जनु पाकि के फोड़ा।

    जे तरसै बिन कानी धिया ओहमं चितवै नहिं दैव निगोड़ा

    पुरबज कै करनी बिगड़ी तब साल साल जोड़ा जोड़ा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 63)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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