कहाँ लिखी जाए महामारी में कविता

अनुराधा सिंह

कहाँ लिखी जाए महामारी में कविता

अनुराधा सिंह

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    क्या उन देहरियों पर बैठकर भी

    लिखी जाएँगी कभी कविताएँ

    जिनके दरवाज़ों से लोग

    फिर कभी लौटने के लिए

    ले जाए गए

    देहरी के भीतर बंदी कवि

    कविता को रौशनदान की तरह लिख लेगा

    कारावास की चाबी की तरह लिखेगा

    अधखिले फूल और पूरे खुले पंखों

    की तरह लिखेगा

    क्या उस धड़धड़ाती हुई रेलगाड़ी

    के भीतर बैठकर भी

    लिखी जाएगी एक कविता

    जिसके गंतव्य पर अब कोई नहीं रहता

    क्या अब भी कोई,

    सहस्रों प्रेमियों के मिलन की स्मृति को अपने भीतर लील चुके

    समुद्र-तट पर बैठ लिख पाता होगा एक प्रेम कविता

    जैसे श्मशान में लिखे कोई

    प्रेम, स्पर्श और आगत

    जहाँ मृत्यु बुहारती रहती है और सब कुछ

    सिवाय अपने

    जो लोग अपने नष्ट हुए प्रेम की याद में

    समुद्र तक लौटते हैं

    याद क्यों नहीं रखते

    कि लहरें रोज़ नया तट बनाती हैं

    नए प्रेमियों को अछोर सुख स्वप्न दिखाने के लिए

    पानी सब कुछ बहा ले जाता है

    स्मृति भी

    मैंने तुम्हें बहुत याद किया है,

    मृत्यु की सफ़ेदी पुते अस्पताल के गलियारों में

    एक काग़ज़ और पेन की तलब होती रही है

    सरकारी इमारतों के इन उदास कमरों में

    जैसे कभी लोकल ट्रेन के ठसाठस भरे डिब्बे में

    एक पंक्ति गढ़ने और तुम्हें याद रखने का दुराग्रह बना रहता था

    दे सको तो,

    अब भी नहीं चाहिए

    मुझे मृत्यु के बीच जीवन की कविताएँ करने के लिए

    तुम्हारे प्रेम के तरल आश्वासन की जगह

    मैंने तो गाढ़े प्रेम की कविताएँ भी

    छल का झन्नाटेदार थप्पड़ खाने के तुरंत बाद लिख ली हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनुराधा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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