Font by Mehr Nastaliq Web

छक छक छक छक बरसा पानी

chhak chhak chhak chhak barsa pani

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

छक छक छक छक बरसा पानी

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    तपतै-तपतै धरती जब महगू कै आँवा अस बरइ लाग,

    जब राह चलत पहलादी के गोड़े मा झलका परइ लाग,

    भट्ठी मा जरत लुआठा अस कस के दुपहरिया मनमनान,

    जब आगि-लागि गोड़े मूड़े लौं निकुरा तक पहुँचा परान।

    जब मिरगिसिरा के चरनन से धरती से चिनगी उधिरानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    जब पेट ताल का पचकि गवा, घटि के पताल पहुँची कुँइया,

    देंही का सब बस्तर उतारि जब हर जोतिन भंता फुइया,

    जब पसु अफनाने खूटा पर खुंथा मा चिरई भै बेहाल,

    पलटन' बोले हे हो लम्मू जानौ फिर से आवा अकाल।

    धुरिया बरूद अस उड़ै लाग बिरछन कै पाती मुरझानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    परतै पानी धरती सोन्हान, पोता चूल्हा अस महक उठी,

    जब चुई ओरौनी धार बाँधि, गुड़िया के अम्मा चहक उठी,

    बालटी, कराही, बटुआ, गगरा दिहिन ओरौनी तर लगाइ,

    जौने अमरित कै बूँद कहूँ कौनौ, कइती से बहि जाइ।

    लरिका जवान सब झूमि रहे बुढ़वत्र के जिउ कै हैरानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    डीघी तारा ताल चनौरा सब मिलके एकबरन भवा,

    जइसे पहली परखा नाहीं, संगम का पहिला चरन भवा,

    सब राह गली बंजर परती सगरौ गड़हा गड़ही भरिगै,

    भरिगै झुरई के बर्दवान रमई के मड़ही भरिगै।

    जे जहैं रहा ते तहैं मगन ग्यानी, बिग्यानी, अग्यानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    आपन रस्ता, आपन समाज, पीठी लादे आपन जोड़ी,

    सहजोग सिखावत दुनिया का चलि परी राम जी कै घोड़ी,

    सबके मन बढ़ि अकास लगा, चिउँटिउ के पखना लागि गवा,

    मेघा जब बोले टर्र-टर्र खिसियाइ दरिद्दर भाग गवा।

    बिजुरी चमकै तौ लागा थै जइसे धरती मुसुकानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    कलपै लागीं दुबिया, चकवड़ कै बिया तरे से कसमसान,

    जइसे मुर्दा की देही मा अमरित परतै जागइ परान,

    जड़ जंगम सबके पाप ताप महराजा इन्नर धोइ रहे,

    धरती के बीर सपूते कन कन मा जिनगानी बोइ रहे।

    देखतै-देखतै धरती मइया वह पहिरि लिहिन चूनर धानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    जन जन मंगल, कन कन मंगल, मंगल घर घर आँगन मंगल,

    मंगल है सगरौ छाइ रहा, बस्ती बस्ती जंगल-जंगल,

    कजरी, आल्हा, बंसरी, ढोल, लावनी, निरौनी के बहार,

    जे थामै तरक असाढ़ तीन दिन ओकर नइया होई पार।

    बीरन कै धरती भइया छाती फारै ओकर चानी।

    छक छक छक छक बरसा पानी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 27)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

    संबंधित विषय

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    ‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY