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भागू भटियारा

bhagu bhatiyara

सुखवंत कौर मान

सुखवंत कौर मान

भागू भटियारा

सुखवंत कौर मान

और अधिकसुखवंत कौर मान

    लोग उसे ऊँट कहते, और आदमी भी

    वैसे वह ऊँट ज़्यादा था, आदमी कम

    वह मँगू महरे का बेटा भागमल उर्फ़ भागू

    लेकिन वह भागू भटियारा भी था और लालू लंबू भी

    इतना लंबा वह कि गाँव का कोई भी आदमी

    उससे बौना था, लेकिन वह इतना बौना

    कि गाँव का हरेक आदमी उससे लंबा लगता।

    सावन आता, आषाढ़ आता

    माँग बनी रहती, चाय की गागरें भरी हुई

    और गठरियों-रोटियों को बहँगी पर लादकर

    वह खेतों की ओर दौड़ता, तो एकाएक

    लालू लंबू से वह पंचजी बन जाता, पंच कहलाता।

    ढही-सी एक कोठरी, टूटी-सी एक बहँगी

    और एक फटी गुदड़ी, बस उसकी यही विरासत थी

    बाएँ कंधे पर पड़ा साँड़ के कान जितना कान भी

    उसे शायद अपने बापू के बापू से ही मिला

    अलसुबह शुरू होकर रात तक वह पीपा बजाता

    चर्ख़ी पर दोहरा हुआ जाता

    उरी की तरह उधड़ता फिरकी-सा डोलता

    कुएँ के कुएँ उलट डालता पानी के

    लेकिन घड़ों के पेट भरते।

    घड़ों की तरह मुँह बाए जजमान औरतें

    इंतज़ार करतीं लेकिन साँस लेता

    बीबी जी भली हैं उसका तकिया कलाम था

    बात-बात में लोकोक्ति कह जाना उसकी आदत

    गाँव का हरेक आदमी माँ-बाप था उसका

    वह श्रवण पुत्तर था लेकिन माँ-बाप सदैव प्यासे

    बार-बार वह पानी भरता, छिपे शिकारियों के तीर

    छाती पर झेलता, प्रतिदिन मरता था।

    यजमानों की पक्की-कच्ची, मोटी-मामूली

    उसके लिए अन्न भगवान थी

    माथे से लगाकर बड़े निवाले मुँह में डालता

    वह बंदा नहीं, खेत की फ़सल बैल-सा चट करता

    भाने का पुत्तर लगा करता।

    रहट उलटे गिरते

    कुएँ जिनके पानी की ख़ैर माँगी जाती थी

    जहाँ दिवाली पर दीपक जलते

    वे पतिविहीन लगती और सिरों से नंगी कहलाती

    पंप नल तो लग गया

    यजमाननी गुड़ की रोटी उसकी

    पसरी हथेली पर टिकाती और कहती—

    अजीब-सी आँखों से वह देखता।

    कोई यजमान था, ही लागी

    वह तो वक़्त भोग चुका एक सेर भर का

    काँसे का छन्ना था

    और पड़छत्ती पर टँगा जा चुका

    जिसे अब किसी को उतारना नहीं था

    अब जिसे कभी दूध से मथकर

    ऊपर से मलाई नहीं उतारनी थी।

    अब वह और भाने का बूढ़ा पुत्तर

    दोनों किनारों पर घूमते मुँह मारते

    जब भट्टी लगती और अंगार फूटते

    जब चौक वाले वटवृक्ष के निचले चबूतरे से

    अंतिम तमाशबीन तक जा चुका होता

    जब कोई बंदा दिखता, परिंदा

    वह भूत की तरह अपनी कोठरी से निकलता

    और सूने कुओं और भरे खेतों में

    चक्रवात की तरह घूम आता।

    अजब संयोग था, भाने का पुत्तर

    और भागू भटियारा एक साथ पकड़े जाते

    भैंसा तो भैंसा था, फ़ाटक के पीछे

    बंद किया जा सकता था

    लेकिन भागू भटियारा अँधेरी कोठरी से आता

    पंचों के सामने पेश होता

    बच्चे शोर करते, पीछे-पीछे ताली पीटते चलते

    एक मजमा लगता, हँसी फूटती

    फिर बोलवाणी की लड़ाई

    पंचों का कहा सिर माथे लेकिन

    परनाला वहीं का वहीं

    भागू पगला और भाने का भैंसा

    खेत-दर-खेत सूँघते घूमते

    कुछ चर लेते, खा जाते

    और कुछ मसल-कुचल जाते।

    भाने का भैंसा और भागू भटियारा

    गाँव की मुसीबत

    मर जाने,

    एक ही रस्से से फाँसी देने योग्य

    फिर एक दिन अचानक भाने का भैंसा

    गुम हो गया शायद ऐन उसी दिन

    भागू भटियारा भी

    चोरी करता पकड़ा गया।

    इंसाफ़ तो इंसाफ़ था

    भागू की पीठ पर जूते पड़ते

    बच्चा लोग हँसते, आवाज़ें कसते रहे

    वह अब पंच था और ही पंचजी

    वह कामचोर आदिचोर था

    लेकिन कुएँ के लोग गाँव की पंचायत से

    कहीं दयावान

    दूसरे दिन, दो शव तैर रहे थे

    और कुएँ में तारे की तरह चमकते

    पानी में कुछ पता नहीं चलता था

    कि भागू भटियारा कौन था

    और भाने का भैंसा कौन?

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीसवीं सदी का पंजाबी काव्य (पृष्ठ 475)
    • संपादक : सुतिंदर सिंह नूर
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक फूलचंद मानव, योगेश्वर कौर
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
    • संस्करण : 2014

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