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बरखा कै अंत

barkha kai ant

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    कन-कन मा फूँकइ का परान बदरू अमरित बरसाइ गए,

    आपन तन-मन सरबस लुटाइ, धरती के रूप सजाइ गए।

    रिमझिम-किचबिच घटाटोप अँधियार होइ गए छूमंतर,

    गा बदलि हवा का रुख, बरखा के यार होइ गए छूमंतर।

    लै रोग दोख भागी पुरवा, जब मंद-मंद पछुआ डोली,

    सब कीट पतिंगा गे बिलाइ, मेघन कै बंद भई बोली।

    अवसर-अवसर कै बात कि जब, अवसर अपने अनुकूल मिला,

    गंधौरी गड़हिन के कीचा मा, गहगहाइ के कमल खिला।

    दुख मा आपन अवसर लखि के जे धीरज धरम सँजोआ थीं,

    ओनही एक दिन दुरदिन बीते सुख की सइया पर सोवा थीं।

    जौने उसरे मा गोड़ धरत छेवका लागत बूड़त परान,

    ओहमुर लखतै जिउ घिउ होइगा असिके अगहनिया लहलहान।

    जौने रस्ता मा धूरि उड़ी, पनहिउ पहिरे पर गोड़ जरा,

    ओनहूँ कै अवसर लौटा बा, सब जूड़-जूड़ सब हरा भरा।

    दर्रही तलइन के दिन लउटे जबसे किस समय फेरा,

    ओनहूँ अकास से होड़ लेइँ तरई अस उए कुईं बेरा।

    जे जनम-जमन के ठूँठ रहे, तन के सब टूटि चुके नल्ला,

    ऐसे बिरछन की गाँठि-गाँठि से, भरभराइ फूटे कल्ला।

    पूरब कै लाली देखि देखि, जब झरै भिनौखा हरसिँगार,

    अस लागै जइसे धरती पर उतरी बा नंदन के बहार।

    परकित के जागी कोख राम धे, मानौ सतजुग आइ गवा,

    गुलमेंहदी गेना घरे घरे, गली-गली गंधाइ गवा।

    भा नरक दूर सब धरती के अस इस्सर कइ देखा माया,

    जइसे संगम नाइ होइगै, जड़ जंगम कइ निर्मल काया।

    धै हर काँधे, फेंटा बाँधे, जब सुमिरि राम कै नाम चले,

    लागइ जइसे बलई नाहीं, महाबली बलराम चले।

    हँसिया लपकावत सुखपतिया, हँसि के मस्ती मा भरी चली,

    जरि काटै बरे दरिद्दर कै, जइसे इन्नर कै परी चली।

    कुल चहल-पहल सब मस्त मगन, जे बुढ़वा रहा उदंत भवा,

    हथिया पर चढ़ि आई बहार, सगरौ लहुरवा बसंत भवा।

    मँहतो मन मा संकलप करा, जब भरि हिकिया बरसी स्वाती,

    तब गोहूँ बेंचि महतुइन का, पहिराया सोने कै पाती।

    सब बरखा कै किरपा आ, बरखै से हरियारी अहै,

    फल फूल फसिल चारिउ कैती, धरती के कोखी भरी अहै।

    दुसरे का दुख मेटै खातिर, जे आपन सरबस दान करै,

    ओकरी करनी का सुमिरि-सुमिरि दुनिया सदा बखान करै।

    बरखा कै आइ बिदा बेला आवा सब मिलि के एक बार,

    कर जोरी सीस नवाइ कही, बरखा महरानी नमस्कार।

    जो गोंड़ी कोन कुदारी से, जेकरे खेते मा हर चलिहैं,

    भोगे माया धरती कै, ओकरी काँड़ी मूसर चलिहैं।

    नाहीं तौ पेलैं डँड मुसउनू, कसिके खेते पेटे मा,

    लच्छिमी लात मारैं पीठी, ओलियाइ सनीचर टेंटे मा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 29)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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