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जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै

je mehnat se jiu chhatkavai okai darid motan rahai

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    धरे हाथ पर हाथ बइठ जे जिनगी मा हारि गवा,

    कमर कसे कर गहे कुदारी बस बाजी मारि गवा,

    मेटि गवा दुनिया के अँधियर दिया करम कै बारि गवा

    अपनी करनी से पुरखन कै कइयउ पीढ़ी तारि गवा।

    करै पयसरम जे कातिक माँ चैत भरा खरिहान रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    बहियन के बल पै धरती के चमक-दमक सान बनी,

    बहियन के बल हीरा मोती अउर रतन कै खान बनी,

    बहियन के बल पर मनई कै गिनती पहिचान बनी

    बहियन कै बल थोर भवा तौ जिनगी कलकान बनी।

    खाए रहै भाग अस सगरौ चलतौ की ओंघान रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    बहियन के बल पै धरती के कोख हरी भरी रहै,

    बहियन के बल पै मरुथल की रेती माँ हरियरी रहै,

    जहाँ बाह कै छाँह पहुँचै माटी बस मरी रहै

    जहाँ पसीना चुऔ माथ से बेलि सुमति कै फरी रहै।

    मान कमासुत कै धरती पै सगरौ सीना तान रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    जौ पौरुख के मान घटै तौ धरती डगमग करा करै,

    पौरुख के सम्मान होइ तौ दुनिया जगमग करा करै,

    पौरुख जागै तौ कन-कन मा जीवन कै लौ बरा करै

    अन्नपूरना कै भण्डारा पौरुख वाला भरा करै।

    जहाँ चलै पौरुख के चरचा सबकै परधान रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    तीन असाढ़े तेरह कातिक मासे चौकस रहा करै,

    सीत घाम बरखा ना माने जौन परै सब सहा करै,

    बना भगीरथ करै पयसरम सबकी खातिर डहा करै

    सुख सम्पति के साथे ओकरे जस के गंगा बहा करै।

    जुग-जुग तक ओकरी करनी कै चारिउ कैत बखान रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    जे धरती के माँग सँवारै धरती के भोग करै,

    करै पयसरम छाती फारै धरती के भोग करै,

    जे माटी माँ लोहू गारै धरती के भोग करै

    पीठ दरिद्दर कै जे पारै धरती के भोग करै।

    धरती के भोग करै जे मेहनत मा अगुआन रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    बइठे-बइठे नेति बतावै ओकै चरचा काउ करै,

    खटिया परे पेट सोहरावै ओकै चरचा काउ करै,

    बोल देइ तौ रोब देखावै ओकै चरचा काउ करै

    गाँव देस के काम आवै ओकै चरचा काउ करै।

    ओकै चरचा काउ करै जे जीते मरा समान रहै,

    जे मेहनत से जिउ छटकावै ओकै दरिद मोटान रहै।

    करै पयसरम जे कातिक मा चैत भरा खरिहान रहै,

    मान कमासुत के धरती पै सगरौ सीना तान रहै,

    जहाँ होइ पौरुख के चरचा सबकै परधान रहै

    धरती के भोग करै जे मेहनत मा अगुआन रहै।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 38)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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