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अँधियार कै समुंदर

andhiyar kai samundar

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

अँधियार कै समुंदर

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    अँधियार कै समुंदर सुतुही असत दियाली,

    रात रतन धन कै भंडार बनी बाटै,

    की अस कहा कि जइसे अँधियार थहावै का,

    दियना पाँत नाहीं पतवार बनी बाटै।

    अपने घरे सबकेउ हँसि हँसि के दिया बारा,

    मूड़े गोड़ धइके अँधियार तुरत भागै,

    घूरे से लइके मंदिर तक अस अँजोर कइ द्या,

    पग पग गली गली मा बस जोत परब लागै।

    एहमुर दिया जलावा, ओहमुर दिया जलावा,

    कोठरी दिया बारा, आँगन दिया बारा,

    सब दिया बाहर कइ राह देखावा थीं,

    भीतर अँजोर चाहा तौ मन दिया बारा।

    तोहरे दिया बाती, हमरे दिया बाती,

    मिलि के अँजोर करिहैं तौ रात बीति जाई,

    मन कै सनेह सानी बाती बरै जुग-जुग,

    यह साल लच्छिमी से आवा इहै मनाई।

    मन के सनेह सानी जिनगी बरै बाती,

    आवा कि पयसरम कै मंतर चला जगाई,

    विख जौन भिना बा ओका उतारि देई,

    अँधियार के अजगर के मुह मा लुआठ डाई।

    अब बंद तिजोरी मा, लछिमी दम घुटत बा,

    बाहर निकरि के भागै का छटपटात बाटिन,

    चोरन और तसकरन के कुल जाल बिछा बाटै,

    ईदेखि के निकरै मा ओनहू डेरात बाटिन।

    कसि के कमर बँधब्या लइके करम कुदारी,

    तौ लच्छिमी बंधन अपुनै से टूटि जाई,

    जब पयसरम से चलिहैं दम साधि के हथौड़ा,

    तौ पाप के पहारन कै मूड़ फूटि जाई।

    दिन बरिस-बरिस का घूरेऊ दिन फिरा बा,

    हमरेउ करम कबहूँ कौनौ हिसाब होई,

    तेल दिया बाती सब केकरी मसक्कत से,

    जब केहू समझी तौ इनकलाब होई।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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