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भोजपुरी लोकगीत : आरे मोरे पिछुआरावा खजुरवा, त फरिके लटकि बलमू

bhojapuri lokgit ha aare more pichhuarawa khajurwa, t pharike lataki balmu

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रोचक तथ्य

संदर्भ—निर्धनता के कारण पति-पत्नी की नोंक-झोंक।

आरे मोरे पिछुआरावा खजुरवा, फरिके लटकि बलमू।

आरे चढ़हिं के रहले देवरवा, चढ़ले हमार बलमू।।1।।

आरे एक फलवा पकले गिरते, धनिया तोहार बलमू।

आरे जोड़ धनिया हेठ फुरहुरवा, पाकल गिराइबि बलमू।।2।।

आरे पकल पकल फलवा खाला, काचा का गिरावे बलमू।

धनिया काढ़ नाहि नाक के नथियवा, खरची चलाइबि बलमू।।3।।

पियवा हँसे लगि हे दरवा रे देयादवा नथिया बिकइले बलमू।

पियवा हँसे लगिहे दरवा रे देयादवा, हसुली बिकइले बलमू।।4।।

धनिया का करिहें दरवा रे देयाद, बिपति गँवाउ रे बलमू।

धनिया संपति हउवे रे सिंगार, बिपति गँवाउ रे बलमू।।5।।

एक स्त्री कहती है—मेरे घर के पिछवाड़े खजूर का वृक्ष फल कर लटक गया था। उसके फलों को तोड़ने के लिए मेरा देवर चढ़ने वाला था, किंतु मेरा पति चढ गया।।1।।

स्त्री ने पति से निवेदन किया—अरे, एक पका फल गिराते, आख़िरकार मैं

आपकी पत्नी हूँ। पति ने उत्तर दिया—तुम अपने आँचल को नीचे फैलाओ, तो मैं पका फल गिराऊँगा।।2।।

स्त्री ने कहा अरे, पके-पके फल तो आपने खा लिया और कच्चे मेरे लिए

गिराते हो। पति ने कहा—हे प्रिया! अपने नाक की नथ निकालो, जिससे मैं घर का ख़र्च चलाऊँगा।।3।।

स्त्री ने कहा—हे पति जी! मेरी नथ और हँसुली बिक जाने पर बंधु-बाँधव

हँसी उड़ाएँगे।।4।।

पति ने कहा—हे धना! बंधु-बाँधव हँसकर क्या करेंगे? संपत्ति होने पर ही साज-शृंगार शोभा देता है, विपत्ति तो किसी प्रकार बिता लेनी चाहिए।।5।।

स्रोत :
  • पुस्तक : हिंदी के लोकगीत (पृष्ठ 120)
  • संपादक : महेशप्रताप नारायण अवस्थी
  • प्रकाशन : सत्यवती प्रज्ञालोक
  • संस्करण : 2002

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