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अवधी लोकगीत : कउनी दिसा बोलै पापी पपिहरा

awadhi lokgit ha kauni disa bolai papi papihra

रोचक तथ्य

संदर्भ—प्रकृति-वर्णन।

कउनी दिसा बोलै पापी पपिहरा, कउनी दिसा बोलै मोर।

कउनी दिसा बोलैं मतवा सारदा, कउनी दिसा बाजै ढोल।।1।।

पूरुब दिसा बोलै पापी पपिहरा, उत्तर दिसा बोलै मोर।

दक्खिन दिसा बोलै मतवा सारदा, पुच्छा दिशा बाजै ढोल।।2।।

बाढ़त आवैं गंगा मइया, बेझत आवैं कगार।

बूढ़त आवै मालिन कै छोकरिया, जैसे पानी फूल उतराय।।3।।

बाढ़त आवैं गंगा मइया, ओदरत आवैं कगार।

बूड़त आवैं आल्हा-ऊदल, हाथे लिहे तरवारि।।4।।

एक विरहिणी कहती है—

किस दिशा में पापी पपीहा बोलता है और किस दिशा में मोर। किस दिशा में माता शारदा बोलती हैं और किस दिशा में ढोलक बजती है?।।1।।

पूर्व दिशा में पापी पपीहा बोलता है, उत्तर में मोर और दक्षिण दिशा में माता शारदा बोलती हैं और पश्चिम दिशा में ढोलक बजती है।।2।।

गंगा माता बढ़ती आती हैं, कगार बेझती आती हैं और माली की लड़की डूबती हुई आती है, जैसे पानी पर फूल उतराता है।।3।।

स्रोत :
  • पुस्तक : हिंदी के लोकगीत (पृष्ठ 198)
  • संपादक : महेशप्रताप नारायण अवस्थी
  • प्रकाशन : सत्यवती प्रज्ञालोक
  • संस्करण : 2002

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