प्रियंवद का रचनालोक : जहाँ मनुष्य नैतिक नहीं, मनुष्य है
पंकज प्रखर
19 अगस्त 2026
अधिमूल्यन से उत्पन्न बहुप्रशंसा और अतिव्याप्ति से उत्पन्न रुचिशीलता के इस समय में किसी के टेक्स्ट भर से आत्मीय होना, रचना और रचनाकार—दोनों के लिए—किसी पाठक को उदात्तता से भर देता है। देखने-सुनने-जानने के बहु-माध्यमों के इस दौर में घिसी-पिटी कहानियाँ हमेशा एक तरह के अनाकर्षण के साथ उपस्थित हुई हैं। मैं कानपुर में रहते हुए कई वर्षों तक प्रियंवद से अनभिज्ञ रहा। उनकी कहानी ‘ख़रगोश’ पढ़ने के बाद फिर और-और पढ़ने-जानने के क्रम में उनके साहित्य में उतरना हुआ। प्रियंवद की कथा-सृष्टि और भाषा-शक्ति मुझे उन तक बार-बार लौटाती रही है, लेकिन उनसे हुई कुछ मुलाक़ातों में वह अपने कथाकार से अधिक एक मनुष्य की तरह मिले—जीवन के बुनियादी सवालों पर चिंतित और उन पर सतत सोचते हुए।
हिंदी-साहित्य-संसार की व्यापकता में प्रवेश करते हुए जब पाठ की न्यूनतम समझाइश की निर्मिति हो चुकी होती है और उसके बाद आप कथा-साहित्य की दुनिया में गहरे धँस रहे होते हैं; तब प्रियंवद का रचना-संसार पाठक को एक ऐसी जगह ले जाता है, जहाँ जीवन—नैतिकता और अनैतिकता की सुविधाजनक कोटियों में देखे जाने से इतर—अपने यथार्थ स्वरूप में दृष्ट होता है। इस अर्थ में हम कह सकते हैं कि प्रियंवद का साहित्य मानवीय अभिव्यक्तियों को बग़ैर ओसाए, फटके, छाने—जिसे हम सहजायास [effortless] कह सकते हैं—हुए अपने भीतर समेटे हुए है।
प्रियंवद की कहानियों का समाज केवल बाहरी, तात्कालिक देखे गए यथार्थ की प्रस्तुति भर नहीं है; वह मनुष्य के भीतर लगातार घटित होते द्वंद्व, इच्छा, कुंठा, आकांक्षा, अपराधबोध और अव्यक्त कामनाओं से निर्मित मनुष्य मात्र की मूल अभिव्यक्ति है जो उसके भीतर लगातार विन्यस्त होती रहती है।
प्रियंवद की कथा-दृष्टि का महत्त्व इस बात में भी निहित है कि वह मनुष्य को किसी पूर्वनिर्धारित नैतिक निष्कर्ष के भीतर रखकर नहीं देखना चाहती। समाज मनुष्य से उसके रहने और उसके होने की क़ीमत वसूलता है। समाज की निर्मिति और उसकी संस्थाएँ मनुष्य के जीवन को जटिल बनाती हैं; जिसमें उसकी मूल संवेदना, उसकी मूल अभिव्यक्ति और उसकी सहज मानवीय अभिलाषा एक मर्यादित व्यवहार के भीतर दबती चली जाती है।
एक लेखक अपनी लिखाई और उससे इतर हमेशा अपनी कंडीशनिंग से पार जाने वाला रिस्क-टेकर होता है। इस अर्थ में प्रियंवद का रचनाकार इससे लोहा लेता है और बहुत साहसिकता के साथ यह बतलाता है कि सद्गुणों के श्वेत-पवित्र आख्यान और पतन के स्याह-वृत्तांत से इतर, मनुष्य अपने अंतर्विरोधों में निर्मित, अपनी इच्छाओं से जूझता हुआ, सामाजिक संरचनाओं के भीतर अपने लिए किसी जीवन की तलाश करता है।
‘होंठो के नीले फूल’ कहानी में बूबा कहती है—“मैं अपने होने को पूरा, पर जीना चाहती हूँ।” यह वाक्य संसार-असंसार, समाज-वैयक्तिकता और किसी भी मर्यादा-अमर्यादा, बंधनों से पार एक सहज मानविक अभिलाषा की अभिव्यक्ति है। इस कहानी को पढ़ते हुए अनायास ही यम-यमी के संवाद की तरफ़ चलना हो उठता है। ‘ऋग्वेद’ के दसवें मंडल में यमी कहती है—“यम के प्रति जागी कामना, मुझे उसी आदिम बंधन की ओर बुलाती है। मैं पत्नी की भाँति उसके प्रति समर्पित हो जाऊँ और रथ के चक्रों की तरह उससे अभिन्न होकर जुड़ जाऊँ।”
यमस्य मा यम्यं काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय।
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद् वृहेव रथ्येव चक्रा॥७॥
यहाँ यमी का यम के प्रति जो सहज दैहिक आग्रह है, जिसमें आगे चलकर यमी फिर कहती है—“कामना से दग्ध मैं तुम्हारी ओर आकृष्ट हूँ, अपने आलिंगन से देह की सीमाएँ ख़त्म करो...”—काममूता बढे तद्रपामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि... यह सहज आदिम आकांक्षा बूबा के चरित्र की परम अभिव्यक्ति है।
रूढ़िगत मान्यताओं में बँधकर, अपनी मूल संवेदना से दूर हुए मनुष्य की अमूर्त इच्छाएँ सहज रूप में प्रियंवद के यहाँ दर्ज होती है। इसीलिए वहाँ किसी भी स्पष्ट विभाजक रेखा को बार-बार धुँधला होना पड़ता है और जटिल, अस्पष्ट और कई बार असुविधाजनक सच्चाइयों को प्रकट होना पड़ता है।
‘ख़रगोश’ कहानी में कैशोर्य मन के अधिकार, स्त्री-देह के प्रथम स्पर्श और कामनाओं के उद्दीपन को लेखक ने जिस तरह रखा है, वह अप्रतिम है। इसी तरह ‘बूढ़े का उत्सव’ कहानी में समाज में लगभग असंभव और गर्हित माने जा सकने वाले विषय को प्रियंवद ने रचना में संभव किया है। पाठकीय मन की कैशोर्यता को पार करता हुआ सजग पाठक इस पर सोचने-समझने को प्रतिबद्ध हो उठता है कि यह मनुष्य के अलक्षित; लेकिन ईमानदार आग्रह के बारे में सोचना और उसे रचना में रखना करना है, जिसे प्रियंवद सरीखे कथाकार की सिद्धहस्तता प्रतीत होती है।
कोई भी अच्छी कहानी अपने पाठकों पर किसी भी प्रकार का कोई नैतिक आग्रह नहीं छोड़ती, कोई निष्कर्ष नहीं देती। पाठक अपनी समझाइश से कथ्य से जूझता हुआ उसे आत्मसात् करता है, देखता है। प्रियंवद की कहानियों में भी यह सहज ही पाया जा सकता है। एक साक्षात्कार में प्रियंवद कहते हैं—“धर्म, समाज और राज्य किसी व्यक्ति को स्वतंत्रता नहीं दे सकते, गरिमा नहीं दे सकते, उसका हित नहीं कर सकते। एक लेखक के लिए ज़िंदगी में स्वतंत्रता से बड़ा कुछ नहीं होता।”
यहाँ प्रियंवद का जो आग्रह है, जिस हित और स्वतंत्रता की वह बात कर रहे हैं, वह उनकी कहानियों में बराबर उपस्थित है। उनके पात्र अपनी अभिव्यक्ति में बग़ैर किसी आग्रह के स्वतंत्रता के पक्षधर है। वहाँ मनुष्य की महत्ता अपनी गरिमा के साथ उपस्थित है, इसलिए वहाँ महज़ देह की आकांक्षा नहीं रह जाती; अस्तित्व, आत्मीयता की तलाश, वंचना की प्रतिक्रिया और कभी-कभी अपने ही जीवन को पुनः प्राप्त करने की छटपटाहट का रूप ग्रहण कर लेती है। रचना का यह समूचा संलाप इस तरह उद्घाटित होता है कि प्रियंवद का कथा-संसार सामाजिक यथार्थ से आगे बढ़कर मनुष्य के अलक्षित यथार्थ का अन्वेषण करने लगता है।
प्रियंवद का कथा-संसार केवल घटनाओं और चरित्रों का संसार नहीं है; अपितु मनुष्य की स्वाभाविक इच्छाओं और लगातार आपसी द्वंद्व की ठीक-ठाक पड़ताल है। उनकी कहानियाँ इसी द्वंद्व में कुछ अर्थगौरव का सामीप्य उपलब्ध कराती हैं और पाठक उस मनुष्यता का नैकट्य पाता है जो सामाजिक पहचान, नैतिक विधान और स्थापित मूल्यों के पीछे कहीं अधिक जटिल, अधिक असुरक्षित और अधिक कामनाशील रूप में मौजूद है।
कहना न होगा कि हिंदी साहित्य का यह समय जब लगभग डिजिटल और सोशल मीडिया का उपद्रव उत्सव-सा प्रतीत होता है, वहाँ प्रियंवद की उपस्थिति सिर्फ़ उनके टेक्स्ट से है—और क्या ख़ूब दमदार है। हिंदी के लगभग हर सजग पाठक के अध्ययन-क्रम में वह मौजूद हैं। उनकी कहानी ‘दिलरस’ युवकोचित अभिलाषाओं को पुलकित कर देने वाली कहानी है।
मूलतः कथाकार के रूप में ख्यात प्रियंवद इतिहास-लेखन में भी सक्रिय हैं। चूँकि वह कहानीकार हैं तो उनका इतिहास-लेखन भी रोचकता से परिपूर्ण है।
प्रियंवद की कहानियों के साथ ‘परछाईं नाच’, ‘वे वहाँ क़ैद हैं’, ‘छुट्टी के दिन का कोरस’, ‘धर्मस्थल’ जैसे उपन्यास उनके कथा-संसार को एक दूसरी व्यापकता देते हैं; वहीं उनका कथेतर गद्य, बाल-साहित्य और संपादकीय कर्म उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की दूसरी दिशाओं को सामने लाता है। ‘अकार’ जैसी पत्रिका का संपादन हो या ‘संगमन’ जैसे आयोजन के माध्यम से हिंदी के रचनात्मक और वैचारिक परिदृश्य में संवाद और नई रचनाशीलता के लिए जगह बनाना—प्रियंवद का रचनात्मक व्यक्तित्व केवल अपने लिखे हुए तक सीमित नहीं रहा है। उनके यहाँ कहानी है, तो उपन्यास भी; कथा है, तो कथा के बाहर का गद्य भी; मनुष्य की जटिलताओं की पड़ताल है, तो बाल-किशोर-मन के लिए रचा गया साहित्य भी; अपना रचनात्मक संसार है, तो दूसरों के लिए जगह बनाने वाला संपादकीय और सांस्कृतिक कर्म भी। इन सबको एक साथ देखें तो प्रियंवद का महत्त्व केवल उनके लिखे हुए में नहीं; बल्कि उस व्यापक साहित्यिक-सांस्कृतिक परिसर को निर्मित करने में भी दिखाई देता है, जिसमें वे लगातार अपने समय से संवाद करते रहे हैं।
शायद इसी कारण प्रियंवद को पढ़ना केवल उनकी कथाओं और पात्रों से मिलना नहीं है; यह उस मनुष्य से मिलना भी है जो अपने समय, समाज और साहित्य के बीच लगातार संवादशील, असहमत और सक्रिय बना हुआ है। उनके रचना-संसार का यह विस्तार, उसकी बेचैनी और मनुष्य को उसकी समूची जटिलता में देखने की उनकी ज़िद ही उन्हें हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट पार्थक्य प्रदान करती है।
•••
समादृत साहित्यकार-इतिहासकार-संपादक प्रियंवद इस बार के ‘हिन्दवी उत्सव’ में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित हैं। ‘हिन्दवी उत्सव’ से जुड़ी जानकारियों के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव-2026
संबंधित विषय
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट