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पिंजरा तोड़ : मेरा पहला प्रोटेस्ट

6 अक्टूबर 2026 की शाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के आस-पास कुछ अलग हो रहा था। शाम लगभग पाँच बजे छात्रावास के सामने लोग जमा होने लगे। थोड़ी ही देर में इस प्रदर्शन में करीब 300-350 लोग शामिल हो गए। इनमें छात्राओं के साथ बड़ी संख्या में छात्र भी थे। छात्र समूहों और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने मिलकर महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता, सुरक्षा और सशक्तीकरण के लिए आवाज़ उठाई। इस प्रदर्शन का नाम था—‘पिंजरा तोड़’।

यह नाम ही अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए था। पिंजरा सिर्फ़ लोहे की सलाख़ों से नहीं बनता। कई बार समाज के बनाए नियम, डर, सोच और पाबंदियाँ भी महिलाओं के लिए पिंजरा बन जाती हैं। इस प्रदर्शन में इसी पिंजरे को तोड़ने की बात हो रही थी।

उस दिन भी लगभग रोज़ की तरह हमारे नाटक की प्रस्तुति का पूर्वाभ्यास शाम चार बजे से स्वराज विद्यापीठ में चल रहा था, जो महिला छात्रावास के ठीक सामने है। क़रीब पाँच बजे बाहर से नारेबाज़ी की आवाज़ें आने लगीं। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी और मेरा ध्यान रिहर्सल से हटकर उधर चला गया। मन में बेसब्री और रोमांच-सा होने लगा। आख़िरकार मैंने अपने टीचर से पूछ ही लिया, “सर, क्या मैं अभी जा सकती हूँ?”

उन्होंने कहा, “हाँ, यह सीन पूरा कर लो, फिर चली जाना।”

लेकिन मेरा ध्यान रिहर्सल में लग ही नहीं रहा था। मेरे साथियों का भी लगभग यही हाल था। हम सबका मन लगातार उसी तरफ़ लगा हुआ था और नारे सुनकर वहाँ जाने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। आख़िर में हमने सर से कहा कि आज की प्रैक्टिस यहीं ख़त्म कर देते हैं। सर ने भी हमारी स्थिति समझी। उन्होंने देखा कि हम सबका जाने का कितना मन है, तो कह दिया, “ठीक है, आप लोग जाइए।”

महिला छात्रावास के बाहर से ही नारेबाज़ी शुरू हो गई थी। डफली बज रही थी और लोग पूरे जोश के साथ नारे लगा रहे थे :

“नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की!”

“तोड़ के रख दो वो समाज, नारी जिसमें बँधी है आज!”

“स्मैश पैट्रिआर्की!”

इन नारों में सिर्फ़ आवाज़ नहीं थी, ग़ुस्सा भी था, सवाल भी थे और बदलाव की इच्छा भी। सब एक साथ वही बातें कह रहे थे। उस समय ऐसा लग रहा था, जैसे हर व्यक्ति अपने भीतर दबी किसी-न-किसी बात को बाहर निकाल रहा हो।

महिला छात्रावास से शुरू हुआ यह मार्च शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क की दिशा में आगे बढ़ा। पूरे रास्ते नारे लगते रहे। डफली और लोगों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती रही। पार्क के भीतर पहुँचने के बाद भी प्रदर्शन जारी रहा। वहाँ भी महिलाओं के अधिकारों, उनकी स्वतंत्रता और पितृसत्तात्मक सोच के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई। इतने बड़े प्रदर्शन के बावजूद पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहा। किसी तरह की तोड़फोड़ या हिंसा नहीं हुई। लोगों ने अपनी बात आवाज़ और नारों के ज़रिये रखी।

यह मेरा पहला प्रदर्शन था और शायद इसी वजह से मेरे लिए इसका अनुभव और भी ख़ास था।

मैं व्यक्तिगत रूप से स्त्रीवादी विचारधारा में विश्वास करती हूँ। इसलिए जब मुझे इस प्रदर्शन की जानकारी मिली, तो इसमें शामिल होना ज़रूरी लगा। मैं केवल बाहर खड़े होकर इसे देखना नहीं चाहती थी। मैं ख़ुद उस भीड़ का हिस्सा बनना चाहती थी, नारे लगाना चाहती थी और उन स्त्रियों के साथ खड़ी होना चाहती थी; जो अपने अधिकारों और स्वतंत्रता की बात कर रही थीं।

जब मैंने भी भीड़ के साथ नारे लगाने शुरू किए, तो भीतर एक अलग ही तरह की भावना महसूस हुई। ऐसा नहीं लग रहा था कि मैं केवल दूसरों के साथ नारे दोहरा रही हूँ। मुझे महसूस हो रहा था कि वे सारी बातें मेरे अपने दिल से निकल रही हैं। उस पल भीतर एक अलग तरह की शक्ति का अनुभव हो रहा था।

अकेले में हम बहुत-सी बातें सोचते हैं। महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं की चर्चा करते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट देखते हैं, उनके बारे में पढ़ते हैं। लेकिन जब उन्हीं बातों को सैकड़ों लोग एक साथ सड़क पर खड़े होकर कहते हैं, तो उनका प्रभाव अलग होता है। जो बात अकेले में एक विचार भर होती है, वह सामूहिक आवाज़ में बदलकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगती है।

इस प्रदर्शन की एक अच्छी बात यह भी रही कि इसमें पुरुष छात्र बड़ी संख्या में शामिल हुए। उन्होंने केवल खड़े होकर प्रदर्शन नहीं देखा, बल्कि महिलाओं के साथ मिलकर पूरे जोश से नारे भी लगाए। मुझे यह देखकर अच्छा लगा, क्योंकि महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा को केवल महिलाओं की ज़िम्मेदारी मानना सही नहीं है। जिस समाज में पितृसत्तात्मक सोच मौजूद है, उसे बदलने की ज़िम्मेदारी भी पूरे समाज की होनी चाहिए। अगर पुरुष भी महिलाओं के साथ खड़े होकर बराबरी और स्वतंत्रता की माँग कर रहे हैं, तो यह बदलाव की दिशा में एक ज़रूरी क़दम है।

लेकिन इस पूरे प्रदर्शन का सबसे ज़्यादा सोचने पर मजबूर करने वाला हिस्सा मेरे लिए उसके ख़त्म होने के बाद शुरू हुआ।

जब मैं वापस छात्रावास की तरफ़ जा रही थी, तो आस-पास की कई लड़कियों को समय को लेकर बात करते सुना :

“आठ बज रहे हैं।”

“साढ़े आठ हो गए।”

“नौ बजे से पहले हॉस्टल पहुँचना है।”

“गेट बंद हो जाएगा।”

कुछ देर पहले तक हम महिलाओं की आज़ादी की बात कर रहे थे। हम कह रहे थे कि महिलाओं को किसी के बनाए पिंजरे में नहीं रहना चाहिए। हम पितृसत्ता के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे। लेकिन उसी प्रदर्शन में शामिल लड़कियों के मन में यह भी चल रहा था कि उन्हें कितने बजे तक छात्रावास लौटना है।

यहीं से मेरे मन में एक सवाल उठा : आख़िर हम कितना आगे बढ़ पाए हैं?

हम महिलाओं की आज़ादी की बात कर रहे हैं, लेकिन उसी समय कई महिलाओं को अपनी सुरक्षा, समय और छात्रावास के नियमों की चिंता करनी पड़ रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा या छात्रावास के नियम होने ही नहीं चाहिए। सुरक्षा आवश्यक है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं की सुरक्षा का अर्थ बार-बार उनकी आज़ादी को सीमित करना ही क्यों हो जाता है? किसी लड़की के देर से बाहर रहने पर सबसे पहला सवाल यही क्यों होता है कि वह इतनी देर तक बाहर थी ही क्यों? सवाल यह क्यों नहीं उठता कि उसे ऐसा सुरक्षित माहौल क्यों नहीं मिल पा रहा, जहाँ वह बिना डर के बाहर रह सके?

अगर किसी लड़की को हर पल यह सोचना पड़े कि कोई उसे ग़लत नज़र से देख सकता है, उसके साथ कुछ ग़लत हो सकता है या उसे तय समय पर लौटना ही होगा, तो इसका अर्थ है कि हमारे समाज में अभी बहुत कुछ बदलना बाक़ी है। शायद यही इस पूरे प्रदर्शन का सबसे बड़ा सच भी है।

एक दिन का प्रदर्शन पितृसत्ता को समाप्त नहीं कर सकता। कुछ घंटों की नारेबाज़ी से समाज की सालों पुरानी सोच भी तत्काल नहीं बदल सकती। लेकिन ऐसे प्रदर्शन ज़रूरी हैं, क्योंकि वे कम-से-कम उन सवालों को सामने लाते हैं, जिन पर अक्सर चर्चा नहीं होती। महिलाओं की आज़ादी का अर्थ सिर्फ़ इतना नहीं कि उन्हें पढ़ने या काम करने का अधिकार मिल जाए। आज़ादी का अर्थ यह भी है कि वे अपने फ़ैसले ख़ुद ले सकें, अपनी बात खुलकर कह सकें और हर समय डर तथा सामाजिक दबाव के बिना अपनी ज़िंदगी जी सकें।

महिलाओं की सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर उनकी दुनिया को छोटा कर देना समाधान नहीं हो सकता।

मेरे लिए ‘पिंजरा तोड़’ में शामिल होना इसलिए ख़ास रहा, क्योंकि मैंने पहली बार किसी प्रदर्शन को केवल देखा नहीं, बल्कि उसका हिस्सा बनकर महसूस किया। मैंने जाना कि जब सैकड़ों लोग एक साथ किसी बात पर आवाज़ उठाते हैं, तो उस आवाज़ में कितनी ताक़त होती है। मैंने यह भी महसूस किया कि स्त्रीवाद केवल किताबों में पढ़ने या सोशल मीडिया पर बात करने की चीज़ नहीं है। वह उन सवालों से भी बनता है, जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन में मौजूद हैं।

लेकिन इस प्रदर्शन ने मुझे केवल ख़ुशी या गर्व नहीं दिया। इसने मेरे भीतर एक ऐसा सवाल भी छोड़ दिया, जिसका जवाब शायद इतनी जल्दी नहीं मिलेगा। अगर हम पिंजरा तोड़ने की बात कर रहे हैं, तो क्या हम उन छोटे-छोटे पिंजरों को भी पहचान पा रहे हैं, जो अब भी हमारे साथ मौजूद हैं?

कभी वे समय की पाबंदी के रूप में सामने आते हैं, कभी सुरक्षा के भय के रूप में, कभी लोगों की नज़रों के रूप में और कभी इस आशंका के रूप में कि लोग क्या कहेंगे! कभी वे इस सोच में छिपे होते हैं कि एक लड़की को अपनी आज़ादी से पहले अपनी सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए।

शायद असली बदलाव का दिन वह होगा, जब किसी लड़की को अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठाते हुए अपनी सुरक्षा को लेकर डरना न पड़े।

उस शाम सैकड़ों लोग मिलकर आवाज़ उठा रहे थे, लेकिन उन तमाम आवाज़ों के बीच मेरे मन में एक सवाल सबसे देर तक बना रहा—आख़िर वह दिन कब आएगा, जब स्त्रियों को अपनी आज़ादी के लिए ‘पिंजरा तोड़’ का नारा लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी?

हालाँकि, इस पूरे प्रदर्शन में एक बात ऐसी भी थी, जो मुझे थोड़ी खटकी। जिस मुद्दे को लेकर हम सब ‘पिंजरा तोड़’ के नाम पर एक साथ सड़क पर उतरे थे, प्रदर्शन के दौरान ही अलग-अलग संगठनों और छात्र-समूहों की अपनी-अपनी नारेबाज़ी भी शुरू हो गई। कुछ जगह ऐसा लगने लगा कि स्त्रियों की स्वतंत्रता और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ एक साथ उठने वाली आवाज़ अलग-अलग समूहों की पहचान और उनके अपने नारों में बँट रही है।

मुझे लगा कि उस समय सबसे ज़रूरी था कि सभी लोग एक ही मुद्दे पर साथ रहें और प्रदर्शन की मूल भावना को केंद्र में रखें। अलग-अलग समूहों की अपनी विचारधाराएँ और पहचान होना अपनी जगह है, लेकिन ऐसे सामूहिक प्रदर्शन में मुद्दा किसी संगठन से बड़ा होना चाहिए। जब लड़ाई एक साझा मुक्ति की हो, तो आवाज़ों का अलग-अलग पहचान में बँट जाना उसकी ताक़त को कम कर सकता है। पिंजरा तोड़ने के लिए केवल सड़क पर उतरना ही काफ़ी नहीं; यह भी ज़रूरी है कि हम उस साझा उद्देश्य को बचाए रखें, जिसके लिए एक साथ आए हैं।

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