माता प्रसाद पुस्तकालय के लोकार्पण समारोह का वीडियो देखा हाल
मनीष चौरसिया
09 मार्च 2026
इतना काम है कि सारा काम ठप्प पड़ा है।
—श्रीलाल शुक्ल
श्रीलाल शुक्ल के इस उद्धरण से शायद ही कोई अपरिचित हो। आए दिन इसका प्रयोग हममें से अधिकतर लोग अपने नकारेपन को जस्टिफ़ाई करने के लिए करते ही रहते हैं और ख़ासकर मेरे जैसे बेरोज़गार युवा, श्रीलाल शुक्ल के ही शब्दों में कहें तो— जो घास छील रहे हैं, यानी पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने ‘राग दरबारी’ में यह बात 1968 में लिखी लेकिन मुझे लगता है यह बात उस समय से ज़्यादा आज के समय के लिए प्रासंगिक है। आप में से अधिकतर लोग मेरी बात से सहमत भी होंगे और अगर नहीं भी हैं, तो मैं आपको सहमत करा दूँगा। आप मेरे साथ कुछ वक़्त गुज़ार लीजिए।
कहने के लिए मैं भी घास छीलता हूँ... सॉरी! मेरा मतलब है—पीएचडी करता हूँ। क़ाइदे से मुझे अपने विषय पर काम करना चाहिए। रिसर्च पेपर लिखना चाहिए। आगामी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की परीक्षा—जो 31 मई को निर्धारित है—के लिए पढ़ाई करनी चाहिए। करने को मेरे पास ढेरों काम हैं, लेकिन मैं क्या करता हूँ—इनमें से कुछ भी नहीं। आज का ही दिन ले लीजिए, आज है 8 मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस। इसके अवसर पर ‘सबद—शब्दों की दुनिया का एक छोटा-सा इंद्रधनुष’ में ‘स्त्री मुक्ति के दावे : वादे और इरादे’ विषय पर व्याख्यान होना था और साथ ही इलाहाबाद में सक्रिय कवियों का कविता पाठ भी। सोचा था इस कार्यक्रम में जाऊँगा, पर नहीं गया। सोचा यह भी था कि 10 मार्च से पहले अपने शोध विषय का एक अध्याय लिख लेना है, लेकिन उसके लिए जो संदर्भ किताबें ख़रीद कर लाया हूँ, अभी तक पढ़ी नहीं। आप सोचेंगे फिर मैं कर क्या रहा हूँ? कल के पूरे दिन चेक लेखक यान ओत्चेनाशेक [Jan Otčenášek] का उपन्यास ‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’ [हिंदी अनुवाद : निर्मल वर्मा] पढ़ रहा था।
आज सुबह [यद्यपि घड़ी 11 बजने का संकेत दे रही थी, पर मेरे लिए यह प्रातःकाल ही था, जैसा कि किसी महापुरुष ने कहा है—“जब जागो तभी सवेरा।”] जब मैं जागा, उसके बाद छात्रावास की छत पर ब्रश करते हुए टहल रहा था। कान में ईयरबड लगे थे और एक चर्चित पॉडकास्ट चल रहा था। साथ ही साथ हॉस्टल के छत पर बनी गुंबदों, मेहराबों और नई हरी धानी पत्तियों से लदे पेड़ों, उनपर बैठे कबूतरों की मोबाइल से ही तस्वीरें खींच रहा था। लगभग ढाई घंटे का पॉडकास्ट सुनने के बाद, सोचा पढ़ूँगा लेकिन आदत से मजबूर कुछ देर इंस्टाग्राम पर रील स्क्रॉल करने लगा। फिर याद आया कि आज भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच टी-20 विश्वकप का फ़ाइनल भी है। रात का वक़्त तो उसी में चला जाएगा। ऐसा करते हैं अब तो कुछ पढ़ ही लेते हैं। और तभी सौरभ द्विवेदी का पोस्ट दिखा, जिसमें इस बात की जानकारी थी कि माता प्रसाद पुस्तकालय का लोकार्पण होना है।
फिर आदतन यूट्यूब खोला तो देखा उस कार्यक्रम का लाइव कवरेज हो रहा है। मंच पर—राज्यसभा के उपसभापति, हरिवंश नारायण सिंह; उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, ब्रजेश पाठक; नोबेल पुरस्कार विजेता, कैलाश सत्यार्थी; कुमार विश्वास; विकास दिव्यकीर्ति; स्टैंड-अप कॉमेडियन, जाकिर ख़ान; सोनाली बेंद्रे; पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, अशोक लवासा; गिरिजा ओक; और ऐसे अनेक प्रभावशाली व्यक्तित्व। ये सभी एक साथ, एक ही आह्वान पर—सौरभ द्विवेदी के निमंत्रण पर—एकत्र हुए थे। यही उनकी सच्ची पूँजी है। उनकी अनेक बातों से असहमत हुआ जा सकता है। उन्हें पसंद-नापसंद किया जा सकता है। लेकिन उनका यह काम काबिल-ए-तारीफ़ है।
आप यक़ीन नहीं करेंगे, मैं—लगभग 5 घंटे 44 मिनट तक इस कार्यक्रम को लाइव देखता रहा। इतना खलिहर हूँ मैं। और जब इतना देख ही लिया है तो आपको भी इसके कुछ हाइलाइट्स बता ही देता हूँ। जो इस प्रकार हैं :
बुंदेलखंड की माटी में बसे चमारी गाँव में हाल ही में संपन्न हुआ ‘माता प्रसाद पुस्तकालय’ का लोकार्पण समारोह मात्र एक औपचारिक उद्घाटन नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण परिवेश में एक ‘वैचारिक पुनर्जागरण’ का शंखनाद था। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस समागम को एक अद्भुत ‘तहरी’ या ‘खिचड़ी’ के रूप में परिभाषित किया। जिस प्रकार एक उत्तम तहरी में विभिन्न अवयव मिलकर एक विशिष्ट स्वाद रचते हैं, उसी प्रकार इस मंच पर ज्ञान, विज्ञान, साहित्य, राजनीति और सिनेमा के सुरों का जो संगम हुआ, वह सामाजिक नवाचार का एक अनूठा ‘प्रोटोटाइप’ [Prototype] है।
आज जब गाँव-गाँव तक डिजिटल क्रांति पहुँच चुकी है, तब इसके साथ आई ‘मोबाइल की लत’ बच्चों को रचनात्मकता से दूर कर मानसिक विकृति की ओर धकेल रही है। सौरभ द्विवेदी की माता, मधु प्रभा द्विवेदी ने इस आयोजन के माध्यम से आगाह किया कि पुस्तकालय की प्रासंगिकता अब केवल पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस डिजिटल कुंठा से मुक्ति का मार्ग है जो हमारी भावी पीढ़ी को खोखला कर रही है।
संपादक-पत्रकार सौरभ द्विवेदी और उनकी साथी गुंजन सांगवान की यह पहल ‘गिविंग इट बैक’ [समाज को लौटाने] के दर्शन का जीवंत उदाहरण है। ‘सामाजिक पूँजी के विकेंद्रीकरण’ की दिशा में यह एक साहसिक क़दम है। उन्होंने अपनी समस्त चल-अचल संपत्ति और यहाँ तक कि अपनी देह को भी समाज के लिए समर्पित कर दिया है। यह ‘तेरा तुझको अर्पण’ और ‘वस्तु गोविंदम समर्पत’ के प्राचीन भारतीय आदर्शों का आधुनिक राष्ट्रवाद या ‘देशराग’ में रूपांतरण है।
सौरभ द्विवेदी ने इस संकल्प को इन शब्दों में स्पष्ट किया—“हमने यह संकल्प लिया है कि हमारी सारी चल और अचल संपत्ति ‘देशराग’ के नाम होगी। सारी संपत्ति समाज के लिए है। हमने देहदान का संकल्प लिया है। शरीर समाज का, राष्ट्र का; संपदा समाज की, राष्ट्र की। शास्त्रों में कहा गया है—‘वस्तु गोविंदम समर्पत’।”
यह पुस्तकालय केवल किताबों के लिए खड़ी की गई ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के लिए एक ‘अभयारण्य’ [भय-मुक्त स्थान] है। गुंजन सांगवान ने एक सूक्ष्म परंतु पीड़ादायक अवलोकन साझा किया कि चमारी के उस विशाल जनसमूह में अधिकांश उपस्थिति पुरुषों की थी। उन्होंने संकल्प लिया कि इस पुस्तकालय के माध्यम से यह परिदृश्य बदलेगा और आगामी पुस्तकालयों की अग्रिम पंक्ति बुंदेलखंड की बेटियों और बहुओं से सजी होगी।
इसे एक ‘शक्ति केंद्र’ के रूप में डिजाइन किया गया है, जहाँ लड़कियों के लिए एचपीवी [HPV] वैक्सीन और सर्वाइकल कैंसर के प्रति जागरूकता अभियान, गायनोकोलॉजिस्ट के माध्यम से मेंस्ट्रुएशन हाइजीन पर गहन प्रशिक्षण और महिला सेल्फ़ हेल्प ग्रुप्स [SHG] का गठन और उनकी व्यावसायिक मास्टर ट्रेनिंग होगी।
विकास दिव्यकीर्ति ने प्रोफ़ेसर सुगत मित्र के ‘ग्रैंडमदर इफ़ेक्ट’ के माध्यम से एक गंभीर सामाजिक दर्शन प्रस्तुत किया। शोध बताते हैं कि यदि बच्चों [विशेषकर लड़कियों] के सीखने की प्रक्रिया के दौरान कोई स्नेहिल व्यक्तित्व केवल उनकी पीठ थपथपाने और शाबाशी देने के लिए खड़ा हो, तो उनके सीखने का स्तर 30 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि ‘पढ़ाई ही एकमात्र रास्ता है अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से जीने का’। लक्ष्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि इतना विवेकशील बनना है कि युवा ‘नौकरी माँगने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले’ उद्यमी और विचारक बन सकें। यह मानसिक स्वायत्तता ही असली शिक्षा है।
चमारी का यह पुस्तकालय इसी ‘शाबाशी की ताक़त’ को संगठित करने का प्रयास है। हमें उन शक्तियों के विरुद्ध समाज को एक ‘ढाल’ [Shield] के रूप में तैयार करना होगा जो बेटियों को घर की देहरी लांघने से हतोत्साहित करती हैं। समाज की भूमिका केवल संसाधन जुटाना नहीं, बल्कि उन बेटियों के आत्मविश्वास का रक्षक बनना है।
सौरभ द्विवेदी ने न्यूयॉर्क पब्लिक लाइब्रेरी के अपने अनुभवों से सीखा कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके सैन्य या आर्थिक तंत्र में नहीं, बल्कि ‘ज्ञान की क़द्र’ करने में निहित है। किताबें ‘लोकतंत्र’ का सबसे शुद्ध रूप हैं। उनके अनुसार, किताबें यह नहीं पूछतीं कि पाठक किस जाति का है, उसके पिताजी के ख़लीते में कितना पैसा है या उसकी ज़मीन की खसरा-खतौनी क्या है। ज्ञान का यह द्वार सभी के लिए समान रूप से खुला है, जो केवल पाठक की लगन और निष्ठा की माँग करता है।
कुमार विश्वास और ब्रजेश पाठक ने इस बात पर बल दिया कि यह पुस्तकालय केवल ‘सिपाही-दरोगा’ बनाने वाली फ़ैक्ट्रियाँ नहीं होने चाहिए। आज के दौर में जब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस [AI] का विस्तार हो रहा है, तब डिजिटल स्क्रीन मनुष्य को ‘सृजनात्मक रूप से पंगु’ बना रही है। इसके विपरीत, पुस्तकें मनुष्य की कल्पनाशीलता को जीवित रखती हैं।
नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने इस पहल को ‘ज्ञान महायज्ञ’ की संज्ञा दी और सौरभ-गुंजन को इस यज्ञ का ‘होता’ [जो सर्वस्व न्योछावर करे] बताया। बुंदेलखंड में 100 पुस्तकालयों के निर्माण का यह संकल्प केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम का परिणाम है।
इस महायज्ञ में उन ‘देवताओं’ का विशेष उल्लेख अनिवार्य है जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इस स्वप्न को आकार दिया—चाहे वे आर्किटेक्ट विश्वजीत तिवारी हों, या राजस्थान के वे परिश्रमी मज़दूर जिन्होंने अपने पसीने से लाल पत्थरों को तराशा। यह उन श्रमिकों और शिल्पियों के प्रति कृतज्ञता है, जिन्होंने समाज को एक नया ‘ज्ञान मंदिर’ सौंपा है।
चमारी का यह पुस्तकालय बुंदेलखंड की धरती पर संभावनाओं का एक नया सवेरा है। यह लेख हमें एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा करता है। भवानीप्रसाद मिश्र की अमर पंक्तियाँ हमें झकझोरती हैं—
कुछ लिख के सो
कुछ पढ़ के सो
तू जिस जगह जागा सवेरे
उस जगह से बढ़ के सो!
आज चमारी ने पूरे देश के सामने यह प्रश्न रखा है कि सामाजिक परिवर्तन के इस युद्ध में हमारी भूमिका क्या होगी? क्या हम ‘शल्य’ की तरह दूसरों को हतोत्साहित करने वाले और कुंठा फैलाने वाले बनेंगे, या हम ‘कृष्ण’ के रूप में सारथी बनकर गाँव के युवाओं और बेटियों का मार्ग प्रशस्त करेंगे? चुनाव हमारा है, और चमारी का यह पुस्तकालय उस सही चुनाव की पहली सीढ़ी है।
अभी मैं जब यह लिख रहा हूँ—भारत ने न्यूज़ीलैंड को 96 रनों से हराकर विश्वकप जीत लिया है। चारों तरफ़ जश्न का माहौल है, पटाखे ही पटाखे फूट रहे हैं...
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट