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कहानी : क्या सच, क्या झूठ

“फूल क्यों तोड़ रही हो?” 

पीछे से आई गार्डनर की कड़क आवाज़ पर हव्वा सकपका गई... “मालकिन रोज़ तुड़वाती है” कह ज़ब्ह के लिए तैयार मेमने सी तेज़-तेज पलकें झपकाने लगी।

भ्रांति में पड़कर वह हमेशा ऐसा ही करती है और उसकी मालकिन सुनीता घबरा जाती है। सुनीता अभी दार-ए-सलाम में नई है अतः इनके छोटे -छोटे हथकंड नहीं समझती और उसे यक़ीन है ये बहुत भोले मानुष हैं, इनके तईं जो भी सुना है अफ़वाह मात्र है। बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं सब !

यहाँ आने से पहले सरकारी तफ़्सील पढ़कर सुनीता पर अजीब-सा भय चढ़ आया था, जाने कैसे कटेंगे तीन बरस? पेशतर में बदली पर आकर जा चुके मिसेज सेन से बातचीत कर तसल्ली हुई कि “वैसे तो डरने की कोई बात नहीं किंतु चेत कर रहने की ज़रूरत है, स्थानीय भोले भी बहुत हैं और शातिर भी कम नहीं!”

तंजानिया उनका अंतिम पड़ाव है। इसके बाद प्रभास जी रिटायर हो जाएँगे और ख़ानाबदोशी का अंत हो जाएगा। यूँ रोज़ी-रोटी की इस चाल से सुनीता को कोई ख़ास शिकवा नहीं, किंतु हर तीन बरस पर देश बदलने से उनकी दुनिया उथल-पुथल हो जाती रही है। पहला एक साल देश और वहाँ की भाषा समझने में बीत जाता है, दूसरे वर्ष में अपनापन पनपता है और तीसरे वर्ष में अगले देश की तैयारी शुरू हो जाती है।

यहाँ आने की तैयारी भी बरसों पहले शुरू हो गई थी। पहली तैयारी हमेशा मानसिक होती है। एक अलग जियोग्राफ़ी, अलग रहन-सहन और भाषा के लिए ख़ुद को तैयार करना पड़ता है। वैसे तो वह ढल गई है, लेकिन इस बार जर्मनी जैसे विकसित और ठंडे देश के बरअक्स पिछड़ा हुआ और गर्म देश, ऊपर से लोगों के रंग-रूप भी नितांत भिन्न—वह सोचती है।

किंतु भारतीय इतने कि भारत से दूर रहने का एहसास ही नहीं होगा। समंदर किनारे बसा कमर्शियल कैपिटल दार-ए-सलाम शहर बहुत कुछ मुंबई जैसा है, मिसेज़ सेन ने कहा।

“अगले तीन बरस भारत में रहने की प्रैक्टिस समझ लेना,” प्रभास जी ने हँसते हुए कहा था।

मिसेज़ सेन से मालूम हुआ, वहाँ इंदिरा गांधी स्ट्रीट है और टेंपल स्ट्रीट भी। हिंदू धर्म को मानने वाले सभी समुदायों के मंदिर सड़क की दोनों ओर पाँत में हैं। पर्व-त्योहार भी भारत से अधिक उल्लास से, मिल-जुलकर मनाए जाते हैं। सुनीता उल्लसित लग रही थी।

प्रभास जी को सुनीता का यही सकारात्मक रवैया सबसे अधिक पसंद है—हर बात, हर स्थिति में मात्र अच्छाई ढूँढ़ना और ख़ुश रहना। यही उनके जीने का ढब रहा है।

“सुनो, वहाँ घरेलू सहायिकाएँ आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। तुम्हारे बुढ़ापे का ख़याल किया है सरकार ने।” प्रभास जी की आवाज़ में नेह छलक आया था।

“मैं देह में ज़ंग नहीं लगने दूँगी। जब तक ख़ुद कर सकती हूँ, करूँगी अपने काम आप ही!”

“तुम्हारी मालकिन गँवार है क्या?” गार्डनर ने बुरा-सा मुँह बनाते हुए हव्वा से कहा।

गाज सुनीता पर गिरते देख और ख़ुद के बाल-बाल बचने की ख़ुशी हव्वा से सँभाले नहीं सँभली, वह हँस पड़ी।

“शुरुआत में आश्चर्य तो मुझे भी हुआ था, लेकिन मालकिन रोज़ तुड़वाती है।”

“सनकी औरत है,” गार्डनर ने हिक़ारत से कहा।

चार पायों वाली लाल रंग की एक छोटी-सी लकड़ी की नमूनेदार आकृति है। उस पर कई सारी तस्वीरें रखी हैं। सामने से खुले एक आले के समक्ष ज़मीन पर छोटी-सी कालीन बिछाकर वह बैठती है। फिर अटपटी-सी भाषा में कुछ बोलती-पढ़ती है और इन फूलों को उन तस्वीरों के पास रख देती है। एक दिया भी जलाती है और अत्तर का धुआँ भी करती है—रोज़, महीने के चार दिन छोड़कर।

हव्वा को लग रहा है कि जितनी अधिक मालूमात वह देगी, फूल तोड़ने के अपराध में उसकी भागीदारी उतनी ही कम होती जाएगी।

गार्डनर बगल में मुँह पर हाथ धरे सुन रही है।

“एक छोटी-सी कटोरी में बादाम भी रखती है और कभी-कभी तो फल और मीठा भी। शायद वे ख़ास दिन होते हैं। उस दिन कपड़े भी ज़रा नए और चमकदार होते हैं।”

सुनकर गार्डनर की आँखें अचरज से फैल गईं।

“इस तरह के लोग तो उपाँगा में रहते हैं। मैंने दूसरी कामवालियों से सुना है।”

“मैं अधिक नहीं जानती। इस काम में अभी नई हूँ।”

“क्या तुम ‘दार डाडा’ज व्हाट्सऐप ग्रुप की सदस्य नहीं हो?”

हव्वा ने यूनिफ़ॉर्म की जेब से अपना फ़ोन निकालकर दिखाया।

“मेरे पास साधारण फ़ोन है। अब चलती हूँ। बाक़ी की बातें बाद में करेंगे। मुझे काम ख़त्म कर घर जल्दी जाना होता है। मेरे बच्चे अभी छोटे हैं।”

वह और अधिक बात नहीं करना चाहती थी। उसे कई तरह के डर घेरे हुए थे—इससे बात करते मालकिन ने देख लिया तो पता नहीं क्या कहेगी-करेंगी; हो सकता है काम से ही निकाल दे, जबकि उसे काम की सख़्त ज़रूरत है। या ख़ुद का बचाव करते-करते कहीं ज़रूरत से ज़्यादा बोल गई तो? पता नहीं क्या परिणाम होगा। भीतर ही भीतर घबराहट के मारे वह सहम गई। उस पर फ़ोन के कारण जो शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, वह अलग!

आजकल तो सबके हाथ में बड़ी स्क्रीन वाला फ़ोन होता है। गार्डनर के हाथ में भी था, हव्वा ने देखा था। हव्वा के पास भी तो था, लेकिन बेचना पड़ा। और अगर यह नौकरी नहीं मिली होती, तो पता नहीं और क्या-क्या बेचना पड़ता।

यह नौकरी भी उसे इतनी मुश्किल से मिली है। इद्रीश, उसके पति का बहनोई, जिस सरकारी आवासीय कॉलोनी में अश्कारी (चौकीदार) का काम करता है, वहाँ एक मैडम के यहाँ बहुत-सी डाडा (स्त्रियाँ) आती-जाती रहती हैं। मालूम किया तो जाना कि भारतीय वंश की वह मैडम ज़रूरतमंदों को कामवालियाँ मुहैया कराती हैं। उनसे गुज़ारिश की कि हव्वा को भी कहीं काम पर लगवा दें!

इस काम के लिए मैडम क्लाइंट्स से अच्छा-ख़ासा दाम लेती है, तो बिना देरी किए हव्वा को बुलवा लिया।

“कभी काम किया है?”

“ज़रूरत ही नहीं पड़ी।”

“क्यों, घर के आँगन में सोना गड़ा था?”

हव्वा को मैडम का तंज़ नागवार गुज़रा, किंतु गरज़ से निर्विकार रही। छोटी थी तो माँ-बाप ने सँभाला, जवानी चढ़ते ही यार नाज़ उठाने लगे। निकाह जिसके संग पढ़ा, वह जान लुटाता था। पिकी-पिकी (सवारी ढोने वाली मोटरसाइकिल) में ख़ूब कमाई थी उसकी।

फिर क्या हुआ? मियाँ को दूसरी मिल गई? तुमको छोड़ गया? मैडम ने एक साथ कई सवाल पूछे डाले, जिसका जवाब एक ही था, “एक्सीडेंट के बाद पैर काटना पड़ा...” हव्वा ने नाटकीय पीड़ा के साथ कहा जो मैडम से छुपी नहीं रही। वह जानती है इन लोगों में संवेदना का वैसा भूडोल नहीं होता।

“यह तो यहाँ आम बात है। पिकी-पिकी वाले जवानी के जोश से भरे होते हैं। उनकी मोटरसाइकिल सड़क पर बेछूट हवा से बात करती है। उन पर यातायात के नियम तो लागू हैं नहीं... सड़क के बादशाह बने फिरते हैं!”

हव्वा अनचाहे चुपचाप सुन रही है, मैडम को टुकुर-टुकुर देखते हुए। इन बातों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। उसे बस अपनी नौकरी से मतलब है। वह इन बातों में नहीं उलझना चाहती।

“ख़ैर, बच्चे कितने हैं?” मैडम ने आवाज़ में नरमी ढाली।

“तीन,” कहकर वह मुस्कुराई।

“तीनों इस पति से?”

“नहीं, सबसे छोटा इससे। पहली बेटी और दूसरा बेटा निकाह से पहले।”

मैडम ने बच्चों के मुतल्लिक़ कोई तीसरा प्रश्न नहीं पूछा। जानती है, जवान होते ही यहाँ की लड़कियाँ अपनी टाँगें खोले रखती हैं। इन लड़कियों को यह भी मालूम नहीं होता कि दरअस्ल उनके बच्चे का बाप कौन है। अधिकतर लड़के अय्याशी के बाद बच्चे इनके पास छोड़ जाते हैं, वे बच्चों की ज़िम्मेदारी नहीं लेते। बच्चे भी माँ से पहचाने जाते हैं। यहाँ बिनब्याही माँ होना बहुत ही सामान्य-सी बात है। जब ये माँएँ काम पर निकलती हैं; तब बच्चे घर की बुज़ुर्ग स्त्री सँभालती है, न होने पर मामूली देय में अड़ोस-पड़ोस की स्त्रियाँ सँभाल लेती हैं। स्कूली बच्चे तो डे-केयर में पल जाते हैं!

यहाँ के बेहद कामुक स्त्री-पुरुष शारीरिक संबंधों को लेकर बेख़ौफ़ होते हैं—न बीमारियों का डर, न अनचाहे बच्चों का। संसर्ग इनके लिए हाथ मिलाने जैसा है। पहचान होते ही बना लेते हैं, फिर बच्चे भी वैसे ही हो जाते हैं!

मैडम ने हव्वा को बेचारगी से देखा। गहरी रंगत वाली साफ़, चिकनी त्वचा पर गोल्फ़ बॉल जितनी बड़ी आँखें, बूमरैंग-सी भौंहें और तीखे, अधखुले मांसल होंठ। गदबदी देह पर उन्नत उरोज—अफ़्रीकन सौंदर्य से लबालब हव्वा उन्हीं को देख रही थी, किसी उम्मीद की प्रतीक्षा में पलकें बाँधे।

“दिखने में तो ख़ूब है तू, लेकिन मुज़ूंगू (पश्चिमी) को अँग्रेज़ी बोलने वाली चलती है। मुहिन्दी (भारतीय) के लिए मुफ़ीद रहेगी। ख़ासकर प्रवासी—वे स्थानीय लोगों की तुलना में अच्छी पगार देते हैं और अधिक उदार भी होते हैं।”

हव्वा अपनी प्रशंसा सुनकर मुस्कुराने लगी। उसका पक्का रंग और गहरा गया और आँखों में कई-कई ख़्वाबों की कश्तियाँ उतर आईं।

“लेकिन उसके लिए पहले तुझे काम सीखना पड़ेगा और थोड़ी-बहुत अँग्रेज़ी भी,” अपने मोटे कमीशन का सोचते हुए मैडम ने जोड़ा।

क्षणांश में हव्वा का चेहरा मलिन पड़ गया। स्याह चेहरे पर जैसे ढेर सारी और स्याही उलट गई हो। आँखों की सभी कश्तियाँ डूब गईं, उनकी जगह अचरज के विशालकाय टाइटैनिक ने ले ली।

“पंद्रह दिन का प्रशिक्षण है। नाऊली (आने-जाने का किराया) और खाना दूँगी। इसके बाद अच्छी नौकरी मिल सकेगी।”

हव्वा के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। मैडम की सहायिका, जो वास्तव में प्रशिक्षक की भूमिका में थी, ट्रेनिंग के बहाने सारा काम उससे करवाती। शाम को मैडम आतीं तो हव्वा से पैरों की तेल-मालिश करवातीं। उसी दौरान मैडम रोज़मर्रा के काम आने वाले अँग्रेज़ी-हिंदी के शब्द और उनके अर्थ सिखातीं।

हव्वा अँधेरा गहराने पर घर पहुँचती तो उसका बदन टूटता। काम पर जाने का मन नहीं करता, लेकिन छुछ भाँड-बासन देख दूसरी सुबह उठकर फिर तैयार हो जाती!

अश्वेत कॉन्ट्रैक्टर सुनीता को उपाँगा और सिटी सेंटर में घर दिखा रहा है।

“भारतीय कॉलोनियाँ ब्रिज के इस तरफ़ हैं। दरअस्ल, उपाँगा को छोटा-सा भारत ही समझिए आप।”

“और ब्रिज की उस तरफ़?” सुनीता ने कौतुक से पूछा।

“इस शहर को तंज़ानाइट पुल जोड़ता भी है और बाँटता भी है। इस तरफ़ भारत है तो उस तरफ़ यूरोपियन माहौल है। मसाकी में अधिकतर मुज़ूंगू रहते हैं।”

‘इतने बरस यूरोप में ही तो रही हूँ,’ सोचकर सुनीता ने कहा, “आप मसाकी में घर दिखाइए।”

सुनीता को कॉन्ट्रेक्टर की आवाज़ में बज़ाहिर विभेदन चुभ गया था, कहीं भीतर तक। पता नहीं श्वेत और अश्वेत दोनों ही हम भारतीयों को हेय दृष्टि से क्यों देखते हैं?

अहं के द्वंद्व में विजयी सुनीता ने मसाकी में ओशन अपार्टमेंट का सी-फेसिंग फ़्लैट पसंद किया—नौवें माले पर चार कमरों का बड़ा घर। बाहर की तरफ़ खुलने वाली; यहाँ से वहाँ तक काँच की स्लाइडिंग दीवारों वाला हॉल, हर कमरे से लगी बालकनी और बालकनी से दिखता अंतहीन पानी का नज़ारा।

प्रभास जी ने ठीक ही कहा था—अब जीवन के इस पड़ाव पर सरकार ने जन्नत का सुख नवाज़ा है तो क्यों न लुत्फ़ लिया जाए। इस ख़याल के आते ही वह आप ही मुस्कुरा उठी।

सुबह बालकनी में सूर्य नमस्कार करते हुए विटामिन डी का रसपान और ढलती शाम चाय पीते हुए मुर्ग़ाबी परिंदों को घर लौटते देखना सुनीता की आदत में ढलने लगा। समंदर की छाती पर तैरते पोत को किसी जश्न के मंडप में तब्दील होते देखना उसके लिए ऐसा रूमानी अनुभव बन गया है, जिसका वर्णन किसी शब्दालंकार से संभव नहीं। वह दोस्तों-रिश्तेदारों से फ़ोन पर कहती है, “साहित्य में जिस सुख का वर्णन है, यह वही स्वर्ग है।”

वह स्वर्ग के सुखों का आनंद जी भरकर उठा रही है।

हव्वा लगन से काम सीख रही है। अँग्रेज़ी-हिंदी के बहुत-से शब्द उसे ज़बानी याद हो आए हैं। मैडम उससे ख़ुश है। कहती है, किसी अच्छे घर भेजेगी—मोटी तनख़्वाह वाले के उधर।

जवाब में हव्वा मुस्कुराती है। अच्छे दिनों के ख़्वाब उसकी आँखों में सितारों की तरह चमकते हैं!

नवाचार वास्ते भोज के आयोजन पर तमाम मेहमान पाहुन की तरह जमे रहे। सहयोग वास्ते न किसी ने हाथ बढ़ाया, न बँटाया। यूरोपियन देशों में दावत पर मेहमान और मेज़बान का फ़र्क़ मिट जाया करता था। यहाँ तो मैं और प्रभास जी अकेले दौड़ते-भागते रहे। सुनीता की आवाज़ मायूसी से भारी थी।

“दार का यही तौर है। यहाँ आकर स्त्रियाँ आलसी हो जाती हैं और मोटी भी।” रेणुका जी हँसती हैं, “एक गिलास पानी के लिए भी सहायिका पर आश्रित। आसानी से मिल जाने के कारण यूरोपियन स्त्रियाँ भी जितने बच्चे, उतने रख लेती हैं। बाहरी स्त्रियों की यहाँ मौज होती है, मौज! एक दोस्त के संग दोपहर का खाना, दूसरी संग शाम की कॉफ़ी में दिन खपा कर रात को ख़र्राटे मारती हैं। तुम्हारी तरह खटती नहीं।”

सुनीता को देखते हुए वह फिर हँसती हैं।

रेणुका जी इसी फ़्लोर पर रहती हैं। इनके पूर्वज भारतीय थे। परदादा कच्छ से तंज़ानिया आ गए थे। इनका जन्म द्वीप ज़ांज़ीबार में हुआ था और शादी के बाद वह दार-ए-सलाम आ गईं। तीन बच्चे हैं और वे तीनों अलग-अलग देशों में बसे हुए हैं। रेणुका जी उनसे मिलने जाती रहती हैं।

पहले सिटी सेंटर में रहती थीं, लेकिन बच्चों के जाने के बाद बढ़ती उम्र में उधर के शोर-शराबे से ऊबकर कई बरस पहले मसाकी आ गई हैं। दो सहायिकाएँ रखी हैं—एक साफ़-सफ़ाई के लिए, दूसरी महाराजिन है।

“ये भारतीय खाना बना लेती हैं?” सुनीता को अचरज होता है।

“हम सिखला देते हैं। सुघड़ होती हैं, यहाँ की स्त्रियाँ जल्दी सीख जाती हैं।”

“एक सहायिका तुम भी रख लो। इतने बड़े घर की देखभाल अकेले आसान नहीं...” रेणुका जी ने समझाइश दी।

वाक़ई कहने को चार कमरों का फ़्लैट, किंतु बेडरूम इतने बड़े कि प्रत्येक कमरे में मुंबई का स्टूडियो अपार्टमेंट समा जाए और हर बाथरूम बेडरूम जितना बड़ा। सारा दिन घर की देखभाल और किचन सँभालते-सँभालते शाम तक वह निष्प्राण हो जाती है। कुछ दिनों में ही यह रिहायशी घर उन्हें खटकने लगा।

“दो जने ही तो हैं, छोटा घर ही लेती... दंभ के मारे...” आधे-अधूरे वाक्य कहती वह पछतावों से भरी होती।

“जैसा देश, वैसा भेष। रेणुका जी ठीक कह रही हैं। एक सहायिका रख लो। दीवाली भी आने वाली है,” प्रभास जी ने धीमे से कहा।

“मैं भी मोटी हो जाऊँगी,” सुनीता ने ठुनकते हुए कहा।

सुनीता को हमेशा ही अपने मोटे हो जाने का भय सताया करता है। कहती है, मोटापा दरअसल बीमारियों का घर होता है। इसलिए रोज़ सुबह योग और रात के खाने के बाद आधे घंटे वॉक करना उसके जीवन का नियम रहा है। खाना भी बेहद संतुलित खाती है। फ़ूड-साइंस का ख़ूब ज्ञान है सुनीता को। कोई पूछे तो सादगी से कहती है, “सामान्य समझ की बात है।”

“दस मिनट एक्स्ट्रा वॉक कर लेना,” प्रभास जी ने समाधान सुझाया।

“पुरानी ढीठ हो जाती हैं। तुम्हारे लिए कोई नई ठीक रहेगी, नख़रे कम होंगे।” सुनीता ने एक सहायिका लगवाने में मदद माँगी तो रेणुका जी ने कुछ सोचते हुए कहा।

मैडम की मौखिक परीक्षा में पूरे नंबरों से उत्तीर्ण हव्वा तैयार थी। रेणुका जी की माँग पर उसे भेज दिया गया। वह उनके साथ सुनीता के दरवाज़े पर खड़ी थी।

“ये लो, इसके घर-दरवाज़े की मालूमात, आईडी की फ़ोटोकॉपी और तनख़्वाह देकर काग़ज़ पर दस्तख़त ज़रूर करवा लेना।”

सुनीता को एक लिफ़ाफ़ा और परामर्श की मुँह-ज़बानी पर्ची पकड़ा रेणुका जी दरवाज़े से ही लौट गईं।

राष्ट्रीय प्रमाणपत्र वाली फ़ोटो से सामने खड़ी हव्वा का मिलान करती सुनीता ने देखा—साफ़-सुथरे चोग़ा में चेहरे पर निरीहता पसरी है। एक पल में स्त्री-सुलभ ममता बलबला आई। उसे अंदर बुलाकर बिस्किट्स और चाय परोस दिया, जिसे कुछ सेकंड में ही निबटाकर हव्वा सुनीता के सामने खड़ी होकर बार फगियो (झाड़ू) के बाद ब्रूम-ब्रूम कर रही है। सुनीता ने उसे भारतीय झाड़ू पकड़ा दिया, जिसे हव्वा ने पल भर के लिए आश्चर्य से देखा, जैसे कुछ अनोखा देखा हो। उसकी हालत समझते हुए सुनीता ने उसे थोड़ा-सा हिस्सा बुहारकर दिखाया, बिना कुछ कहे। झाड़ू उसके हाथ से लेकर हव्वा काम पर लग गई। ग़ोशे-ग़ोशे से बुहारकर गंदगी निकाल रही है, मानो सुनीता से कह रही हो कि ये हमारा काम है, इसमें हम ही कुशल हैं।

फिर उसने अँग्रेज़ी में पोंछे के बारे में पूछा, जिसे सुनीता ने स्वाहिली में “डेकी?” पूछकर पुष्टि की। इस पर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।

“तुम स्वाहिली जानती हो?”

मिसेज़ सेन ने कहा था, वहाँ के लोग अपनी भाषा को लेकर बहुत रूढ़िवादी हैं, हमारी तरह नहीं कि अँग्रेज़ी बोलकर गर्व महसूस करें। तुम उनकी भाषा बोलोगी तो वह तुम्हें जल्दी अपना लेंगे।

“किडोगो-किडोगो (थोड़ा-थोड़ा)।”

सुनीता ने इंग्लिश से स्वाहिली ट्रांसलेशन की पुस्तिका उसे दिखाई। वह किताब हाथ में लेकर तेज़ी से पन्ने पलटने लगी।

सुनीता ने कहा, “रख लो, मैं दूसरी ले आऊँगी।”

हव्वा ने आधा बैठते हुए कहा, “अशांते साना (बेहद शुक्रिया)।”

रेणुका जी ने सुनीता को तंज़ानिया में मज़दूरी का नियम पहले ही समझा दिया था—कामवालियाँ आठ घंटे की ड्यूटी करती हैं। महीने की तनख़्वाह के अतिरिक्त दो वक़्त का खाना तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। शनिवार आधे दिन की ड्यूटी और इतवार की छुट्टी के अतिरिक्त सरकारी छुट्टियों में इनको भी आराम है। बुलाने पर दिहाड़ी का यूँ तो दुगुना देने का नियम है। बाक़ी, बहुत बार ये बड़ा मुँह खोलती हैं, ख़ासकर बाहर वालों के साथ। किंतु हमसे अधिक चालाकियाँ नहीं कर पाती हैं ये। हम इनकी रग-रग से वाक़िफ़ हैं।

सुनीता ने दोपहर के खाने का पूछा तो हव्वा ने अँग्रेज़ी और स्वाहिली की खिचड़ी भाषा में दैहिक भाषा की मिलावट के साथ ‘ना’ कह दिया—वह दिन में एक बार ही खाती है। कल से उसे मात्र एक दफ़ा दोपहर में खाना दिया करें, बस!

रेणुका जी ने इनके स्वाद के बारे में भी सुनीता को विस्तार से बताया था। ये ठेठ भारतीय खाना नहीं खा पाती हैं। तीखा और मसाला इनको क़तई हज़म नहीं होता। दिन में अधिकांश ये पावरोटी और काली चाय पर निर्भर रहती हैं। कई सेम्बे (कच्ची मक्की का आटा) को नमक के साथ हलवे की तरह पकाकर चीचा (एक तरह का साग) या मराग़े (बीन्स) करी के साथ खाती हैं। बहुत-से भारतीय घरों में काम करते-करते भारतीय खाना भी खाने लगी हैं। तुम उससे उसकी पसंद पूछ लेना। जिह्वा तृप्त रहे तो काम ठीक से होता है।

रेणुका जी गुजराती टोन में अँग्रेज़ी की मिलावट वाली हिंदी में बताती हैं। सुनीता को कई बार लगता है, अगर वह न होतीं तो जीवन यहाँ इतना सुगम नहीं होता। शुक्र है रात के खाने के बाद टहलने की आदत का, जो उनसे पहचान हुई।

यूरोपियन देशों में श्वेत श्रेष्ठता-बोध के भार से दबे हुए हम भूरे भारतीयों की तरफ़ देखते भी नहीं और जो भारतीय वहाँ बसे हुए हैं, वे भी ख़ुद को यूरोपियन ही समझते हैं—जो वाक़ई में वे हैं। ख़ैर...

मानसिक स्वास्थ्य के लिए अहितकर जानकर सुनीता ऐसे नेगेटिव ख़यालों को तुरंत ही झटक देती है। ईश्वर ने इतना सुखदायक मौक़ा नवाज़ा है, इसका लाभ लिया जाए—सोचकर वह नमकीन समुद्री हवा अपने फेफड़ों में भर लेती है।

पुल के इस तरफ़ मसाकी में, जहाँ सुनीता रहती है, जैसा कि कॉन्ट्रैक्टर ने बताया था, माहौल यूरोपियन है। बड़े-बड़े सुपर मार्केट में आयातित सब्ज़ियाँ और फल, डब्बे वाला दूध-दही, चीज़ और मीट; जबकि उस पार, उपाँगा में क़स्बाई माहौल—खेतों से टूटकर आई बिना रसायन और रंग वाली ताज़ी सब्ज़ियाँ और रसभरे उष्णदेशीय फल। सुनीता हर इतवार प्रभास जी के साथ उपाँगा से हफ़्ते भर की ख़रीदारी कर आती है। रेणुका जी ने गाय के दूध वाला भी करवा दिया है। वह अतिरिक्त शुल्क लेकर मसाकी तक दूध पहुँचा जाता है, जिस पर मोटी मलाई जमती है। घी भी घर में ही बन जाता है। जर्मनी में भारतीय साग-सब्ज़ियों की बहुत दिक़्क़त थी और अधिकतर चीज़ें केमिकल वाली लगती थीं—मसाकी के सुपरमार्केट्स में भी कुछ ऐसा ही है!

हव्वा सरकारी बसों में आती है। स्वच्छता के मद्देनज़र रेणुका जी की सलाह पर सुनीता ने उसे काम शुरू करने से पहले नहाने की हिदायत दी है। यूँ जाते हुए वह अधिक बनती-सँवरती है और अपने पीछे सस्ते ऊद का भबका छोड़ जाती है।

प्रभास जी के दफ़्तर निकलने के बाद ठीक सुबह साढ़े आठ बजे आ जाती है और शाम की चाय के बाद पाँच बजे जाती है। हालाँकि सुनीता उससे रसोई में कोई मदद नहीं लेती, रेणुका जी के कहने पर भी नहीं।

“क्या मैं इतना भी नहीं कर सकती? वह भी तो इंसान है, मशीन नहीं। एक पल नहीं बैठती है, खाती भी ऐसे है जैसे ट्रेन निकलती हो। चार ब्रेड स्लाइस और काली चाय—यह भी कोई खाना हुआ? इतना कम खाकर कोई पूरा दिन कैसे काम कर सकता है?”

“ये कम ही खाते हैं। एक पूरा भुट्टा तक नहीं खा पाते हैं। आधे में पेट भर जाता है इनका। दफ़्तर में स्थानीय कर्मचारियों को देखा है—ब्रेड स्लाइस के बीच एवोकाडो दबाकर खा लेते हैं और काम पर लग जाते हैं। तुम्हें जो ठीक लगता है, करो,” प्रभास जी ने कहा।

“मैं रोज़ाना कोई एक फल देने लगी हूँ। नहीं-नहीं कहती, ख़ुशी-ख़ुशी खा लेती है।”

“अच्छा करती हो।” प्रभास जी हमेशा से सुनीता की सहृदयता के मुरीद रहे हैं।

हॉल, किचन और बेडरूम रोज़; बाक़ी दोनों कमरे बारी-बारी से साफ़ करने को कहा है।

“इतना गंदा भी तो नहीं होता होगा। बच्चे हों तो अधिक गंदा होता है।”

महीने भर में ही हव्वा रच-बस गई। पूरा घर सँभाल लिया। दूधवाला सुनीता को फ़ोन करता है तो वह हव्वा को नीचे भेज देती है। सुरक्षा की सख़्ती के कारण स्थानीय लोगों को परिसर में आने की इजाज़त नहीं। नहाने जाती है तो उसे फूल तोड़ लाने कहती है। शाम की चाय हव्वा ने ज़िद से बनाना सीखा और क्या ख़ूब बनाने लगी है! अब सुनीता को अपनी बनाई चाय में स्वाद नहीं आता। 

हव्वा को काम पकड़े छह महीने से अधिक हो गए। सुनीता दार-ए-सलाम की तहज़ीब में समूची डूब गई है। दोपहर को घर में कम ही रहती है, अधिकांश कहीं-न-कहीं निकल जाती है और लंच के बाद लौटती है। कई-कई बार अपने घर भी भोज रखती है। तब एक दिन पहले और ऐन उस दिन हव्वा का काम बढ़ जाता है, जिसे वह बिना शिकायत बख़ुशी निबटाती है। जाते हुए सुनीता उसके हाथ में उसकी उम्मीद से कुछ अधिक नोट थमा देती है और बचा खाना भी पैक कर देती है। “अशांते” कहते हुए हव्वा की आवाज़ में खनक उतर आती है और लीचियों-सी आँखों में चमक।

आजकल वह आते ही रसोई साफ़ नहीं करती। पहले बेडरूम करती है, जिसे बाद में तालाबंद कर सुनीता धूप का चश्मा चढ़ाकर बाहर निकल जाती है। हर मर्तबा नए कपड़े, नए गहने—हव्वा सब ध्यान में लेती है। देखती, पकड़े जाने पर फ़ौरन ही प्रशंसा से तर-ब-तर कर देती है। सुनीता उस प्रशंसा में आकंठ डूब, हव्वा के ज़िम्मे घर छोड़ बेफ़िक्री से किटी पार्टीज़ और लंचेज़ में व्यस्त रहती है।

शनिवार या सोमवार की सरकारी छुट्टी पर सुनीता के बुलाने से हव्वा आ जाती है। एक तो दुगुनी दिहाड़ी, उस पर खाना-पीना सब। इतवार वह भी आराम करती है! हव्वा ने बेसिक भारतीय खाना पकाना भी सीख लिया है। सुनीता उस पर पूरी तरह आश्रित हो गई है। वह उसे सुपर मार्केट से सब्ज़ी-भाजी लेने भेजती है तो वह वज़न में कम लेकर पैसे अपनी जेब में रख लेती है। काम करते-करते डिब्बों से मेवे वग़ैरह निकालकर खा लिया करती है, किंतु उतना ही कि सुनीता को मालूम न पड़े। बहुत सफ़ाई से कई बार प्याज़-टमाटर बिन में डाल देती है और जाते हुए कूड़ा फेंकने से पहले उन्हें निकाल लेती है। खाने का तेल, सर्फ़ और चीनी भी ले जाती है। इसके लिए वह ख़ाली होने पर छोटी-छोटी शीशियाँ-डिब्बियाँ साफ़ कर सँभाल रखती है। इस बात से सुनीता कतई अनजान है! हव्वा को ये सब करना नहीं आता था। वह बुरी तरह सिखाई-पढ़ाई गई है। फूल वाले क़िस्से के कुछ दिन बाद ही रजिस्टर में समय दर्ज कर जैसे ही परिसर से बाहर निकली, घेर ली गई थी वह। दो-चार कामवालियों की अगुवा उस गार्डनर ने ग़ुंडई से कहा, “इतनी जल्दी क्या है?”

“घर में बच्चे हैं,” कह हव्वा पलकें पटपटाने लगी।

“हमारे बच्चे हमारे बिन ही पलते हैं। साथ बैठो और कामवालियों के तौर-तरीक़े सीखो।”

हव्वा चुप रही।

“तनख़्वाह के अतिरिक्त जब थोड़ा-थोड़ा रोज़ ले जाओगी, ख़ुद समझ जाओगी।” गार्डनर की आवाज़ में अनुभव रिस आया था।

“मैंने कभी ये सब नहीं किया है।” भय से काँप गई थी हव्वा की आवाज़।

“तुम भोली मालूम पड़ती हो। हम पारंगत बना देंगे। सीखना इतना मुश्किल नहीं है!”

“पहले तीन महीने इनके सिर पर तलवार लटकती रहती है। काम पसंद नहीं आने पर निकाले जाने के साथ श्रमिक नियम के तहत अतिरिक्त भत्ते से महरूम रह जाने का ख़ौफ़ रहता है। चौथे महीने से ये अपना खेल शुरू करती हैं।”

उस दिन रेणुका जी शाम की चाय पर सुनीता को खुले शब्दों में आगाह कर गईं, “इनसे बचके रहना। बड़ी चोरट्टी होती हैं, कुछ नहीं बख़्शतीं। जो हाथ लगा, वही उड़ा लिया। बहुत-बहुत बार मर्द भी!”

रेणुका जी गले में एक झलुआ बैग लटकाए रखती हैं। उसमें कुछ कैश और गल्ले की चाबियाँ रखती हैं। वह महाराजिन को सब कुछ नाप-तौलकर देती हैं। जब भी सुनीता के घर आती हैं, कमरे में ताला बंद कर आती हैं। उनके घर यहाँ-वहाँ कुछ कैमरे भी लगे हैं, बाइयों की निगहबानी ख़ातिर।

सुनीता से भी ऐसा करने को कहती हैं। वह इस कान से सुन, उस कान निकाल देती है!

हव्वा को दो तरीक़े बताए गए थे। पहला—सब्र से काम लेते हुए मालकिन को पूरी तरह शीशे में उतारना और फिर उसकी लापरवाही पर बड़ा हाथ मारना। दूसरा—रोज़ थोड़ा-थोड़ा उड़ाना।

अपनी ज़रूरतों को देखते हुए हव्वा को दूसरा तरीक़ा अधिक मुफ़ीद लगा, लेकिन मन ही मन वह बड़े मौक़े का ख़ाका तैयार कर रही थी।

अक्सर टीवी देखती सुनीता के तलवों में तेल मलने लग जाती। सुनीता कहीं जाने के लिए तैयार होती है तो हव्वा प्रशंसा की फुलझड़ी छोड़ देती है। “भारतीय खाना खाने लगी हूँ, यह कहते हुए कि तुम्हारे हाथों में तो ग़ज़ब का स्वाद है। दोस्त तरसते होंगे।” सुनकर सुनीता भीतर ही भीतर चाशनी में डूब जाती है!

उस दिन उच्च पदाधिकारी के घर दावत पर सुनीता के एक कान में बाली नहीं देख संगियों ने छेड़ा था, “आजकल एक कान में पहनने का फ़ैशन चला है क्या?”

“यहीं-कहीं गिरा होगा, घर से तो पहन निकली थी।”

“क्या मालूम, गले मिलने की रवायत में किसी से अटक गई हो?”

हीरे जड़े हैं। प्रभास जी ने पहली वैवाहिक सालगिरह पर दिया था। चिंता सुनीता के चेहरे पर धूल-सी जम गई।

“हो न हो, कार की सीट से उलझ गई हो।”

वह आनन-फ़ानन में निकल आई। कार में भी नहीं थी।

घर का दरवाज़ा खोलते ही हव्वा ने उसके हाथों में थमा दिया और दिल चुरा लिया सुनीता का। सुनीता ने कृतज्ञ भाव से बख़्शिश में कुछ नोट थमा दिए।

“ऐसी तो भारत में भी नहीं मिलतीं। रेणुका जी फ़ालतू बोलती रहती हैं, झक्खी स्त्री, हूँह। तनख़्वाह देते हुए ग़लती से एक नोट अधिक दे दिया तो हव्वा ने गिनकर वापस कर दिया। ऐसा कौन करता है आजकल, अपने उधर भी?”

“कुछ लोग अपवाद होते हैं, लेकिन उनके अपने अनुभव हैं,” कहकर प्रभास जी चुप हो गए।

“ये हमारे देश में आकर हमारा हक़ मारते हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं, शानदार फ़्लैट्स में रहते हैं और हम इनके यहाँ झाड़ू-पोछा करते हैं, संडास साफ़ करते हैं।”

काम के बाद थोड़ी दूर चलकर पहली मोड़ से पहले एक बाओबाब के विशालकाय तने के पास वे सब घेरा बनाकर बैठी हैं। ऐन उसी वक़्त सिकी हुई मकई बेचने वाला अपनी जिकोनी (चूल्हा) ठेलते गुज़रता है और वे सब आधी-आधी मकई लेती हैं।

“और पता नहीं ये चीनी क्या पकाते हैं! इनकी रसोई से ऐसी बदबू आती है कि कई बार मुझे कै आने लगती है,” चाइनीज़ के घर लगी कामगार ने कहा।

“रील्स में नहीं देखा है? ये बंदर भी खाते हैं, कोरोना फैलाते हैं,” एक दूसरी ने हँसी उड़ाई।

“हाँ, तुमको तो हँसी आएगी ही। तुम मुज़ूंगू के उधर जो काम करती हो।”

“सच कह रही हो। ये तो अधिकतर क्रॉसों, पास्ता और सलाद पर जीते हैं, लेकिन पीते बहुत अधिक हैं, यार!” मुँह बनाते हुए उसने कहा।

“मुहिन्दी तो लगता है खाने के लिए जीते हैं। इतना पकाते हैं, मैं सारा दिन बर्तन ही धोती रहती हूँ,” मकई के दाने दाँतों से खींचते हुए हव्वा ने कहा। “दिन में तीन बार खाते हैं और हर बार बहुत-से प्रकार। इनकी सब्ज़ियाँ भी अजीब होती हैं। एक-एक सब्ज़ी को कई-कई तरीक़े से बनाते हैं और मिर्च-मसाला इतना डालते हैं कि मुझे ख़ों-ख़ों होने लगती है। मुझसे नहीं खाया जाता इनका खाना,” कहकर उसने मुँह बिचकाया।

“मुहिन्दी के कपड़े भी कैसे अजीब होते हैं,” किसी और ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।

“हाँ, पुरुषों के तो बाक़ियों जैसे ही, लेकिन औरतों के—तौबा! नाम भी अजीब-अजीब। इनकी एक साड़ी से हमारे दो-दो गाउन बन जाएँ। उस पर छोटा-सा अँगिया और साड़ी के अंदर पेटीकोट।”

“हैएँ! कोट तो बाहर पहनते हैं, बैंकों में काम करने वाले पुरुष। ये कौन-सा कोट है?”

“स्कर्ट, जिसे ये पेटीकोट कहते हैं। साड़ी के रंग से मेल खाती है। साड़ी आयरन करते हुए मेरा माथा दर्द करने लगता है,” हव्वा ने ढेर सारी नाराज़गी से कहा। “और एक दिन में तीन तरह के कपड़े पहनती है—योगा का अलग, दिन का अलग और सोने का अलग। और यदि कहीं जाना हो तो लंबेतर साड़ी। मन करता है एक-दो साड़ी जला दूँ, लेकिन उसे खिसियाना नहीं चाहती।”

“बुरा नसीब है, झेलो।”

“कराला (करेला) एक कड़वी-सी सब्ज़ी है। देखने में भी भद्दी, लेकिन ये ख़ूब चाव से खाते हैं। कहते हैं, ख़ून में मिठास कम होती है। मुझसे तो मुँह में नहीं रखा जाता, लेकिन ख़ुशामद की ख़ातिर पानी के साथ गटक लेती हूँ, ज़हर समझकर। और तौबा, पानी कितना पीते हैं! सारे भारतीय यहाँ आ जाएँ तो हमारा समंदर सूख जाएगा।”

“काम करने का मज़ा तो मुज़ूंगू के उधर है। सिर्फ़ दारू के अलग-अलग गिलास को सँभालकर साफ़ करना और रखना होता है। खाना तो अधिकतर इनका ओवन में ही बनता है और कपड़े भी कुछ ख़ास नहीं होते। पूरा दिन एक जोड़ी में काटते हैं, घर-बाहर सब जगह जैसे ही पहनते हैं।”

“मेरी मालकिन ने तो दो कुत्ते रखे हुए हैं,” एक दूसरी मुज़ूंगू के उधर काम करने वाली ने कहा।

“हद है! ख़ुद भी दो जने और कुत्ते भी दो!”—इसके साथ सामूहिक ठहाका गूँजा।

“और बच्चे भी नहीं, बताओ भला!” फिर से ठहाके की गूँज।

“मुझे लगता है, असल मज़ा अकेले बंदे के साथ है। मैं उसके दफ़्तर जाने के बाद आती हूँ। पूरे घर की चाबी मेरे पास होती है। दरअसल, अकेले बंदे के घर की मालकिन आप होते हैं। मैं तो कभी-कभी वाइन भी पी लेती हूँ, अगर बॉटल खुली होती है तो। इन्हें कुछ होश नहीं रहता—कितना था, कितना बचा है। छुट्टियों में बीवी-बच्चे आते हैं, लेकिन पूरा वक़्त घूमने-फिरने में बिता जाते हैं।”

“मेरा वाला भी अकेले ही रहता है, लेकिन कहने को। इस हफ़्ते एक साथ रहती है तो दूसरे हफ़्ते कोई दूसरी। कोई-कोई तो कई महीने रहती है, लेकिन अच्छी बात ये है कि उन्हें घर के मसले से कोई लेना-देना नहीं रहता।”

“मेरा वाला तो इतना ठरकी है! बीवी महीने भर के लिए भी जाती है तो हर सप्ताहांत एक नई बंदी ले आता है। दो दिन ख़ूब मौज काटता है, साला। एक दफ़ा मुझसे भी पूछा उसने, लेकिन मैंने मना कर दिया कि मैं शादीशुदा हूँ।”

“ऐसे मामलों में मुहिन्दी ठीक मर्द होते हैं,” हव्वा ने निर्णायक स्वर में कहा।

“ओह हो! बड़ा प्यार उमड़ रहा है मुहिन्दी पर?”

“चीना के पहले मैं मुहिन्दी बंदे के साथ थी, लिव-इन में। उसका बेटा और बीवी भारत में थे। मैं पेट से हुई तो उसने भारतीय डॉक्टर के साथ मिलकर गिरवा दिया। मादर** होते हैं मुहिन्दी,” कहकर उसने थूका। “मैंने हरामी का फ़ोन, घड़ी, चश्मा और कैश उड़ा लिया। कुछ नहीं बिगाड़ सका था कुत्ता।”

“सब लोग एक जैसे नहीं होते,” कहकर गार्डनर उठ गई।

सभा समाप्त हो गई थी!

“इसे कढ़ी कहते हैं और इसमें गोल-गोल बाड़ियाँ हैं। हम दोनों को बेहद पसंद है। तुम चखोगी?” सुनीता ने स्नेह से पूछा।

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। तुम्हारा पकाया तो मुझे बेहद पसंद है। लेकिन सोचती हूँ, जब तुम चली जाओगी तो कौन इतना स्वादिष्ट खाना खिलाएगा मुझे?” हव्वा उदासी का नाटक करती है।

“तुम चिंता मत करो। प्रभास की जगह जो आएँगे, हम तुम्हें उनके उधर रखवा देंगे।”

“सच?”

“बिल्कुल सच।”

हव्वा छोटे बच्चे की तरह ताली बजाने लगी थी!

हव्वा ने महीने का अग्रिम माँगा कि फ़ोन लेना है। “तनख़्वाह से हर महीने थोड़ा-थोड़ा करके काट लेना,” सुनीता ने कहा।

दस्तख़त करवा सुनीता ने दे दिया। आजकल फ़ोन की नई बीमारी चली है। उसे क्या—उसकी तनख़्वाह से कटेगा!

शबानी रोज़ बस स्टॉप पर इंतज़ार करता है। कई सारी बसें निकल जाती हैं। हव्वा को देखते ही उसकी आँखों में चमक कौंध जाती है। वह बस की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसका हाथ पकड़ लेता है। वह हव्वा से पहली बार सुपर मार्केट में मिला था, जब वह टमाटर लेने आई थी। शबानी वहाँ नौकरी करता है। वह कहता है, “मुज़ूंगू या मुहिन्दी जब उसकी सेलरी से दुगुने की ख़रीदारी कर जाते हैं, तब उसे ख़ुद से नफ़रत होती है। एमबीए होकर वह काउंटर पर बैठता है। हमारी मिट्टी इतनी संसाधन-संपन्न है; फिर भी हम नौकर हैं, ये मालिक हैं। लड़के ड्राइवर और लड़कियाँ बाई बनती हैं। अँग्रेज़ी बोलना आ गया तो सुपरमार्केट या ब्रांड स्टोर में नौकरी लगती है, ताकि ख़रीदारी में बाहरवालों की मदद हो सके। हमारी सरकार हमारे हितों के बारे में नहीं सोचती। बाहरी लोग आकर यहाँ लूट-खसोट करते हैं।”

शबानी की आवाज़ में हताशा और बेहिसाब रोष है। शबानी की बड़ी-बड़ी बातें हव्वा की समझ में नहीं आतीं। वह उसे बोलते हुए टुकुर-टुकुर देखती है। ऐसा दानिशमंद लड़के ने उसमें क्या देख लिया?

“तुम्हारी आँखें, तुम्हारी सादगी।”

शबानी पहली उँगली से उसकी नाक का शिख छूता है। वह उसकी उँगली थाम लेती है। शबानी उसके मोबाइल में इंटरनेट का पैक डलवा देता है। ख़ाली समय में दोनों चैटिंग करते हैं, भविष्य की योजनाएँ बनाते हैं।

“हम किसी दूसरे देश निकल जाएँगे।” शबानी उसका हाथ कसकर पकड़ लेता है।

“नई ज़िंदगी शुरू करेंगे।” हव्वा उसकी आँखों में देखती है।

“हाँ, मैं सौदे की दुकान कर लूँगा।”

“नहीं, मोबाइल एक्सेसरीज़ की।” हव्वा मचलती है।

“तुम जैसा कहो।”

वह उसकी आँखें चूम लेता है!

सुनीता नहाने गई तो दरवाज़ा बंद करना भूल गई। हव्वा आहिस्ता से गई और उसके पर्स से एक बड़ा नोट निकाल लाई। यह उसकी पहली बड़ी हिमाक़त थी।

अगले दिन बच्चे के बीमार होने का बहाना कर सुनीता से थोड़े-से पैसे उधार माँगे—“तनख़्वाह से काट लेना”—और जल्दी निकल गई कि अगर शक भी हुआ तो मिट्टी डाल सके। शबानी उसकी प्रतीक्षा में खड़ा था। वे स्थानीय ढाबे पर गए। हव्वा ने कूकू (ग्रिल्ड मुर्ग़ा) और चिप्स के साथ कोका लिया, शबानी ने बीयर। दोनों बहक गए... शबानी हव्वा को अपने कमरे पर ले आया। बहकना थमा तो मन-पेट और तृप्त देह लिए हव्वा अपने घर लौट आई। लूल्हे पति को उपेक्षा से देखा। शबानी नहीं जानता उसके माँ-बाप कौन हैं। वह अनाथालय में पला-बढ़ा है और उसे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। पूर्व में उसकी कई प्रेमिकाएँ रह चुकी हैं, लेकिन अब वह बस हव्वा के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ारना चाहता है। वह अपने बच्चों को बेहतर ज़िंदगी देना चाहता है और चाहता है कि वे हव्वा जैसी सपनीली आँखों वाले हों। इस बात पर हव्वा उसके होंठों को चूमकर उससे लिपट जाती है! कहीं से लौटते हुए रेणुका जी ने बाओबाब के नीचे कामवालियों की बैठक में हव्वा को शामिल देख सुनीता को चेताया, “इसके रंग-ढंग बदल रहे हैं, सँभलकर रहना।”

सुनीता उनकी बातों पर कान नहीं देती है।

“पूरनियाँ स्त्री क़तई कंजूस होती हैं। अरे, ठीक है—कभी दो प्याज़ ले लिया, कभी दो टमाटर, तो कौन-सा नसीब लूट लिया। ग़रीब है, क्या ही करें! हम किलो में लाते हैं, वे संख्या में ख़रीदते हैं।”

हव्वा कह रही थी, “इनका अधिकतर खाना बिना प्याज़-टमाटर के पकता है। कुछ विशेष बनाने पर एक-दो प्याज़-टमाटर लाती है। बकर ईद पर तो मुझसे ही माँग ले गई। दो-दो माँगा था, मैंने चार-चार दिए और कह दिया, ज़रूरत पड़े तो मुझसे ले लिया करे।”

सुनीता अपने मन की सारी बातें प्रभास जी से साझा करती है, उनसे कहकर हल्का महसूस करती है। न कहे तो बेचैन रहती है। कहती है, भीतर भरा-भरा-सा लगता है। प्रभास जी मुस्कुराते हैं, “कॉफ़ी पीओगी?”

“हाँ, ज़रूर!”

कहते हुए सुनीता भी मुस्कुराती है! रेणुका जी अपने बड़े बेटे से मिलकर आईं तो सुनीता के लिए स्विस चॉकलेट ले आईं। सुनीता ने उसमें से कुछ निकाल हव्वा को उसके बच्चों के लिए दिए। हव्वा ने फटाफट कई एक खा लिए। सुनीता देखती रह गई। बाक़ी यहीं रख गई थी, फ़्रिज में अलग से, बच्चों के लिए नहीं ले गई—ख़ुद ही खा गई सारे! सुनीता को हैरानी होती है।

“यहाँ की औरतें पहले अपना सोचती हैं। कुत्ते-बिल्लियों का भी अपने बच्चों से यहाँ की औरतों की तुलना में अधिक प्रेम होता है। इनको बहाना करना हो तो बच्चे को बीमार कर देती हैं,” रेणुका जी ने घृणा से मुँह बिचकाया। “मैं और तुम ऐसा कभी नहीं करेंगे!”

सुनीता को याद है, उनकी बिटिया को गुलाबजामुन बेहद पसंद हुआ करता था। वह अपनी प्लेट से भी बिटिया को दे देती। माँ का मन तो ऐसा ही होता है।

“यहाँ की माँएँ अलग होती हैं,” शायद सोचकर सुनीता निःश्वास हुई।

जनवरी गर्मी का मौसम है। भारत के उलट, अक्टूबर माह के दूसरे पखवाड़े से जो गर्मी शुरू होती है, दिसंबर-जनवरी में भयावह हो जाती है। इन्हीं दिनों यहाँ बाज़ार में कटहल का कोआ ख़ूब दिखता है। स्थानीय लोग ख़ूब चाव से खाते हैं।

सुनीता को कोआ से महक आती है। हव्वा से मालूम हुआ, कटहल को स्थानीय महाराष्ट्रीयन की बोली में ‘फ़नस’ कहते हैं। सुनीता ने तोड़-जोड़कर कच्चे कटहल के बारे में मालूम किया तो हव्वा के साथ-साथ रेणुका जी से भी ‘यहाँ कोई नहीं खाता’ जवाब मिला। लेकिन उस दिन जाने कहाँ से हव्वा दो छोटे-छोटे कटहल ले आई। काटा, उबाला, फिर सब्ज़ी बनी। हव्वा ने चखी तो कहा, “पैक कर दो, मियाँ के साथ रात के खाने में खाऊँगी।”

जाते हुए सब्ज़ी का डब्बा कचरे में फेंक गई, जिसकी ख़बर किसी को नहीं हुई। सुनीता को तो क़तई नहीं!

“ये इतना तेल-मसाला नहीं खाते,” रेणुका जी ने चखकर हैरत से कहा।

“क्या मालूम, इसे रुचता हो।”

सुनीता को हर बात पर व्योमकेश बख़्शी बनने की रेणुका जी की आदत ठीक नहीं लगती। उसने हव्वा के मुतल्लिक़ कोई भी बात उनसे साझा करना बंद कर दिया। यूँ यह बात रेणुका जी से भी छुपी नहीं रही और आगे से चुप रहने में ही बेहतरी समझा।

“ख़ुद समझदार है। दुनिया देखी है। मैं कौन-सी माँ लगती हूँ। जाने वो, जाने हव्वा!”

पिछली रात उपवास के कारण देर तक नींद नहीं आई थी। अगले दिन खाते ही नींद आने लगी और टीवी देखते-देखते सुनीता की आँख लग गई। हव्वा ने काम के बहाने पास से आ-जाकर तस्दीक़ कर लिया कि वह वाक़ई गहरी नींद में है। तब उसने अपने बैग से साबुन निकाला और उस पर कमरे की चाबी की छाप ले ली। फिर शबानी को इत्तिला कर दिया—काम हो गया। जवाब में शबानी ने चुम्बन वाले इमोजी भेजे। उसने शरमा कर फ़ोन रख दिया, हालाँकि उसकी देह चाहने लगी थी कि कहीं से भी इस वक़्त शबानी आ जाए। योजनानुसार सिरदर्द का बहाना कर काम से जल्दी निकलकर सुपर मार्केट चली गई। दुर्योग से ख़रीदारी करती रेणुका जी ने वहाँ उसे शबानी से लरजते देखा। हव्वा ने भी उन्हें अपनी ओर देखते हुए देख लिया। यूँ वह सकपका गई थी ज़रूर, किंतु फ़ौरन ही आगे बढ़कर पलकें पटपटाते हुए उनकी मदद करने लगी। उसकी चालबाज़ियाँ बूझते हुए रेणुका जी ने मन ही मन उसे भद्दी-सी गाली दी, किंतु ऊपर से सहज बनी रहीं। चाय पीने के बहाने सुनीता के घर आ गईं।

“बहुत थक गई हूँ। तुम्हारी हव्वा चाय बहुत मज़े की बनाती है।”

“वह तो चली गई है, मैं बनाती हूँ।”

“वह जल्दी क्यों चली गई?”

“उसके सिर में दर्द था।”

रेणुका जी सुपरमार्केट वाली बात छुपा गईं। दूसरे दिन आते ही हव्वा ने बताना शुरू कर दिया कि सिरदर्द की दवा लेने वह सुपर मार्केट गई थी। वहाँ उसे दूर का देवर मिल गया, जो काउंटर पर काम करता है। रेणुका जी भी ख़रीदारी करती दिखीं। सुनीता को तेज़ ग़ुस्सा आया। रेणुका जी सास जैसा बर्ताव करने लगी हैं। जब हव्वा को वहाँ देख ही लिया था तो फिर बहाने से पूछने क्यों आईं? पता नहीं उनके दिमाग़ में क्या चल रहा है। सनकी औरत! हूँह। सुनीता के चेहरे का बदला रंग हव्वा से छुपा नहीं। वह अपनी चाल की कामयाबी से ख़ुश थी, अधिक ख़ुश इसलिए भी कि कल शबानी के साथ साझी ख़ुशी का जश्न जी भरकर मनाया था। वह उसे सड़क के उस पार समुद्र किनारे जंगल की ओर ले गया था, जहाँ कोमल पत्तों वाले झाड़ हैं और जोड़े अक्सर एकांत की तलाश में वहाँ आते हैं। अपने लिए बीयर और हव्वा के लिए ब्रुटल के साथ ग्रिल्ड समाकी (मछली) और केकड़े का झोल पास के ही स्थानीय ढाबे से ले आया था। सच, जीवन का स्वाद शबानी के बिना फीका था। तृप्त मन-देह से उसने बीते दिन का शेष रह गया काम भी निबटा लिया था! हव्वा उचित मौक़ा पाकर सुनीता की पर्स या प्रभास जी की जेब से एक-दो नोट उड़ाने लगी है। जिस दिन ऐसा करती है, ख़ास तौर से कुछ-न-कुछ माँगती है—कभी पैसे, कभी टमाटर, कभी प्याज़ तो कभी तेल। शक़ की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती!

कमरे की नक़ली चाबी बनकर आ गई है, जो हव्वा अपने बैग की चोर जेब में रखती है। हव्वा को रात के खाने की तैयारी बता सुनीता तैयार होकर निकली है। किसी के उधर दोपहर के खाने की दावत है, शाम तक लौटेगी। देर होने पर मुख्य दरवाज़े की चाबी रेणुका जी के घर छोड़ने को कहा है। सुनीता की कार टूरे ड्राइव पर तेज़ी से जाती देख हव्वा फ़ौरन ताला खोल उसके कमरे में घुस गई। तमाम दराज़, कपड़ों की तहें खँगाल लीं। लंबी-छोटी यात्राओं के बैग भी। मँझोले आकार के एक बैग के भीतर तालाबंद छोटा बैग—मतलब माल इसी में है। ऊपरी ताले के साथ प्लास्टिक (नायलॉन) का बैग। अच्छी बात—दरअसल मूर्खतापूर्ण बात—यह है कि ऊपरी बैग पर कोई ताला नहीं। होता भी तो क्या? सोचकर वह कुटिलता से मुस्कुराती है।

हव्वा ने सबकी फ़ोटो ली—ऊपरी बैग की, छोटे बैग की, बंद ताले की—और शबानी को भेज दी। इस खोजबीन में उसे सौ यूरो का एक नोट भी मिला, जो वह शबानी से छुपा गई। सुनीता दोस्तों के बीच हव्वा की तारीफ़ के क़सीदे काढ़ रही है।

एक सहेली ने कहा, “नज़र न लगे!”

“हाँ, आजकल सबमें कमी-बेसी चल जाता है, लेकिन कामवाली सौ टका चाहिए।”

“मेरी माँ तो कहती है, अच्छी कामवाली को नज़रिय़ा पहना देना चाहिए।”

इसके बाद ठहाकों का समवेत स्वर! हव्वा ने सब कुछ यथास्थान रख कमरे को पुनः लॉक कर दिया। काम ख़त्म कर चाबी रेणुका जी के उधर छोड़ सुनीता को मैसेज कर दिया। सौ यूरो पास के एक्सचेंज से बदलवा कर शिलिंग्स ले लिए। सब कुछ क्यों लुटा दे शबानी पर? अपनी भी तो ज़रूरतें हैं। नए चलन में आया कॉर्ड सेट देखकर उसका मन कितना तो ललचता है। और एक हैंडबैग भी—मैचिंग सैंडल के साथ, “एमके”  की लोगो वाली। एक गाढ़े रंग की लिपस्टिक भी लेगी और फूलों की महक वाली ख़ुशबू, जैसी सुनीता अक्सर लगाती है! 

हव्वा ने रात का खाना बाहर से मँगवाया। बच्चों के लिए कोका, पति के लिए बीयर और अपने लिए ब्रुटल।

“लॉटरी लगी है?” पति ने पूछा।

तो उसने कहा, “मैडम की खोई कान की बाली मैंने ढूँढ़ दी, तो ख़ुशी में बख़्शिश से नवाज़ा!”

“मुझे तुझ पर नाज़ है,” कहकर उसने चूमना चाहा तो हव्वा ने मुँह फेर लिया।

“रहने दे। जिस रास्ते की कोई मंज़िल नहीं, उस पर चलकर क्या?”

“अपंग पति से तेरा जी भर गया?”

“तू मेरे किसी काम का नहीं रहा। कम-से-कम भीख ही माँग लेता, लेकिन बीवी की कमाई पर मज़े लूट रहा है तू। कहता था रानी बनाकर रखेगा, नौकरानी बनकर रह गई हूँ।”

“क्या रानी बनाकर नहीं रखा?”

“अब मेरे गले लटक गया है।”

कहकर वह बीच बहस घर से निकल दूर जा शबानी से बतियाने लगी।

“मुझे तुम्हारी बहुत तलब हो रही है।”

“मुझे भी।”

“दिन अब दूर नहीं। तू अपनी तैयारी पूरी रखना,” हव्वा ने कहा।

“तुम फ़िक़र मत करो, मेरी जान!”

आज दशहरा है। सुनीता ने बड़ी दावत रखी है—आमतौर की बैठक या भोज से बड़ा महाभोज। गुज़रे बरस भी ऐसा ही जलसा रखा था। स्त्री, पुरुष, बच्चे सभी आमंत्रित थे। तब हव्वा नई थी और सुनीता बेहद सतर्क। उसे मालूम है, जलसों में स्त्रियाँ लापरवाह हो जाती हैं, लेकिन वह इधर-उधर कुछ भी सोचने से पहले जमना चाहती थी, सुनीता का दिल जीतना चाहती थी। इसमें वक़्त लगता है। सब कुछ योजनानुसार हो रहा है। सुनीता उस पर आँखें मूँदकर भरोसा करने लगी है। यही सही वक़्त है। उसने वह जगह भी देख ली है जहाँ सुनीता अपने गहने रखती है। अब बस एक ख़ास दिन अपनी योजना को अंजाम देना है और वह आज़ाद हो जाएगी कामवाली की नौकरी से। वह यह सब करने के लिए पैदा नहीं हुई है।

उसने देखा, गहनों और रंग-बिरंगे कपड़ों में सजी-सँवरी स्त्रियाँ यूँ आई हैं, मानो फ़ैशन शो का आयोजन हो। दावत पिछली मर्तबा से बढ़कर है। हव्वा ने ऐसा आयोजन हिंदी फ़िल्मों में देखा है। इतने व्यंजन कि जितनी हव्वा को गिनती भी नहीं आती। कई-कई तरह के शरबत—लाल, नारंगी, हरे और नीले—काँच के मर्तबानों में भरे हैं। उधर एक टेबल पर जैसे अँग्रेज़ी शराब की दुकान खुली हो।

“उफ़्! शबानी यह देख ले तो पता नहीं कितनी देर तक ग़ुस्से से उफनता रहेगा, सरकार को कोसता रहेगा।”

पिछली बार की तरह इस बार भी सुनीता ने घर आकर पकाने वालों को बुलाया है। वे कई कर्मी अपने जत्थे के साथ आए हैं। हव्वा तो बस यूँ ही है, जैसे न भी हो तो कोई बात नहीं। रेणुका जी भी आई हैं। पिछली बार बेटे के उधर थीं। आते हुए हव्वा को तिरछी निगाह से देखती हैं। वह उन्हें नज़रअंदाज़ करती है। सभी मेहमान उपहार में कुछ-न-कुछ लेकर आए हैं। सुनीता हँस-हँस लेती है, फिर उसे हव्वा को दे देती है। हव्वा उसे दूसरे कमरे में रख आती है। कमरा उपहारों के डब्बों से भर गया है। भीतर ही भीतर इनकी ठाठ पर कुढ़ते हुए हव्वा का मन करता है कुछ ऐसा कर दे कि रंग में भंग पड़ जाए। वह काँच का एक जग गिरा पलकें पटपटाने लगती है। थोड़ी देर के लिए रंग में भंग पड़ जाता है, लेकिन “काँच था, टूट गया,” कह सुनीता पुनः जलसे का हिस्सा हो जाती है, जहाँ स्त्रियाँ किसी गंभीर परिचर्चा में व्यस्त हैं।

“इस बार धनतेरस पर क्या लेने का इरादा है?”

साफ़-सफ़ाई में जुटी हव्वा अपनी हरकत पर पछता रही है। फ़िज़ूल ही काम बढ़ गया। लेकिन धनतेरस सुनकर उसके कान खड़े हो जाते हैं। उसने ‘दार डाडा’ज’ ग्रुप में इसके बारे में सुन रखा है। इस ख़ास दिन भारतीय स्त्रियाँ वर्ष भर की बचत लुटा सोना ख़रीदती हैं।

“एक—पिछली बार नेकलेस लिया था, इस बार मैचिंग ब्रेसलेट लूँगी।”

हव्वा ने नेकलेस और ब्रेसलेट जैसे शब्द नोट किए। जब से उसके पास स्मार्ट फ़ोन आया है, उसने अपना अंग्रेज़ी शब्दकोश और बढ़ा लिया है।

“दो—मैं इस बार झुमके लूँगी, बड़े वाले, अरेबियन डिज़ाइन के।”

“तीन—मैं इस बार थ्री-लेयर्ड नेक पीस लूँगी।”

“तुम तंज़ानाइट ले जाना, सुनीता। यहाँ की याद रहेगी।” रेणुका जी की आवाज़ थी। हव्वा तंज़ानाइट शब्द नोट करती है। वह जानती है, मुहिन्दी-मुज़ूंगू सभी यहाँ से बेशक़ीमती तंज़ानाइट ज़रूर ले जाते हैं।

“पहली बार वही लिया था, निशानी के लिए। यूरोपियंस में भी ख़ूब क्रेज़ दिखा, लेकिन उसका रीसेल वैल्यू कुछ नहीं है। मुझे गोल्ड अधिक पसंद है। एक तरह का इन्वेस्टमेंट है हम स्त्रियों का।” हव्वा ने गोल्ड नोट किया।

“हाँ-हाँ, और यहाँ का गोल्ड है भी कितना शुद्ध! उस पर भारत से सस्ता और डिज़ाइन अलग।” हव्वा फिर से गोल्ड शब्द नोट करती है।

“इस बार तो तीन सेट लूँगी। एक होने वाली बहू और एक बिटिया के लिए भी।”

“यहाँ के लोगों के सामने इतनी खुलकर बात नहीं करनी चाहिए,” रेणुका जी ने चेताया।

“अरे रेणुका जी, दो बरस से मेरे साथ है। आज तक एक सुई भी इधर-उधर नहीं किया है इसने। छह महीने और। और तो और, बहुत धार्मिक है। कल भी कोई व्रत था। धर्म में रत लोग निःपाप होते हैं।” मस्तमौला अंदाज़ में सुनीता ने कहा।

रेणुका जी को सुनीता पर अफ़सोस हुआ। अगर उनकी याद्दाश्त इतनी बुरी नहीं है तो कल ही शाम उन्होंने हव्वा को मकई खाते देखा है। ज़रूर कुछ बड़ा सोच रही है, कमीनी। लेकिन उन्हें क्या? सच तो यह भी है कि इन बाहरी लोगों के कारण ही कामवालियों में मन इतना बढ़ गया है। आदतें ख़राब हो गई हैं इनकी, चोरी-चकारी सीख गई हैं। वरना पहले तो ये दास-दास रहा करते थे, ज़ुबान नहीं खुलती थी इनकी। अब तो मुँहलगी हो गई हैं सारी की सारी करमजलियाँ। बीच हॉल में रंगीन चावलों की एक आकृति बनी है। इसे बनाने में सुनीता को दो घंटे लगे और तैयारी कई दिनों से चल रही थी। जितने चावल इसे बनाने में लगे हैं, वह दरअसल हव्वा के पूरे महीने का राशन है। हफ़्ते बाद समूची आकृति समेट ली जाएगी। रंगीन चावल पंछी भी नहीं खाते। हव्वा ले लेती है कि खाने का ही रंग है। बच्चे रंगीन पिलाव (पुलाव) देखकर ख़ुश होते हैं।

रिहायश के कामगार बताते हैं, अँधेरा होते ही घर जैसे रोशनी का बिजूका बन जाता है। हव्वा ने देखा है—बाहर इलेक्ट्रिक लड़ियाँ झूलती हैं और भीतर दरवाज़ों से लगे जल-बुझे दीये रखे होते हैं। यह कई दिनों तक चलता है। फिर पहले भीतरी दीये पैक होते हैं, बाद में बाहरी लड़ियाँ उतरती हैं, लगभग पखवाड़े बाद।

वह दो बार देख चुकी है। इन दिनों रेणुका जी अपने बेटों के पास चली जाती हैं। यूँ देखा जाए तो वह यहाँ कम ही रहती हैं, अधिकतर बच्चों के साथ होती हैं। सुनीता ने बताया, यह दिवाली का त्योहार है। दशहरे के बीस दिन बाद आता है और धनतेरस के दो दिन बाद। दशहरा नौ दिन स्त्री-शक्ति की पूजा के बाद आता है और दीवाली में धन की देवी लक्ष्मी जी की पूजा होती है। इस पूजा में देवी के स्वागत की ख़ातिर घर की साफ़-सफ़ाई और सजावट होती है।

“हम अफ़्रीका वाले धन की देवी की पूजा नहीं करते, शायद इसलिए ग़रीब हैं,” हव्वा सोचती है और उदास हो जाती है।

“जब वह शबानी के साथ रहेगी तो लक्ष्मी की पूजा करेगी। आजकल इंटरनेट पर सब मौजूद है!”

धनतेरस का दिन है। सुनीता ने कढ़ी-बड़ी बना ली है। बज़का के लिए सब्ज़ियाँ काट प्रभास जी के साथ बाज़ार की तरफ़ निकली है। दशहरे के हफ़्ते बाद ही पेशगी देकर अपनी पसंद के तीनों सेट रखवा आई थी। आज पूरी क़ीमत चुका कर घर ले आएगी। पिछले वर्ष भी यही किया था। यह नुस्ख़ा रेणुका जी ने सुझाया था।

“अच्छे डिज़ाइन निकल जाते हैं, हम तो पहले ही रखवा आते हैं।”

सुनीता को उनका यह सुझाव पसंद आया। वह भी ऐसा ही करने लगी है।

आज के दिन छीन-झपट का ख़तरा आम दिनों की तुलना में बढ़ जाता है, ख़ासकर सोनारा स्ट्रीट में। फ़ोन-झपट्टी तो इस देश में आम बात है। यहाँ की स्त्रियाँ सोने के गहने पहनकर बाज़ार नहीं घूमतीं। सुनीता को भी रेणुका जी ने चेताया था, इसलिए बाज़ार निकलते समय गहने उतारकर रख देती है। प्रभास जी के साथ रहने पर फ़ोन भी घर छोड़ जाती है। हाँ, दोपहर की बैठकी या लंच-डिनर पर जाते हुए झुमके-कंगन बदल-बदलकर पहनती है, जो हव्वा की शातिर नज़रों से नहीं छिपता!

सोने के तीनों सेट कार की बैग में रखकर वे झाड़ू, फूल, फल और मिठाई ख़रीदने लगे। दार में मिठाई की कई दुकानें हैं और हर दुकान पर एक जैसी भीड़। पूजा के सामान की दुकान पर भी ठीक वैसी ही बलबलाई हुई भीड़। सुनीता ने वहाँ से दीवाली उपहार के लिए पीतल की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, अगरबत्ती खोंसने की ट्रे, रंगोली स्टीकर और प्लास्टिक के फूलों वाला तोरण—इन सबके इक्कीस सेट बनवाए हैं। दो लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ कम पड़ गई थीं, जो आज लेनी हैं। सुनीता ने घर से निकलने से पहले फ़ोन कर दिया था, “मैं आ रही हूँ, निकालकर रखना।” हालाँकि उसने बड़ी मुश्किल से फ़ोन उठाया था, लेकिन तब भी सुनीता का पैकेट तैयार नहीं था।

“मैंने आने से पहले फ़ोन भी तो किया था,” सुनीता ने नाराज़गी जताई तो दुकान वाली तमक गई।

“सिर्फ़ आपका काम तो करने नहीं बैठे हैं। भीड़ भी तो देखिए। आप भारतीयों में सब्र नाम की कोई बात नहीं। हमेशा घोड़े पर सवार होते हैं आप लोग।”

तभी हम भारतीय इतने आगे हैं, सुनीता ने मन ही मन कहा।

सुनीता को यहाँ के लोगों का अव्यावसायिक बर्ताव बहुत अखरता है। भारत में एक साथ इतनी ख़रीदारी पर कितनी तो आवभगत करते और सामान घर तक भिजवा देते। ये तो ठीक से बोलते तक नहीं, उस पर तंज़ कसते हैं। सुनीता ने देखा है, यहाँ के लोग पैसे लेने में बहुत जल्दी करते हैं, लेकिन सेवा देने में आनाकानी। अश्वेतों से तो सुनीता वैसे भी बहुत उम्मीद नहीं रखती, लेकिन भारतवंशी भी कम नहीं—उन्नीस-बीस या यूँ कहिए कि रूप-रंग का ही अंतर है बस, एक जैसी सुस्ती दोनों में।

वह वहीं कोने में खड़ी दूसरों को ख़रीदारी करते देखती रही और सोचती रही।

एक अश्वेत महिला आई और सुनीता को उसका पैकेट पकड़ा गई।

इतना छोटा-सा काम पहले नहीं हो सकता था? लेकिन इस देश में लोगों को दूसरों के वक़्त की कोई क़द्र नहीं। इन्हें ख़ुद भी कोई जल्दी नहीं। न कहीं पहुँचने की जल्दी, न कोई भागम-भाग। आरामतलब लोगों का देश है यह। ये एक-दूसरे से हाल-समाचार पूछने में भी न जाने कितना वक़्त गँवा देते हैं। शुरू-शुरू में तो हँसी आ जाती थी—पहले आपकी पूछते हैं, फिर आपके बच्चों की, फिर आपके माँ-बाप की और जो आप न पूछें तो असभ्य! ख़ैर, चार-छह महीने और हैं, कट जाएँगे इसी तरह। सुनीता को क्या?

खिन्नता से भरी सुनीता रास्ते भर चुप ही रही। प्रभास जी उसकी नाराज़गी समझते हैं और जानते हैं कि घर पहुँचते ही चाय के साथ सुनीता का मूड ठीक हो जाएगा।

दरअस्ल, जीवन तो कहीं भी सरल नहीं। न यूरोप में, न अफ़्रीका में और न भारत में होगा। यूरोप में अपनी चुनौतियाँ थीं, अफ़्रीका में अपनी हैं और भारत में अपनी होंगी। पॉलिटिकल उथल-पुथल और धार्मिक विद्रोह से वहाँ जीवन इतना असुरक्षित हो चला है कि अब अपना देश ही बेगाना लगने लगा है। जात-पात, धर्म की इतनी बहसें हैं, मानो जीवन में और कुछ रखा ही न हो। महँगाई आसमान छू रही है, युवाओं के पास नौकरी नहीं, बच्चियों-स्त्रियों के साथ क्रूरता में कोई कमी नहीं; लेकिन सस्ते इंटरनेट पैक ने सबको ऐसा नशेड़ी बना दिया है कि किसी को कोई काम नहीं सूझता, सिवाय सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस के। सब के सब फ़िज़ूलबाज़ी में लिप्त हैं।

इन ख़यालों से उनका मन ऐसा ख़राब हुआ कि उन्होंने कार चाय-बुटीक के पास रुकवा दी। केसर वाली चाय के साथ समोसा खाकर दोनों का मन बहल गया। भारत लौटने के बाद यह केसर वाली चाय ज़रूर याद आएगी।

“सच कह रहे हैं आप। मैंने कितनी तो कोशिशें कीं, लेकिन यह स्वाद नहीं उतरा।”

हव्वा के लिए समोसे पैक करवाकर वे घर पहुँचे। घर काँच की तरह चमक रहा है। सभी चीज़ें वहीं की वहीं रखी थीं, मानो किसी ने छुआ तक न हो।

“मैं तो हव्वा को भी बहुत याद करूँगी भारत में।”

प्रभास जी ने हव्वा को अपने बग़ल में एक बैग कसकर दबाए देखा।

“ले चलो इसको भी भारत, हमारे साथ रहेगी।”

“आप भी न! युवाओं की अपनी ज़रूरतें होती हैं। हमारी तरह अधेड़ नहीं है यह।”

“सच कह रही हो,” कहकर प्रभास जी कमरे में चले गए।

गहने भीतरी बैग में सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। समोसा खाकर हव्वा का मन ग्लानि से भर उठा। ये दोनों उससे कितना स्नेह करते हैं और वह कैसी योजना बना रही है—इन्हें ठगने की। उसे ख़ुद के लालची होने पर ग़ुस्सा आया। प्रभास जी या सुनीता को जब भी एक-दो नोट कम मिले, वे इसे अपनी ग़लतफ़हमी मानकर बिसरा गए। शक की एक सुई भी हव्वा पर नहीं गई!

हव्वा मातमी चेहरा लिए घर पहुँची। उसकी उदास सूरत मियाँ के चेहरे पर छुरी चला रही थी। वह कुरेदता है, लेकिन हव्वा की चुप्पी न खुली तो नहीं खुली। भीतर भयंकर तूफ़ान उठा हुआ है। ऐसे सहृदय लोगों को लूटना कहाँ का इंसाफ़ है? सुनीता के दिए चावल और कढ़ी परोसती हुई वह सोच में डूबी है। शबानी फ़ोन कर रहा है। वह नहीं उठाती। वह फिर करता है, वह फिर नहीं उठाती। वह कई-कई बार करता है, वह हर बार नहीं उठाती। अंततः फ़ोन बंद कर सो जाती है!

वह बस से उतरती है तो शबानी प्रतीक्षा में खड़ा मिलता है।

“तुम्हारा फ़ोन किधर है?” वह परेशान लग रहा है। (उसका अनुमान है कि खो गया है।) हव्वा ने बंद फ़ोन बैग से निकालकर दिखा दिया। वह उसके हाथ से फ़ोन झपट लेता है।

“गिर गया था क्या?” (उसका अनुमान है कि ख़राब हो गया है।) हव्वा इनकार में सिर हिलाती है। शबानी देखता है, फ़ोन तो बिल्कुल ठीक है। गड़बड़ी हव्वा में है।

“तुम्हारे मियाँ ने कुछ कहा?”

हव्वा चुपचाप चलती जाती है। दोनों उस मोड़ पर पहुँच गए हैं जहाँ से शबानी को आगे बढ़ना है और हव्वा को बाएँ मुड़ना है।

शबानी उसका हाथ पकड़ लेता है।

“क्या हुआ? कुछ तो बताओ।”

हव्वा फफककर रो पड़ी।

“शाम को बात करते हैं। मुझे देर हो रही है...” कहती हुई आँसू पोंछकर हव्वा आगे बढ़ गई।

“फ़ोन ऑन रखना...” पीछे से शबानी चीखा।

तयशुदा वक़्त पर दोनों बस स्टॉप पर मिलते हैं।

“मुझसे ये नहीं होगा। बहुत भले लोग हैं...” हव्वा ने रुआँसी आवाज़ में कहा।

“जितना वो एक बार में सब्ज़ी और फल में ख़र्च कर आते हैं, उतना तुम्हें महीने का देते हैं। वाक़ई भले लोग हैं।” शबानी की आवाज़ में तंज़ था।

“जो हमारी सरकार ने तय किया है, उससे ज़्यादा देते हैं। मासिक के अतिरिक्त अधिकतर रात के लिए खाना भी पैक कर देते हैं।’ हव्वा बिफर गई थी।

“हाँ, ज़रूर! बचा हुआ खाना, जो वैसे भी फेंकना ही था। तुम उनके लिए टाका-टाका (कचरे की पेटी) ही तो हो। और रही बात हमारी सरकार की, तो ये हमारे बारे में कब सोचते हैं?’

“तुम क्यों नहीं करते सुपर मार्केट में?”

“वहाँ हर जगह कैमरे लगे हैं और फिर बड़ी संस्था वालों की पहुँच बड़ी होती है। वे हमें ढूँढ़ निकालेंगे।”

“जो भी हो, मुझे यह ठीक नहीं लग रहा।” इतना कहकर हव्वा बस में चढ़ गई। शबानी वहीं रह गया!

आजकल हव्वा अपना फ़ोन बंद रखती है। ऐसा नहीं है कि उसे शबानी की याद नहीं आती, लेकिन उसने अपने मन पर पत्थर धरा हुआ है। बस स्टॉप पहुँचते ही उसकी आँखें छलछला आती हैं, तब वह सुनीता का दिया काला चश्मा लगा लेती है।

देह का क्या है; सोसाइटी का मैनेजर उसके पीछे पड़ा है, लेकिन उसका मन शबानी में अटका है। बाओबाब के नीचे मज़मे में बैठती तो है, लेकिन रम नहीं पाती। सखी-सहेलियाँ कुरेदती हैं तो माँ की बीमारी का बहाना देती है। उसका मियाँ भी उसे फ़ोन से लगा न पाकर ख़ुश रहता है कि अब उसे सोचने की ज़रूरत नहीं। एक-सवा साल से वह बेहद असुरक्षित महसूस करने लगा था। फ़ोन उसका सौत था—फ़ोन के पीछे वाला? अपनी दुविधा को परे धकेल वह हव्वा के पास सरक आता है और अपनी उँगलियों के करामात से जादू करता है। हव्वा उससे लिपट जाती है, यह कहते हुए कि अब पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा!

सुनीता जल्दी में थी। “बाद दोपहर लौटूँगी...” कहकर वह अपने कई सारे ब्लाउज़ रख गई कि इन्हें धूप लगा देना। शाम लौटी तो ध्यान नहीं दिया। अगले दिन सारे ब्लाउज़ इस्त्री वाले कपड़ों के साथ रखे मिले—इसका रंग उसमें, उसका रंग इसमें चढ़ा हुआ! वह ग़ुस्से में अपना आपा खो बैठी। अँग्रेज़ी-स्वाहिली की मिलावट में हव्वा को ख़ूब डाँटा। मूर्ख, महामूर्ख अफ़्रीकन—जाने क्या-क्या कह गई! उफनती रही, उबलती रही। हव्वा आँखें पटपटाती रही। सुनीता अपने कमरे में चली गई। हव्वा कपड़े बदलकर बाक़ी कामों को जस का तस छोड़, बिना कुछ बोले आँखों में आँसू लिए निकल गई। बाहर निकलते ही उसने शबानी को फ़ोन किया और रो-रोकर सारा हाल कह सुनाया।

“मैंने पहले ही कहा था, बाहर वाले बाहर वाले ही होते हैं। ज़रा-सी चूक पर तुम्हें इतना डाँटा। ये रहम के क़ाबिल नहीं।”

“तुम ठीक कहते हो, लेकिन अब क्या करूँ? मैं तो घर छोड़ आई हूँ।”

“तुम अपने घर जाओ। मैं शाम को बताता हूँ।”

दूसरे दिन हव्वा समय से आई। दरवाज़ा खोलते ही हाथ जोड़कर घुटनों पर बैठ गई।

“माफ़ करो दो! और सारे ब्लाउज़ की क़ीमत तनख़्वाह से काट लो।”

तुम्हारी तनख़्वाह से काटूँगी तो तुम घर क्या ले जाओगी? कम-से-कम छह महीने की पूरी सैलरी जाएगी—सुनीता ने सोचा, लेकिन प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कहा।

एक तो ब्लाउज़ ख़राब किए, उस पर तैश इतना कि काम छोड़कर बिना बताए चली गई। सच ही कहा है किसी ने—मूर्खों में अहं उनके शरीर के वज़न से अधिक होता है। हालाँकि कमीनी के आने से काम की टेंशन तो ख़त्म हुई, लेकिन सुनीता का ग़ुस्सा जस का तस बना रहा।

शाम को इस्त्री किए कपड़े अलमारी में जमाने गई तो प्रभास जी की डार्क ब्लू पोलो कॉलर का रंग किनारे से आधा उड़ा देखकर ठंडा होता ग़ुस्सा फिर भड़क उठा। हे भगवान! राल्फ़ लॉरेन की स्पेशल एडिशन पोलो सुनीता ने प्रभास जी को अभी पिछले महीने उनके बर्थडे पर उपहार में दी थी। यह रंग उनके पास नहीं था!

सुनीता बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रोने लगी। अभी तो ब्लाउज़ के दुख से नहीं उबरी थी और अब यह नई करामात! रेणुका जी भी नहीं हैं। वह बात करे तो किससे करे? किससे अपना मन हल्का करे? दोस्तों के ग्रुप में दुख साझा किया तो सबने अफ़सोस जताया। वे और कर भी क्या सकते थे?

अब मैं इसे निकाल दूँगी। चार-छह महीने ही बचे हैं, मैं ख़ुद कर लूँगी। त्योहार भी सारे बीत गए—मन ही मन सोचा। फिर ज़ेहन में रेणुका जी की बात कौंधी—यहाँ का लेबर लॉ बहुत सख़्त है। भारत जैसा नहीं कि निकाल दिया और बात ख़त्म। तीन माह के प्रोबेशन के बाद निकाले जाने पर एक अतिरिक्त माह की तनख़्वाह, उस पर वर्ष में एक माह की छुट्टी और न जाने कितने प्रकार की छुट्टियों के पैसे—कुल मिलाकर प्रतिमाह देय का लगभग छह गुना, मान लो।

कई बार अच्छे मन की होने पर ये लेबर में नहीं जाते और जाते हुए घर का बहुत फ़ालतू सामान, राशन, पुराने कपड़े, बर्तन-भाँडे के लालच में आपस में ही निबटा लेते हैं। सच तो यह है, सब इन हरामज़ादियों के मन पर निर्भर करता है। मेरी मालूमात में एक एक्सपैट को लेबर ने एयरपोर्ट पर पकड़ा था। वह झंझट से बचने के लिए कामवाली को चकमा देकर जा रहा था, लेकिन इनकी अश्कारियों और दूसरी कामवालियों से दोस्ती दरअसल इनका नेटवर्क है। ये सब आपस में एक-दूसरे के लिए ख़बरी का काम करती हैं। एक्सपैट्स के प्रति इनके मन में तनिक भी संवेदना नहीं होती। जब तक काम करती हैं, प्रेम का दिखावा करती हैं!

कामवाली के लिए भत्ता तो सरकार की तरफ़ से मिलता है—वह छह माह का ले या एक बरस का, सुनीता को क्या? लेकिन लेबर वाली बात मिनिस्ट्री में सबको मालूम हो जाएगी और प्रभास जी कहीं मुँह दिखाने लायक़ नहीं रहेंगे। उलझन में सुनीता का सिर दर्द से फटने लगा।

चाय का सॉसपैन गैस पर बिठाकर वह फिर सोचने लगी—सच ही कहा था किसी ने, अफ़्रीका में सभी समस्याओं की जड़ कामवालियाँ और ड्राइवर होते हैं। उम्र भर ख़ुद ही किया, अब कौन-सा पहाड़ तोड़ना था जो हव्वा को रख लिया? हो गई न मुसीबत! कपड़े ख़राब हुए अलग।

मूर्खों के देश में बुरी तरह फँस गई हूँ। चाय पीती हुई सोचती रही। दिमाग़ लगातार ग़लत चुनाव के लिए कोस रहा है। हमेशा ही जीवन जीने का सीधा रास्ता चुना, लेकिन यहाँ तो लगता है, ख़ुद आमंत्रित कर बुलाया है समस्या को—हव्वा को। प्रभास जी से बात करके देखती हूँ, क्या कहते हैं! भारत से किसी मिनिस्टर के आने के कारण प्रभास जी देर रात लौटे तो थककर चूर थे। कपड़े बदलकर सीधे बिस्तर पर लुढ़क गए और अगली सुबह जल्दी निकल गए—अमुक मिनिस्टर के साथ ब्रेकफ़ास्ट था। नियत समय पर कॉल बेल बजी। हव्वा आ गई थी। सुनीता ने पोलो वहीं चेयर पर रखा था। दरवाज़ा खोलते ही बिफर गई। प्रश्नों की झड़ी लगा दी :

“ये क्या किया तुमने? कैसे किया? तुम्हें पता है, कितनी महँगी है? बर्थडे गिफ़्ट था!”

“मैंने नहीं किया है। ये तो ऐसा ही था।” हव्वा झूठ बोल गई।

“एक तो ग़लती करती है, उस पर झूठ बोलती हो!” सुनीता का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर जा बैठा।

हव्वा भी तेज़-तेज़ बोलने लगी। वह स्वाहिली में, सुनीता इंग्लिश में। अंततः हव्वा उलटे पाँव लौट गई। शबानी ठीक कहता है : ये क्या हमसे प्रेम करेंगे? इनमें इतनी मनुष्यता भी नहीं कि मैं घंटे भर बस-यात्रा के बाद पहुँची हूँ। आते ही शुरू हो गई! तनिक साँस लेने दो, फिर जो बात करनी है करो। ये तो दरवाज़े पर ही शुरू हो गईं। धिक्कार है ऐसे लोगों पर! उसने शबानी को फ़ोन मिलाया। वह पेट दर्द का बहाना कर सुपर मार्केट से निकलकर बाओबाब के नीचे बैठी हव्वा से आ मिला। वहाँ से वे दोनों समुद्र किनारे कोमल लताओं वाले जंगल में चले आए।

“कौन-सा ज़मीन-जायदाद लूट लिया? चार ख़राब किए हैं, ये दस नए लेने की हैसियत रखते हैं। इतने पैसे हैं इनके पास। कहते हैं, झूठ क्यों बोला? सच बोलती तो माफ़ कर देतीं? ग़ुस्सा नहीं करतीं?” हव्वा लगातार बोल रही है। शबानी चुपचाप सुन रहा है। वह चाहता है, हव्वा के भीतर का सारा ग़ुबार निकल जाए, फिर सोचते हैं आगे क्या करना है। वह ग्रिल्ड समाकी, ऑक्टोपस का झोल और बीयर ले आया।

“मैंने कभी नहीं पी!’ हव्वा बीयर को न कहती है।

“आज शुरुआत करो।”

“नहीं, नहीं। मैं नहीं पीऊँगी।”

“मेरे लिए।”

शबानी के मनुहार पर वह पीने लगती है। दोनों पूरा साथ बिताकर, रोज़ाना की तरह तृप्त तन-मन के साथ वह घर लौट गई।

प्रभास जी ने कहा, “अपने ग़ुस्से पर क़ाबू रखो। कपड़े फिर बन जाएँगे, लेकिन गई इज़्ज़त फिर नहीं बनती। छह महीने और हैं। महँगे कपड़े अपने-आप ही धो लो, आयरन कर लो। पूरी तरह उस पर आश्रित हो गई हो तुम।”

“तमककर गई है। पता नहीं आएगी भी या नहीं?” सुनीता चिंतित थी।

“आएगी ज़रूर। बीस दिन के काम का पैसा कोई नहीं छोड़ता। उस पर अगर यह काम छोड़ेगी तो तमाम भत्तों से भी जाएगी। इतने मूर्ख ये नहीं होते। भले स्कूल न गए हों, लेकिन लेबर के सारे नियम इन्हें ज़ुबानी याद होते हैं। ढाई बरस के कार्यकाल में सब देख-समझ गया हूँ। लेकिन सोचकर देखो तो ग़लती उसकी भी नहीं है। उसे क्या मालूम तुम्हारा कौन-सा ब्लाउज़ रंग छोड़ता है!”

“मैंने उससे साफ़ करने को कहा ही नहीं था?” सुनीता ने सफ़ाई दी।

“भाषा की दिक़्क़त के कारण तुम्हारी बात ठीक से समझ नहीं पाई होगी। तुम जल्दी-जल्दी में कहकर निकल गई थी।”

“आप ठीक कह रहे हैं। वह समझी नहीं होगी।”

हव्वा समय से पहले आ गई। प्रभास जी से भी माफ़ी माँगी और सुनीता से भी कि ब्लाउज़ का रंग पोलो पर चढ़ गया था। उसने ब्लीच से चढ़ा रंग निकाला तो असली रंग भी उतर गया। कल डर के मारे घबराहट में झूठ बोल गई थी। उसे झूठ नहीं बोलना चाहिए था। कृपया वे दोनों उसे माफ़ कर दें। 

वह हाथ जोड़े, सिर झुकाए घुटनों पर बैठी है। झर-झर आँसू गिर रहे हैं!

“देखो, कैसे रो रही है। जो बिगड़ गया, बिगड़ गया। मिट्टी डालो और आगे बढ़ो।” प्रभास जी यह कहकर दफ़्तर निकल गए।

सुनीता का मन पूरी तरह साफ़ नहीं हुआ था। अपने ग़ुस्से को दबाकर उसने उसे चुपचाप काम शुरू करने को कहा।

लगभग हफ़्ते भर तनाव परकाया-सा बैठा रहा उन दोनों के बीच। हव्वा नियमतः आती है, समय से अपना काम निबटाते हुए हमेशा की तरह हँसकर ‘क्वाहेरी’ (विदा) कहती है। सुनीता चेहरे पर सख़्ती ढाले चुपचाप दरवाज़ा बंद कर लेती है।

हव्वा को सुनीता का बर्ताव ठीक नहीं लगता। उसने माफ़ी माँगी, रोई-धोई, तब भी कोई व्यक्ति इतना तंगदिल कैसे हो सकता है? कहती है, महँगी थी। हव्वा को कैसे मालूम हो कि महँगी है या सस्ती? सखियों के साथ बैठी हँसी-ठिठोली करती है, लेकिन मन के भीतरी कोटर में विचारों का द्वंद्व अनवरत है। चेहरे पर कुछ भी नुमायाँ नहीं। वह किसी को कुछ नहीं बताना चाहती, कुछ साझा नहीं करना चाहती। शबानी ने कहा है कि एक चुप सौ मर्ज़ की दवा है!

वह अचानक पूछती है, “चीना का लुल उनकी तरह छोटा होता है क्या?” फिर ज़ोर का ठहाका मारती है। उसके साथ-साथ सब हँसने लगते हैं।

“और चीना लड़कियाँ जैसे चीन की दीवार!”

सुस्त पड़ती ठहाके की लहर ने फिर ज़ोर पकड़ लिया।

उस मसले के बाद दूसरे हफ़्ते में सुनीता हव्वा से मुस्कुराकर बात करने लगी है। तीसरे हफ़्ते में क़तई सामान्य माहौल—मानो कुछ हुआ ही न हो। न ब्लाउज़ ख़राब हुआ है, न पोलो। शाम की चाय पुनः हव्वा बनाने लगी है।

“भारत जाकर तुम्हारे हाथ की चाय बहुत याद आएगी...’ सुनीता पहली घूँट लेकर कहती है।

“यहीं रह जाओ...’ हव्वा ख़ुशामद से कहती है।

“लौटना ही है!”

“तुम्हें अच्छा नहीं लगा यहाँ?”

“अच्छा तो बहुत लगता है, लेकिन एक दिन सबको लौटना होता है। जैसे शाम को पंछी लौटते हैं।”

हव्वा को सुनीता की बात समझ नहीं आती। वह एकटक उसे देखती है।

“जा, तू घर जा। टाइम हो गया। बच्चे राह देखते होंगे!”

आज सुनीता सुबह से सोफ़े पर पसरी है, टीवी देख रही है। न फूल लाने भेजा, न नहाई है। शायद माह के वे चार दिन हैं।

“कौन-सी सब्ज़ी काटूँ लंच के लिए?” हव्वा पूछती है।

“आज लंच नहीं बनेगा। मैं बाहर जा रही हूँ। रात के लिए दाल-पालक और बैंगन का भरता बना दे। शाम तक मैं नहीं आई तो चाभी डोरमैट के नीचे डालकर चली जाना।” 

त्योहारों के बाद सुस्ती उतर आई है। फिर से दोपहर की रसमंजरी शुरू हो गई है। हव्वा सुनीता की हरे रंग की नंबर प्लेट वाली जाती हुई कार देखती है। शबानी को फ़ोन कर काम पर लग जाती है। एक बड़े चाक़ू को जलते चूल्हे पर छोड़, अपनी चाबी से सुनीता का कमरा खोलती है। सीधा मँझोला बैग खोलकर उससे छोटा बैग बाहर निकालती है। ताला तोड़ने की ज़हमत नहीं करती... गर्म चाकू से बैग काट देती है!

कमरा तालाबंद करते-करते उसकी नज़र ड्रेसिंग-टेबल पर सोने की चूड़ियों और झुमकों पर पड़ी। जल्दी में वह उन्हें वापस बैग में नहीं रख पाई थी। हव्वा ने वह भी उठा लिया। एक दराज़ में बड़े नोटों की एक गड्डी पड़ी थी, वह भी ले ली!

सुनीता ने ध्यान नहीं दिया था कि इन दिनों वह बड़ा-सा बैग लेकर आ रही थी। उसी भरे बैग को लेकर वह परिसर से बाहर निकल गई। बाओबाब के नीचे शबानी प्रतीक्षा में खड़ा था!

~

उसके घर के पते पर मालूम हुआ कि एक दिन वह काम से कभी वापस नहीं आई। उसका लुल्हा पति और तीन बच्चे उसकी राह देख रहे हैं!

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