होली खेलें रघुवीरा अवध में
अष्टभुजा शुक्ल
02 मार्च 2026
बसंत को लेकर अब तक इतना गाया-बजाया गया, इतना लिखा-पढ़ा गया, इतना ढोल-नगाड़ा-झाँझ पीटा गया, इतनी धुन-रागिनियाँ बनीं—फिर भी आज तक न तो कोई इससे ऊबा और न उकताया। ऐसा क्या है कि पपीहे और कोयल की एक ही रट भी पुनरुक्ति नहीं लगती। बल्कि लगता है कि हर कुहुक एक नई कुहुक है और लीजिए साहब, फिर इस ऋतु ने दस्तक दे दी है और होली आते-आते धमाल हो जाने की पूरी संभावना है। सरसों के फूलों का झुमकियाना, आमों का बौराना, मदनोत्सव का मनाना—सब कुछ लागे नया-नया! इस ऋतु के साथ गुनगुनाता मन-उपवन बाग़-बाग़ हो उठा है और फाग की कोई धुन भीतर ही भीतर बजने लगी है, लेकिन बाहर जो होली का, फगुआ का एकमात्र गाना कनफोड़ ढंग से सुनाई दे रहा है, वह है—‘होली खेलें रघुवीरा, अवध में...’। मेरी खुन्नस यह है कि चौताल, डेढ़ताल, तिताला, चैती, झूमर जैसी अनेक शास्त्रीय राग-रागिनियों के होते हुए—कोई उलारा कैसे फाग का ब्रांड एंबेसडर और सिरमौर बन बैठा! क्या अवधी, भोजपुरी, बघेली, बुंदेली, ब्रजी, बैसवाड़ी, छत्तीसगढ़ी के लोकगायकों और नायकों के ईसुरी, रंगपाल, कलाधर, शिवप्रसाद, द्विज छोटकुन जैसे रचयिता कहीं तेल लेने चले गए कि हमारे पास अब फाग का एकमात्र मुखड़ा—‘होली खेलें रघुवीरा...’ ही बचा रह गया। थोड़ा थिर होकर सोचने से अटकल मिलती है कि यह उलारा तो हर बोली में पहले से ही मौजूद रहा होगा, लेकिन जब 2003 में ‘बाग़बान’ फ़िल्म में यह गाया गया—तबसे इसी का भूत लोगों के सिर पर सवार है। कभी-कभी अतिलोकप्रियता भी असली लोक-संस्कृति के लिए घातक बन जाती है या बना दी जाती है और आजकल लोकसंस्कृति या तो विलोपित हो रही है या लोकभ्रष्ट।
विलोपन और भ्रष्टाचार के इस घनघोर दौर में मेरे जैसा अदना नागरिक सोचता है कि अवध में रघुवीर का राज है। उसमें वह चाहे जिससे और चाहे जिसकी होली खेलें। चाहे सोने की पिचकारी से खेलें, चाहे फ़ाइबर की; चाहे रामानुज सौमित्र के साथ खेलें, चाहे लछिमन के; चाहे अबीर-गुलाल से खेलें, चाहें और किसी से, लेकिन कृपया अपनी ही धुन को तो सबकी धुन न बना दें। अवध की मर्यादा में तो रहें। कम से कम देशाक्रांत तो न करें। सच पूछिए तो मेरी ही तरह आजकल हर कोई खुन्नस में है। राज्य की राज्य से खुन्नस है, बोली की बोली से खुन्नस है, भाषा की भाषा से, संस्कृति की संस्कृति से तो भयानक खुन्नस है। जबकि होली सब को बराबर कर देने का पर्व है। सारी उपाधियाँ उतारकर सहज बना देने का पर्व है। धूल, गोबर, चंदन और रंगों को गड्डमड्ड कर देने का पर्व है। एकाधिकार को तोड़ देने का त्योहार है। सबको अपने-अपने निगेटिव बना देने की चित्रशाला है। गानों के स्फुरण का कंठस्वर है। उलारा के एकाधिकार को चिंदी-चिंदी कर देने का दिन है।
‘होली खेलें रघुवीरा अवध में...’, गाने के इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए, अवध प्रांत वालों की मनमानी से तंग काशी प्रांत वालों ने रंग में भंग डालने की भीष्म-प्रतिज्ञा ही कर डाली और पर्व-संस्कृति को पूरी तरह बदल डालने के लिए संस्कृति से बदला लेने पर उतारू हो गए। उन्होंने गाने की काट गाने में और उलारा की काट उलारा से खोजने में अपनी सारी कल्पनाएँ ख़र्च कर डाली और आख़िर में जवाबी उलारा विकसित करके ही दम लिया—“खेलें मसाने में होरी, दिगंबर, खेलें...।“ खेल-खेल में खेला हो गया और काशी प्रांत वालों ने भी इस मधुमय पर्व को, अंततोगत्वा कंधा देकर, राम नाम सत्य करते हुए मणिकर्णिका पहुँचाकर ही दम लिया। गीतों की बल्कि लोकगीतों तक की भी होड़ और खुन्नस पर्वों और संस्कृतियों को कहाँ से कहाँ तक पहुँचा देते हैं!
यहाँ तक पहुँचकर होली के रंग में सराबोर और भंग में गदहाख़ोर एक आम-आम नागरिक नारों के शिल्प में गाए जा रहे इन जवाबी प्रतिस्पर्धा वाले उलारों को मर्यादा पुरुषोत्तम के ‘राम-राम’ और दिगंबर के ‘महादेव-महादेव’ के नशे में सोचता हुआ बड़बड़ाता है कि जब अवध प्रांत वालों से काशी प्रांत वालों को इतनी खीझ है तो ब्रज प्रांत वाले भला क्यों चुप बैठेंगे। उनकी भी कोई अपनी ढपली अपना राग और अपना कोई अलग उलारा होगा। होगा क्या है ही। आजु, बिरज में होरी रे रसिया...। यह लीजिए साहब। यहाँ तो पूरी रसिकता मौजूद है। होली का सच्चा रसायन तो यहीं छलक रहा है। यहाँ लठमार होली है। थोड़ी बहुत टूट-फूट संभव है, लेकिन बँटने-कटने की गुंजाइश कम है। अब आम नागरिक का ध्यान इस बात पर भी जाता है कि होली तो असल में ब्रज-बरसाने-मथुरा का ही पर्व है और रसिकता के बिना होली कैसी? रंग-रास नहीं, गंध-वास नहीं, उमंग-तरंग नहीं, बरज़ोरी-सराबोरी नहीं तो होली नहीं होला। पर्व नहीं खर्व।
अवध प्रांत वालों के राम-राम और काशी प्रांत वालों के महादेव-महादेव वाले अभिवादन या नारों-उलारों में न तो सीता की कहीं प्रतिभागिता है, न पार्वती की। इन उलारों में स्त्री सत्ता की संपूर्ण अनुपस्थिति है। फिर भी सब को सीता-सावित्री-पार्वती बनाने पर ज़ोर है। इनसे कुछ भले तो ब्रज प्रांत वाले ही दिखाई देते हैं—राधे-राधे तो करने लगे हैं। बिना स्त्री के भी कोई होली होली होती है! मर्यादा पुरुषोत्तम के राज में सीता भला चौखट लाँघकर होली के हुल्लड़ में कुदाई जा सकती हैं। और किस पार्वती का कलेजा होगा श्मशान में जाकर चिता-भस्म उड़ाने का। लेकिन ब्रज की होरी की बात और है। वहाँ राधा के बिना कान्हा आधा नहीं शून्य हैं। महाशून्य। छूछे। बेज़ार।
ऐसे बेज़ार का आलम यह है कि राधा रहित कृष्ण को अकेलापन काट खाने दौड़ता है। उन्हें अपनी पुरुषसत्ता—मर्दानगी—तक से ऊब होने लगती है और लोक का फाग उनको—मोहन धरे रूप जनाना—कम से कम वेशभूषा में तो स्त्री का स्वाँग बनाने को विकल कर ही देता है। राधा को छू लेने की स्पर्श कातरता उन्हें मनिहारान—चूड़ी पहनाने वाली नटी में बदल देती है। लेकिन स्वाँग कब तक छिपा रह सकता है? कोई लाख वेशभूषा बदल ले, कोटि अभिनय कर ले लेकिन हक़ीक़त निष्कवच होकर सामने आ ही जाती है। चूड़ी पहनाने की फितरत छूते ही उघड़ जाती है। भला गुड टच और बैड टच की विद्युत्तरंग किसे झटका नहीं देती। और राधा रानी का हाथ झटककर छुड़ा लेना किसी अपराध अभियोग का कारण नहीं बनता तो इसलिए कि वही बेज़ारी वही बेक़रारी उधर भी है। राधा के कृष्ण को राधा बन जाने और कृष्ण के राधा को कृष्ण बन जाने के अनेकों प्रस्ताव और उनके अनुमोदन के दस्तावेज़—व्यक्तित्वांतरण—के अनगिन उदाहरण संस्कृत साहित्य से लेकर लोक साहित्य तक बिखरे हुए हैं।
वास्तव में मनुष्य का जीवन एक स्वाँग से अधिक है भी क्या? जो अपनी थोथी मान-मर्यादा वश, किसी पद-प्रतिष्ठा या संहिता वश, किसी मीन-मेख वश, किसी काल-कुकाल वश यह भी नहीं कर पाते—वे लोग कितने लाचार और हत्भाग्य होते हैं! लेकिन जो वैज्ञानिक विस्फोट के इस आभासी (Virtual) काल में भी जीवन को वास्तविक मानकर इतराते रहते हैं, उनसे भले तो वे ही प्रतीत होते हैं जो किसी आत्मा के व्यामोह में जनम-जनम भटकने की बेभरम कल्पना में जीते जाते हैं। राम के अवध प्रांत में स्वाँग के लिए कोई स्पेस नहीं। वहाँ राम के सीता बन जाने या सीता के राम बन जाने का सपना भी वर्जित है। बल्कि ख़बरदार! मर्यादाओं का उल्लंघन है। जबकि राधे-श्याम के विग्रह में यह अपराध बार-बार दुहराया जाकर भी लोकस्वीकृत है।
संस्कृत को इन दिनों पूजा-पाठों और स्तवनों की सेवा में इतने हाहाकारी ढंग से लगा दिया गया है कि उसकी सारी रसिकता, सिकता-रस में डूबकर तेल लेने चली गई और लौटी भी तो चेतनाशून्य होकर ही। संस्कृत में राधा के माधव बन जाने और माधव के राधा के विग्रह में आ जाने के अनगिन उल्लेख हैं। एक श्लोक में तो राधा-कृष्ण का कलेवर अपनाते-अपनाते—गुंजा की माला पहनते-पहनते ‘मालिनी छंद’ में परिघटित हो जाती हैं और उसका लक्षण उदाहरण तक बन जाती हैं—धृत मधुरिपु लीला मालिनी पातु राधा। बाक़ी सब कुछ तो रसखान वाला मामला ही है। यानी कस्तूरी का लेपन, पीतांबरा, जूड़ों में मोर पंख, बाँके कंधों पर राजती और माधव के अधरों से जूठी बाँसुरी बजाती हुईं। गाने बजाने के इन दिनों में गाल बजाने वालों का हल्ला-गुल्ला कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है। राग-अनुराग विहाग-विराग में बदलते जा रहे हैं। राधा के कृष्ण बन जाने के अनेक दृष्टांत सामने आ चुके हैं, लेकिन कृष्ण के राधा बन जाने का कोई नमूना अभी तक सामने नहीं आ सका। तो क्या लोकविद् झुट्ठे हैं? कदापि नहीं। लोक किसी कोविद से रत्ती भर कम नहीं। इधर होली में प्रस्ताव राधा की ओर से ही है—तुम राधे बनो श्याम, हम नंदलाला...। अगर तुमने इस प्रस्ताव को नकार दिया तो यह प्रहसन आज से बंद।
साहित्य के शिष्टाचार वाले जानते हैं कि रसखान की राधा सारे मान को ताक पर रखकर कृष्ण के ऊटपटाँग प्रस्ताव को भी बिना किसी मान-मनौव्वल के मान जाती हैं। यानी कान्हा का कलेवर अपनाने में कोई झिझक नहीं दिखातीं। मोरपंख माथे पर खोंस लेना मंजूर तो मंजूर। गुंज की माला भी गले में डाल लेने में कोई हर्ज नहीं। चलो पीतांबर भी जैसे-तैसे लपेट लेते हैं। मधुवन में ग्वालबालों और गोयूथ के साथ सुबह से शाम तक भटकना भी अंगीकार है। सारे नाटक कर लूँगी, लेकिन बस मुरली को अधरों से छुआने में घनघोर आपत्ति है। वह तो तुम्हारे ही होठों से जूठी हो चुकी है। न बाबा न और बस न तो न। और न-न का नख़रा कब हाँ में बदल जाता है, स्वाँग भी कब प्रणय-कलह में घटित हो जाए! राधे राधे! और रसिक जनों को पद्माकर के हो हुल्लड़ वाली होली भला कैसे भूल सकती है। अगली होली में छैलबिहारी को गैलबिहारी बनाकर न छोड़ा तो ब्रज-बरसाना नहीं, पक्का कुरुक्षेत्र! अब बरज़ोरी के दिन लद गए लाला। उलाहने बहुत हो चुके। कम से कम इस फाग की पिंहिंक से तो यही ध्वनि निकलती है—ठानत मोसे रार, छैल बरजो नहिं मानत। जो वर्जना की सर्जना को भी नहीं समझते, साहित्य में निहित संकेत स्थानों को नहीं बूझते, ऐसे लाल बुझक्कड़ों के लिए पर्वों की लोकतांत्रिकता काफ़ी दूर की कौड़ी है।
होली का पर्व सर्वाधिक स्वतंत्रता का पर्व है। कहिए पूरी छूट का पर्व है और होली में यह छूट इतनी आकर्षक होती है कि उसके नाम पर लूट की आशंकाएँ बढ़ जाती हैं। ज़ोर ज़बरदस्ती के हौसले बढ़ जाते हैं। इसलिए अनेक फागों में ‘बरज़ोरी’ की प्राथमिकी, कभी रिरियाते हुए तो कभी पूरे अमर्ष के साथ लिखाई गई दिखाती देती है—कान्हा करे बरजोरी ए म इया/ कान्हा करे बरजोरी/ कतनो करी हथजोरी ए मैय्या...। लेकिन जो करबद्ध अनुनय-विनय से भी नहीं मानते, अपशब्दों और गाली-गलौज तक उतर जाने की असभ्यता से उद्दंड हो चुके हैं, जो सबको ‘साली’ मान लेने पर उतारू हैं, वैसों को और उस तरह के फाग की रंगत को लोककवि रंगपाल कुछ इस तरह व्यंजित करते हैं—बरजोरी होरी में खेलत हैं, नोखे कै यनहीं खेलाड़ी/ हम हैं नहीं साली तुम्हारी, छैल पिचकारी/ रँग भरि मारी.../ रंगपाल जौ बिगरे बोल तो/ यक की दस देवैंगे गारी/ छैल पिचकारी/ रँग भरि मारी...। यानी यदि मुँह से जद्द-बद्द निकाले, गाली गलौज पर उतरे तो एक का दस सुनने को तैयार रहना। होरी में बरज़ोरी से रसिकों के लिए जितना भी शृंगार-रस टपकता हो, लेकिन निष्ठुर बल्कि क्रूरकर्मियों के लिए तो ख़ून की होली ही असली होली है। वे रंग की जगह सब कुछ रक्तरंजित देखकर ही निहाल होते हैं। होलिका को जलाकर ही भक्त प्रह्लाद को बचाने के अभियान में जुते रहते हैं। यह नृसिंहावतार, कृष्णावतार या रामावतार में ही नहीं, हमारे समय के अजैविक अवतारों की भी फ़ितरत है। ईश्वरोपम बन जाने और भक्तों की सेना तैयार करने के अभियान जारी हैं। शायद किसी इतिहास में लिखा है कि अंतिम बादशाह मोहम्मद शाह रँगीले को भी होली में ‘कन्हैया’ बनने का बड़ा शौक़ था। बादशाह तो बादशाह ठहरे! हमारे समय के कई संतों-बाबाओं को भी कान्हा बनने का प्रेत सवार रहा है। सुनता हूँ कि वे केवल बनते ही नहीं रहे, बल्कि होली में एक आषाढ़ जितना पानी और कज्जलगिरि जितना रंग बहाकर और गोपियों को सराबोर करके ही दम लेते। लाइव करते और सब्सक्राइब होते।
हम बस्ती के बंदे चाहे जितनी कील-काँटी निकालें लेकिन वास्तविकता यह है कि हम अपनी बोली-बानी तक में खाँटी नहीं। न खाँटी अवधी, न भोजपुरी। ब्रज-बैसवाड़ी तो हमसे योजनों दूर है। यानी हमारी बोली में भी एक संकरता है। लोग अक्सर पूछते हैं कि आपकी बोली अवधी है या भोजपुरी? दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें! तो खुलकर कहता हूँ कि भाई हम किसी में नहीं हैं और कहीं के नहीं हैं। अवधी भोजपुरी के संकर हैं—‘काँटा लागे न कंकर कि प्याला तेरे नाम का पिया’। वैसे तो हम बस्ती वाले जिन गणों-जनपदों से घिरे हैं—वे हैं अयोध्या, सिद्धार्थ नगर, संत कबीर नगर, अंबेडकर नगर, आदि के बावजूद धर्म-जाति की इतनी खिचड़ी पक-पका रहे हैं कि सारा गुड़ गोबर हो जाने तक। होली का पूआ-गुलगुला, रंग-अबीर, गुलाल जाए भाड़ में। और फगुआ, लोकगीत, लोक-संस्कार जाए यूट्यूब में।
लाइक और सब्सक्राइब के इसरार-मनुहार के इन दिनों में हर कोई चैनल खोल के बैठा है। कान लगाए या आँख गड़ाए। दृश्य और श्रव्य के इस धुँआधार में वाक् को जैसे लकवा मार गया है। कुछ समय पहले तक हर कोई कुछ न कुछ गाता गुनगुनाता था। सभा गायक न सही गली गायक तो हर कोई था। मुखड़ा न सही टुकड़ा ही सही। और किसी पर्व तक आते-आते यह गुनगुनाना किसी सामूहिक कंठ गान में निनादित होने लगता था। गाँव-गाँव, गली-गली, क़स्बे-क़स्बे, बस्ती-बस्ती से ढोल, झाँझ, नगाड़े—बसंत की आहट से ही बौराने लगते, कंठ-कंठ स्वरलहरियों से गूँजने लगते, स्त्री-पुरुषों के जवाबी फगुआ से कोल्हार के कड़ाह के गुड़ और चूल्हों पर चढ़ी दाल भले जट्ठाहिन होने लगती। रस थोड़े विरस हो जाते तो भी कोई गतागम नहीं, राग थोड़े विराग-विहाग में बदल जाते तो भी शास्त्रीयताओं की बहुत चिंता नहीं। कम से कम लोक तो आबाद था।
आज लोक को इहलोक से सीधे परलोक की ओर ढकेल दिया गया है। वर्तमान के रौरव से बेख़बर हर कोई हाऊ-हाऊ आगम बनाने की चिंता में चूर है। जबकि बसंत है कि समय आने पर मानता ही नहीं। ऊपर से यहाँ का बसंत ‘बसंत का बज्रनाद’ भी नहीं बनना चाहता। पपीहा है कि चुप नहीं रहता। कोयल कुहुक नहीं बंद करना चाहती। पेड़ फुनगियाना नहीं छोड़ते। लोग स्वाँग करना नहीं छोड़ते। और होली है कि हर फ़ेस को उसका निगेटिव बना देना चाहती है। धूल-धक्कड़ से, भस्म-राख से, अबीर-गुलाल से, रंग-भंग से। होली का मतलब ही है समावेशन। सारी व्यक्तिगत और सामाजिक पहचानों का, थोथी उपाधियों और बँटवारों की विलीनता। हर गुनगुनाहट का सामूहिक कंठस्वर में बदल जाना। सबको गले लगाना। ‘ऋतूनां कुसुमाकर:’ का भी राधा का स्वाँग कर लेने में न हिचकना। इस होली में मुझे हिचकी आ रही है, गोया किसी को मेरी सुधि आ रही है। इसलिए हिचकी को अब गान में बदल देना है। गान सुर में हो या बेसुरा। शास्त्रीय हो या उलारा। अब भाई अवध में जन्मा हूँ तो भागकर कहाँ जाऊँगा। मगहर वाले का चाहे कबीरा ही गाऊँगा। या लोक जीवन के कंठहार महाकवि रंगपाल का कोई फाग-चौताल-तिताला—
ऋतुपति गयो आय, हाय गुंजन गुंजन लागे भँवरा...
भयो पपिहा यह वैरी, नहिं नेकु चुपाय;
लेन चहत विरहिन कै जियरा,
पिय पिय शोर मचाय। हाय गुंजन...
अजहुँ आवत नहिं द इया, मधुबन रहे छाय
रंगपाल निरमोही बालम,
दीन्हीं सुधि बिसराय,
हाय गुंजन लागे भँवरा...
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