हिंदुस्तानी ज़ुबानों के मरकज़, भारतीय भाषा केंद्र जेएनयू के 50 साल
योगेंद्र प्रताप सिंह
31 मार्च 2026
जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है...
वाऽऽह! किसका है?
आपका?...
‘अरे महाराज, आप भी!’
‘कितना मशहूर है...!!!’
चढ़ते दिन के साथ पछुआ का बढ़ता आवेग, झड़ते पत्ते, झूमते पेड़, डोलती पत्तियाँ, लहलहाती क्यारियाँ, बसंत की दस्तक, फगुनाहट अपने शबाब पर और हिंदुस्तानी ज़ुबानों का मरकज़, भारतीय भाषा केंद्र [Centre Of Indian Language—CIL] जेएनयू 12-14 फ़रवरी तक अपनी स्थापना का 50 साला जश्न ‘लफ़्ज़ों से बनती दुनिया’ मना रहा था।
दो दिन पहले से ही लग रहे सतरंगी शामियाने के साथ जैसे ही तेज़ हवाएँ बेवफ़ाई पर अमादा होतीं, समूचे शामियाने की चटकदार पट्टियाँ ऐसे ऊपर-नीचे होतीं, मानो बंगाल की खाड़ी में तमाम सफ़री मछलियाँ एकमुश्त गोते लगा गई हों, गोया एक मौज उठी और तमाम लहरें आवारा हो गई हों, गोया ख़ामोश पानी में किसी ने एक भारी पत्थर फेंक दिया हो। हमारे तमाम पोस्टर-बैनर उखड़ने लगते और इधर हमारी पोस्टर-बैनर समिति पुनः सक्रिय हो जाती।
मुझे जेएनयू आए हुए तक़रीबन एक अदद साल बीत चुका है। मैं अपनी पुरानी सरज़मीं के तमाम आयोजनों को बहुत मिस करता था, वह ये कि यहाँ व्यक्ति विशेष के कार्यक्रम क्यों होते हैं, विभाग या स्कूल के क्यों नहीं? आज मैं बहुत दिनों बाद वह सुख महसूस कर रहा हूँ और बड़े गर्व के साथ कह सकता हूँ कि भारतीय भाषा केंद्र [CIL] का एक यादगार, भव्य और ऐतिहासिक आयोजन समूची कामयाबी के साथ संपन्न हुआ।
इस समूचे आयोजन की रूह-ए-रवाँ हमारे केंद्र की अध्यक्षा प्रोफ़ेसर बंदना झा की चिंतना-मंत्रणा, जिनके लिए मुझे तीसरे और अंतिम दिन ‘प्रेम, परिसर और साहित्य’ पर मंसूब सत्र में अल्लामा इक़बाल बरबस याद आए—
हुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगा
लहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगा
…
पिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों को
जो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगा
तमाम अवरोधों, तमाम व्यवधानों के बीच उनके भगीरथ यत्न-प्रयत्न, उनकी हिम्मत और उनका धैर्य वाक़ई में प्रणम्य है। लोगों का आना-जाना लगा रहता है और जाना तो सबको है एक दिन, जब सब कुछ ‘अस्थाई’ ही है, आप बस अपने काम से याद किए जाते हैं, यह मुजस्समा तारीख़ी था, यह आयोजन ऐतिहासिक था।
इसके साथ-साथ गंगा सहाय मीणा की योजना, अपनी समूची अस्वस्थता के बावजूद उनकी जीवटता और लगन इस समूचे आयोजन में हम तमाम साथियों को ऊर्जा से भरती रही। समूची आयोजन समिति जिसमें शिक्षक, विद्यार्थी, शोधार्थी और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के साथ ही जेएनयू परिवार के अंदर और बाहर के वह तमाम अज़ीज़म साथी तह-ए-दिल से शुक्रिया और मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं, जो हमारे कार्यक्रम को कामयाब बनाने के लिए किसी भी तौर पर जी-जान से लगे रहे।
इस पूरे कार्यक्रम को अमलीजामा पहनाने में हमारे तमाम साथी वालिंटियर्स दौड़ते-भागते-हाँफते पिछले एक हफ़्ते से तो युद्धस्तर पर लगे थे। उनकी आँखों में रतजगे और नींद का ख़ुमार साफ़ देखा जा सकता था, लेकिन इस आयोजन को मंज़िल-ए-मक़्सूद तक पहुँचाने का जुनून इन तमाम दुश्वारियों को हर मोर्चे पर परास्त करता रहा।
आयोजन की तमाम चटक रंगीनियों को भोर का सूरज इस तरह द्विगुणित करता कि बाबा तुलसी बारहा याद आ जाते—
पुर सोभा कछु बरनि न जाई...
अपनी समूची धज में कन्वेंशन सेंटर अपने छूटे और बिछड़े हुओं को इस मलाल के साथ सालता रहा—
उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ‘ग़ालिब’
हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है...
या किसी भी तरह से इस उत्सव में शरीक न हो पा सकने वालों को ‘चचा’ इस हवाले से ज़रूर याद आते रहे होंगे।
थोड़ी हड़बड़ाहट, थोड़ी गड़बड़ाहट, थोड़ी आपाधापी, लेकिन बहुत ज़्यादा काम, बहुत सारी मुहब्बतें और बहुत बड़ी कामयाबी। तमाम सत्र, तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रम, देश-विदेश और दुनिया जहान की तमाम बातें होती गईं। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, सत्र पे सत्र होते चले गए और एक-दो-तीन दिन कब बीत गए, अब सोचने बैठिए तो आँखें भर आती हैं।
यह जश्न उन यादों का था है, जिन्हें हम जैसे कितनों ने ही जिया है। यह जश्न अपने अतीत को स्मरण करने का था। यह जश्न भूले हुओं को याद करने का था। यह जश्न छूटे हुओं को पा सकने का था। यह जश्न रूठे हुओं को मना सकने का था। यह जश्न टूटे हुओं को हँसा सकने का था। यह जश्न बिछड़े हुओं को मिला सकने का था। यह जश्न पढ़ने-लिखने से लेकर हँसने-रोने, खोने-पाने, मिलने-बिछड़ने, रूठने-मनाने, लड़ने-झगड़ने जैसी उन तमाम न भूल सकने वाली क्रियाओं का था, जिन्हें हम घर से दूर अपने दोस्त-यार, प्रोफ़ेसर्स आदि के साथ विश्वविद्यालयों और अदबी इदारों में जीते हैं। व्योमेश शुक्ल के निर्देशन में ‘राम की शक्ति पूजा’ के नाट्य मंचन के साथ आरंभ हुआ यह आयोजन, हमारे मरकज़ की बुनियाद प्रोफ़ेसर एस. आर. क़िदवई की शफ़क़तों के तले मार्को जौली से होता हुआ, प्रकाश झा जी द्वारा निर्देशित ‘जनकनंदिनी’ के नाट्य मंचन, मालविका के गायन-वादन, नृत्य, कवि सम्मेलन-मुशायरा, उर्दू अकादमी दिल्ली की जानिब से उस्ताद अरशद अदनान क़ुतबी एंड ग्रुप की क़व्वाली, शंभूनाथ सरकार की बाउल गीत की तमाम अविस्मरणीय प्रस्तुतियों और हमारे केंद्र के वैश्विक प्रसार पर चर्चा के साथ-साथ सुप्रसिद्ध भाषाविद् पद्मश्री जी.एन. देवी द्वारा समापन सत्र में हमारी लुप्त होती मातृभाषाओं पर ज़ाहिर की गई चिंता, ग़रज़ कि इन तीन दिनों का यह उत्सव सिर्फ़ उत्सव नहीं था, यह हमारे अतीत, वर्तमान और मुस्तक़बिल का रोज़नामचा भी था।
अतिथियों की स्वागत समिति की ज़िम्मेदारी मिलने के चलते कुछ एक कारणों से बेतकल्लुफ़ नहीं रह पाया, एक डर था कि कोई जौन एलिया की याद दिला सकता है—
मिल कर तपाक से न हमें कीजिए उदास
ख़ातिर न कीजिए कभी हम भी यहाँ के थे
लेकिन इसके बाद भी रस्मन हमने कोई भी कोताही नहीं होने दी।
मंच से लेकर बाहर तक हमारे उस्तादों से लेकर हम तमाम साथी वालिंटियर्स जैसे भी बन सका, हर तरह से स्वागत और सत्कार में लगे रहे। मसलन कि दिल से, तह-ए-दिल से, खुले दिल से। हार से, प्यार से, दुलार से, मनुहार से। मालों से, शालों से, दुशालों से। भावों से, भावनाओं से, भंगिमाओं से। जो जहाँ, जैसे मिल गया, जिस तौर पर भी हो सका मेहमाननवाज़ी में लगे रहे।
प्रोफ़ेसर एस. आर. क़िदवई, प्रोफ़ेसर चमन लाल, प्रोफ़ेसर रणजीत साहा, प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रोफ़ेसर रामबक्श जाट, प्रोफ़ेसर अनवर पाशा जैसे तमाम दादा उस्तादों को सुनकर ये अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि जेएनयू कैसे बना था, किस लिए बना था और क्यों बना रहना चाहिए!
पढ़ने वाला जेएनयू, लड़ने वाला जेएनयू, भिड़ने वाला जेएनयू, अँटने वाला जेएनयू, डटने वाला जेएनयू। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ वाला जेएनयू, ‘बाज़ू-ए-क़ातिल’ का दम देखने को ललकारता जेएनयू, ‘शौक़-ए-शहादत’ वाला जेएनयू। तमाम बाज़ू और सर लेकर आगे बढ़ने वाला जेएनयू। इंक़लाब वाला जेएनयू, मशालों वाला जेएनयू, बारूदों के ढेर पर खड़ी दुनिया के लिए ‘पैग़ाम-ए-मोहब्बत’ वाला जेएनयू। ‘इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू’ वाला जेएनयू, ‘सारे जहाँ का दर्द’ अपने जिगर में लिए घूमता जेएनयू, महबूब के आंचल में सिर रखकर रात की शोख़ियाँ निहारता जेएनयू। ढाबों वाला जेएनयू, बहसों वाला जेएनयू, चाय की चुस्कियों पर दुनिया भर की सियासत को रक़्स कराता जेएनयू। दोस्तों, यारों सहपाठियों से रात-रात भर बहसें, लड़ाई-झगड़े करता जेएनयू। किसी तानाशाह की आँखों में आँखें डालकर कहता जेएनयू कि ‘नोबेल के लिए पागलपंथी की नहीं परिश्रम की ज़रूरत होती है। दिल जीतने के लिए हवस नहीं प्यार चाहिए, प्यार।’
जेएनयू हम जैसों का ख़्वाब है। हम जैसों की आवाज़ है। जेएनयू ने कितने ही लोगों को बनाया है जो आज देश और दुनिया में छाए हुए हैं। जेएनयू मोहब्बत का नाम है, जेएनयू ख़ुशबू का नाम है। जेएनयू फूलों का नाम है। जेएनयू रंगत का नाम है। जेएनयू नदियों का नाम है। जेएनयू पहाड़ों का नाम है। जेएनयू न कह सकने का नाम है। जेएनयू ख़ूबसूरती का नाम है। जेएनयू पैग़ाम-ए-मोहब्बत है, मरकज़-ए-जम्हूरियत है, इदारा-ए-ख़ुसूसियत है।
हमने फूल, शूल, धूल, बबूल पर बात की। हमने पतझड़, बसंत, बहार, उजाड़, तामीर, तख़्लीक़ पर बात की। हमने नदी, नाव, पानी, पर्वत, धरती और आसमान की बात की। हमने गाँव-गिराँव, शहर, ‘देस’ और दुनियादारी की बात की। हमने वीसी, प्रोफ़ेसर, डीन, वार्डेन, गर्लफ़्रेंड, ब्वायफ़्रेंड, शरीक-ए-हयात, शरीक-ए-सफ़र और आंदोलनों की बात की। हमने इनके अनेक रोचक क़िस्सों और संस्मरणों पर बात की। हमने लाचारी, बेकारी, मक्कारी, विसंगतियों, विषमताओं और चुनौतियों पर बात की। हमने जोड़ने की बात की, मुहब्बत की बात की। हमने निर्माण की बात की, तरक़्क़ी की बात की।
समापन सत्र में प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश सिंह एक क़िस्सा सुना रहे थे, जिसमें वह बताते हैं कि हमारे भारतीय भाषा केंद्र का कल्चर है कि स्कॉलर सिर्फ़ अपने गाईड तक सीमित नहीं रहते। उन्हें किसी विषय को लेकर अन्य प्रोफ़ेसर्स से भी बात करने की सलाह दी जाती है। इसी सिलसिले में वह बग़ैर नाम लिए बता रहे थे कि मैनेजर पांडेय ने अपने एक शोधार्थी को नामवर सिंह से सिनाप्सिस दिखाने के लिए कहा था। लाइब्रेरी के पास पैदल आते हुए, नामवर सिंह को जब वह शोधार्थी अपनी सिनाप्सिस दिखाने लगे तो उन्होंने सहज ही कहा—
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही
और एक समवेत ठहाका पूरे ऑडिटोरियम में गूँज उठता है। ऐसे कितने ही क़िस्से सुने गए। प्रोफ़ेसर चमन लाल अपने समय के क़िस्से और संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि ऐसा लोकतांत्रिक माहौल हमने देखा है कि हमारे समय कुलपति वाई. के. अलग विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ ख़ुद आंदोलन में बैठ जाते थे। वह अनावश्यक कार्यवाही में यक़ीन नहीं रखते थे। ऐसे लोगों की जेएनयू के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। चमन लाल जेएनयू के पहले वीसी जी. पार्था सारथी साहब को बड़ी शिद्दत से याद कर रहे थे। जेएनयू की निर्मिति में ऐसे लोगों का अवदान अविस्मरणीय है।
प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जेएनयू के बनने को लेकर संसद की बहसों और कार्यवाहियों की याद दिलाते हैं और उसे पढ़ने की सलाह भी देते हैं। इसके साथ ही वह अपने किसी पुराने विद्यार्थी के टर्म या सेमिनार पेपर का हवाला देते हुए बता रहे थे कि, ‘एक बार एक विद्यार्थी ने मेरी किताब से उद्धरण देते हुए अपनी बात रखी, उन्होंने कहा कि जब मैंने उस विद्यार्थी से कहा कि मैं अब इससे असहमत हूँ, तब उस विद्यार्थी ने बिना किसी झिझक के प्रतिवाद करते हुए कहा कि सर, ‘आपने अपनी किताब में ये लिखा है, उस समय आप सही थे, अब आप ग़लत हैं।’ ग़ौरतलब है कि पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने वक्तव्य के दौरान जेएनयूएसयू ऑफ़िस बियरर्स के निष्कासन का भी मुद्दा उठाया। जेएनयू यही साहस सिखाता है।
इस आयोजन की कामयाबी की एक बड़ी ज़मानत हम सभी साथियों पर हमारे आयोजक प्रोफ़ेसर्स का अटूट भरोसा था। तमाम व्यस्तताओं में भी हम सभी साथी बंदना मैम से लेकर गंगा सर तक बार-बार फ़ोन से लेकर सामने से छोटी-छोटी बातों पर डिस्कस करते। वह उतनी ही शिद्दत के साथ बात करते, कहीं कोई भी औपचारिकता नहीं। रामचंद्र सर अपनी तमाम व्यस्तताओं के बाद भी हम लोगों के साथ बराबर संपर्क में रहे। कार्यक्रम की तैयारियों से लेकर कार्यक्रम के दौरान और समाप्ति तक मलख़ान सर SL और SIS2 के गलियारों और कन्वेंशन सेंटर तक कई बार सारी जानकारियाँ लेते और कहीं कोई कमी लगती तो बता देते। उद्घाटन वाले दिन की पूर्व वाली रात्रि में मृण्मय सर तक़रीबन आधी रात हम लोगों के साथ हौसला-अफज़ाई में हमारे साथियों द्वारा बनाए गए रचनात्मक पोस्टर बैनर बड़ी शिद्दत से निहार रहे थे, वह उनकी तस्वीर लेते और स्टेटस पर पोस्ट कर देते। हम तमाम साथी उनसे हँसी-ठिठौली में मशग़ूल अपनी तैयारियों को अंजाम दे रहे थे। देर रात तक काम में लगे हमारे साथियों के खाने-पीने की पूरी सुध बंदना मैम रखतीं, हम लोगों के पास वह रात डेढ़-दो बजे चाय और बिट्टू भैया के समोसे भेज रही थीं। मैंने अपने सहपाठी मित्र जुंजार के गले में आधी रात को जब मैम की शॉल देखी तो उसने बताया कि मैम ने दिया है ताकि बाइक पर ठंडी न लगे। देवीलाल सर हमारी हर मीटिंग में मौजूद थे, मंच से लेकर बाहर तक कहीं कोई कमी दिखती तो कई बार वह स्वयं तो कई बार किसी साथी को इशारा कर देते।
इस आयोजन के लिए सुदूर त्रिपुरा से अजीत भैया का आ जाना और इसके साथ-साथ तीसरे एवं अंतिम दिन भोजनावकाश के ठीक पहले ‘प्रेम, परिसर और साहित्य’ पर मंसूब सत्र के संयोजन की मिली स्थानापन्न अकस्मात ज़िम्मेदारी के निर्वहन के दौरान जब ख़्वाजा इकरामुद्दीन सर ने मुझसे मंच पर कहा कि, ‘घबराना नहीं है, हम सामने ही बैठे हैं’ तो लगा कि अब इस कार्यक्रम को कामयाब होने से दुनिया की कोई भी ताक़त नहीं रोक सकती।
बारूदों के ढेर पर खड़ी दुनिया, मुझे लगता है कि प्रेम की हवाले से, साहित्य के हवाले से, अदब के हवाले से, गीतों-कविताओं और किताबों के हवाले से ही कोई सूरत निकल सकती है, जिससे इस रक्तरंजित दुनिया को विध्वंस के मुहाने से निकालकर कुछ सुंदर बनाया जा सकता है। मासूम बच्चों की लाशों की बुनियाद पर अपने साम्राज्य-विस्तार के मंसूबे पाले बैठे सनकी तानाशाहों को ख़ुदा करे किसी से मुहब्बत हो जाए। आख़िर इन कच्ची उम्रों में बचपन की मासूम शरारतों और लल्ला-लोरी के बरअक्स हमारी दुनिया ने इन मासूमों को गोला-बारूद और विध्वंस में झोंक रखा है। बिना किसी लाग-लपेट, इंसानियत के क़त्ल का हर वह शख़्स ज़िम्मेदार है, जो यह सब देखकर भी ‘तटस्थ’ है।
लेकिन जेएनयू तटस्थ नहीं है। कार्यक्रम के अंतिम दिन समापन-सत्र के ठीक पहले के सत्र में हमने प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल और उनकी शरीक-ए-हयात सुमन केशरी से जेएनयू के ‘प्रेम-परिसर और साहित्य’ पर बात की। अपने बचपन से लेकर अब तक के जेएनयू पर उन्होंने बड़ी लज़ीज़ बातें और सुनहरी यादें साझा कीं। इस सत्र का उद्देश्य समूची दुनिया को यह पैग़ाम देना था कि—
ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है
इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है
जेएनयू हमेशा से उस्ताद शायर चरण सिंह बशर के इस शेर को बाबुलंद आवाज़ में दोहराता रहा है।
बक़ौल सबा अफ़गानी बीते तीन दिन दौरान-ए-जश्न यही ‘मुस्तक़िल दौर पर दौर चलता’ रहा। इस कार्यक्रम की शिरकत के लिए आए तमाम मेहमानान ‘सदा रहेउ पुर आवत जाता’ के भाव से भारी मन से विदा ले रहे थे। कार्यक्रम के दूसरे दिन मालविका के गायन और अरशद अदनान के ‘छाप तिलक सब छीन्यौ रे’ पे अपनी सुध-बुध भूल मस्त झूमता CIL अपने आयोजन की अप्रत्याशित सफलताओं पर आख़िरी दिन होली के कई रोज़ पहले ही अबीर-गुलाल खेल चुका था। फागुन की पूर्णमासी पर बोगेनवेलिया के उजास में तो समूचा जेएनयू होली के रंगों में सराबोर हो जाता है।
पंद्रह फ़रवरी की शाम बराक हॉस्टल से बाहर निकलते ही, अपने ‘रथ’ से लोहित की तरफ़ से सहपाठी मित्र विक्की अपनी स्वाभाविक अल्हड़ मुस्कुराहट के साथ किसी शेर का मिसरा-ए-सानी पढ़ते हुए धकधकाते चले आ रहे थे कि—
जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है...!
मैं क्लिक नहीं कर सका, मेरे अंदर से वाह निकली और मैंने पूछा कि आपका है? बोले महाराज, इतना मशहूर शेर है, फ़िलहाल शायर का नाम कौन खोजता, हम दोनों थोड़ी देर ठिठके, मैंने कहा लगाइए इसको। आगे बढ़ने वाले ही थे कि विक्की कहीं से हलवा लेकर आए थे। उन्होंने पूछा, हलवा खाइएगा? हलवा खाया तो नहीं, लेकिन इस बाबत ‘ख़ुलूस का हलवा’ वाले ख़ालिद हुसैन ज़रूर याद आए। ‘ख़ुलूस के हलवा’ की मिस्ट्री CIL50 वाले जानते हैं।
फ़िलहाल मित्र धनंजय के साथ सीधे कन्वेंशन सेंटर गया, हम दोनों बड़ी देर तक खड़े होकर वहाँ जाने क्या निहारते रहे। मुईन शादाब का शेर जश्न के बाद के सन्नाटे को चीख़-चीख़कर बयान कर रहा था—
उस से मिलने की ख़ुशी ब’अद में दुख देती है
जश्न के ब’अद का सन्नाटा बहुत खलता है
अभी के लिए इतना ही। यह सच मेरे हिस्से का था, अपने सच का अभी चौथाई भी नहीं लिख पाया हूँ, हमारे अन्य साथी भी जब अपने हिस्से का लिखेंगे तो भरोसा दिलाता हूँ कि आपको फ़िराक़ गोरखपुरी याद आएँगे—
क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया
फ़िलहाल मुझे तो बशीर बद्र याद आना चाहते हैं—
चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
…
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
जेएनयू ज़िंदाबाद, मोहब्बत ज़िंदाबाद...
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