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ज्ञानेंद्रपति को पढ़ना : चीज़ों की बनी-बनाई शक्ल पर संदेह करना

मुझे चेतना पारीक याद रहती हैं। कैसी सहज उभरी शिष्टता में उनके लिए आदरसूचक ‘हैं’ लिख रहा हूँ। वह अलहदा और उतने ही मख़्सूस कवि ज्ञानेंद्रपति की चेतना पारीक हैं। जितना उन्हें जान पाता हूँ, वह कोई दूर खड़ी, स्मृति में धुँधली हुईं नायिका नहीं हैं। वह अब भी साफ़-शफ़्फ़ाफ़ दिखाई देती हैं—लाइब्रेरी के चक्कर लगाती हुईं, नाटक में भाग लेती हुईं, गीत गातीं, चित्र बनातीं, बच्चों को ट्यूशन पढ़ातीं, मित्रों से घिरी हुईं। उन्हें याद करना इतना ही आसान है। वह याद आती हैं तो पूर्व-परिचय के बेहद आत्मीय सवाल साथ आते हैं। स्वप्न या स्मृति की ऐसी मुलाक़ातों पर ऐसे सवाल साथ आते ही हैं। कविता का घटित क्षण वह है जब चलती ट्राम में कवि को एक देखने से दूसरे देखे हुए की याद आ गई है। चेतना पारीक की यह याद मंशापूर्वक बुलाई गई याद नहीं है। यह रहवास के पुराने शहर में लौटने के बीच अचानक उग आई स्मृति है। एक चेहरा, एक जगह, एक चिह्न—और अतीत वर्तमान में लौट आता है। इस बार शहर पहले से अधिक भरा हुआ है, लेकिन चेतना पारीक के आकार की जगह अब ख़ाली है। इस भरे शहर में चेतना पारीक के लिए उनके दो तलवों जितनी जगह ही पर्याप्त होती!

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ज्ञानेंद्रपति की कविता में यथार्थ किसी निष्कर्ष तक पहुँचने का साधन नहीं, देखने की एक रीति है। वे अपने समय को उसके बड़े विचारों से कम और उसके घटते हुए दृश्यों से अधिक पहचानते हैं। शहर, सड़क, नदी, आदमी, बाज़ार—जो कुछ सामने है, वही कविता का आरंभ-बिंदु है। लेकिन उनकी निगाह दृश्य की बाहरी बनावट पर ठहर कर रह नहीं जाती। वह यह भी देखती है कि एक ही दृश्य में कौन-सी चीज़ किसके साथ खड़ी है और उनके साथ होने से क्या बदल जाता है। इसी जगह उनकी कविता का विशिष्ट तनाव पैदा होता है। एक ओर कोई चीज़ बढ़ रही है, दूसरी ओर उसी बढ़त के भीतर कुछ घट रहा है। कहीं सुविधा की रंगत है तो ठीक उसी पड़ोस में एक सुभीता का अभाव। जीवन की चहल-पहल के बीच ही एक अन्य के जीवन की अनुपस्थिति। वह इन विरोधों पर कोई विचार आरोपित करने की जल्दबाज़ी नहीं रखते। कवि उन्हें एक ही दृश्य में रहने देता है और उनके बीच की दूरी ही धीरे-धीरे कविता का अर्थ बनने लगती है। उनकी कविता की विडंबना किसी 
भाषिक कौशल का परिणाम नहीं है। वह शब्दों के चतुर संघर्षण से विडंबना पैदा नहीं करते। 

वह उस जीवन की पड़ताल करते हैं, जिसमें विरोध पहले से मौजूद है। यही उनकी कविता की ताक़त है। वह किसी काल्पनिक संसार की सहायता से अपने समय को समझाती नहीं, वह उसी संसार को सामने रखती है—जिसमें हम रहते हैं। फ़र्क़ इतना भर कि कवि वहाँ उन दो सचाइयों को एक साथ देख लेता है, जिन्हें हम अक्सर अलग-अलग देखते हैं। जब वे एक ही दृश्य में दिखाई देती हैं तो परिचित यथार्थ अचानक अपना प्रच्छन्न अर्थ प्रकट करने लगता है।

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प्रकृति किसी ऐसे दृश्य का नाम नहीं है, जिसे मनुष्य देखकर अपने संसार में लौट आए। वह मनुष्य के बाहर घटता हुआ अपना जीवन है। ज्ञानेंद्रपति के यहाँ पेड़, पक्षी, पशु और ऋतुएँ केवल वर्णन की वस्तुएँ नहीं; वे मनुष्य की उपस्थिति को उसके उचित आकार में रखने के प्रयास हैं। मनुष्य पहली बार अपने को उस दुनिया का स्वामी नहीं, उसका एक निवासी पाता है। यह बदलाव मामूली नहीं है। हम संसार की चीज़ों को प्रायः उनके उपयोग से पहचानते हैं—पेड़ से लकड़ी या छाया, नदी से पानी, पशु से श्रम, ऋतु से मौसम। कविता इस उपयोगिता के पार जाकर चीज़ों को उनकी अपनी उपस्थिति में देखने लगती है और तब दुनिया में हमारे लिए बनी हुई वस्तुओं की संख्या कम होने लगती है। संसार थोड़ा अधिक स्वतंत्र और मनुष्य थोड़ा कम केंद्रीय दिखाई देता है। मनुष्य की बनाई हुई चीज़ों के साथ भी यही होता है। शहर, मूर्ति, स्मृति, विश्वास या ईश्वर—इनमें से कोई भी बन जाने के बाद केवल अपने बनाने वाले की इच्छा नहीं रहता। वे मनुष्य से निकलकर फिर मनुष्य पर असर डालते हैं। ईश्वर की कल्पना इसका सबसे जटिल उदाहरण है। रचना और रचयिता का संबंध यहाँ एक ही दिशा में नहीं चलता। प्रकृति और कृति की चिंताओं में ज्ञानेंद्रपति की कविता इसका विस्तार बाहर की दुनिया को समेट लेने में नहीं, मनुष्य की जगह को बदल देने में करती है। ठीक इसी लय पर, उनकी कविताएँ हमें संसार का अधिक बड़ा नक़्शा नहीं देती—वह उस नक़्शे में मनुष्य की जगह थोड़ी छोटी और उसकी ज़िम्मेदारी थोड़ी बड़ी कर देती हैं। 

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ज्ञानेंद्रपति को पढ़ना, चीज़ों की बनी-बनाई शक्ल पर संदेह करना है। उनके लिए कविता का कोई आरक्षित प्रदेश नहीं। कंकड़, चेहरा, गुमनाम आदमी—कुछ भी अचानक अर्थवान् हो सकता है। रोज़मर्रा के भीतर ही उनकी कविता अपना दरवाज़ा खोलती है। उनकी दुनिया की अपनी मिट्टी है। अपना मुहावरा। अपने छोटे भूगोल। मगर यह भूगोल बंद कमरा नहीं। इसमें दूर की हवाएँ घुसती हैं। बाज़ार की सरसराहट भी। बदलते समय की खरोंच भी। जनपद यहाँ नक़्शे की सीमा नहीं, देखने की एक पद्धति है। कवि दृश्य के बाहर खड़ा होकर उसका ब्योरा नहीं देता। वह उसमें उतरता है। आदमी के भीतर। वस्तु की देह में। किसी मामूली-सी स्थिति की तह में। यह परकाया प्रवेश कल्पना की सजावट नहीं। संवेदना का श्रम है। इसलिए उनकी कविता में मनुष्य अपनी एकमात्र पहचान में नहीं मिलता। वस्तु भी अपने उपयोग से बड़ी हो जाती है। एक उपस्थिति दूसरी को जन्म देती है। राजनीति भी इसी बिंदु पर दिखाई देती है। घोषणाओं में नहीं। जीवन के दबाव में। भूख में। श्रम में। भय में। जिस क्षण व्यवस्था किसी आदमी की देह पर अपना निशान छोड़ती है, सत्ता अमूर्त नहीं रहती। वह छूने योग्य हो जाती है। ज्ञानेंद्रपति इसी छूने योग्य राजनीति के कवि हैं। इसलिए कविता उनके यहाँ भाषण नहीं। हस्तक्षेप है। वह किसी विचार को समझाती नहीं, चीज़ों की दूरी बदल देती है। दो असंबंद्ध वस्तुएँ पास आ जाती हैं। कोई परिचित दृश्य अचानक अजनबी लगने लगता है। अर्थ वहीं पैदा होता है। निराला और मुक्तिबोध से उनकी निकटता भी इसी बेचैन दृष्टि में है। समय उनके यहाँ तारीख़ नहीं। एक सक्रिय दबाव है। वह चेतना में उतरता है। उसे चैन नहीं लेने देता। कविता उस बेचैनी को दर्ज करती है, लेकिन दर्ज करके रुकती नहीं।

भारतीयता के साथ उनका संबंध भी इसी तरह बिना घोषणा के बनता है। लोक में। बोली में। स्मृति में। श्रम में। पेड़-पौधों और मनुष्य के पुराने रिश्तों में। आधुनिकता जिन अनुभवों को घिसकर एकसार करती जाती है, कविता उनमें फिर से भेद पैदा करती है। इसीलिए उनकी स्थानीयता संकुचन नहीं है। वह बाहर की ओर खुलती है। अपने भूगोल को पहचानते हुए दूसरे भूगोलों तक पहुँचती है। मिट्टी से उठती है और क्षितिज की ओर जाती है। भाषा इस यात्रा की सबसे सक्रिय जगह है। 

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वह अपने समय से सहमत होने की उतावली नहीं रखते। हमारे समय ने अपने लिए कुछ बहुत चमकीले शब्द चुन रखे हैं—विकास, प्रगति, संपर्क, समृद्धि। इन शब्दों के पीछे जो कुछ छूट जाता है, उनकी कविता वहीं जाकर खड़ी होती है। वह उपलब्धियों की सूची नहीं बनाती; वह पूछती है कि इन उपलब्धियों के बीच किसका जीवन कम हुआ, किसकी आवाज़ दब गई और किस चीज़ के नष्ट हो जाने को हमने सामान्य मान लिया। इस दृष्टि में करुणा कोई भावुकता नहीं है। वह देखने की एक नैतिक क्षमता है। किसी दूर के मनुष्य, किसी मिटते हुए जीव या किसी उजड़ते हुए भूगोल को अपने अनुभव का हिस्सा मान सकना तभी संभव है जब दुनिया को केवल अपने हित की सीमा से न देखा जाए। इसी से कविता का विस्तार होता है और इसी से उसका रोष भी विश्वसनीय बनता है। ज्ञानेंद्रपति की बेचैनी का स्रोत शायद यही है कि वह किसी अंतिम, सुविधाजनक उत्तर से संतुष्ट नहीं होते। उनका संशय निष्क्रिय नहीं करता, वह उन्हें फिर देखने के लिए बाध्य करता है। जो दिखाई दे रहा है, उसके पीछे क्या है—और जो नहीं दिखाई दे रहा, वह कहाँ गया—कविता बार-बार इसी प्रश्न की ओर लौटती है।

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पालथी मार चीज़ें बैठ गई हैं
पीठ फेर, आख़िर क्या फ़ायदा है
इकतरफ़ा संवाद से।

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समादृत कवि ज्ञानेंद्रपति इस बार के ‘हिन्दवी उत्सव’ में काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित हैं। ‘हिन्दवी उत्सव’ से जुड़ी जानकारियों के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव-2026

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