जेन ज़ी : इंस्टाग्राम से जंतर-मंतर तक
धर्मेंद्र कुमार पाल
03 अगस्त 2026
किसी लोकतांत्रिक देश में विरोध-प्रदर्शन वहाँ की जनता का मूलभूत अधिकार होता है। इसी अधिकार के सहारे वह लोकतांत्रिक देश फल-फूल रहा होता है, अन्यथा सरकार सर्वाधिकारवादी व्यवस्था के रूप में बदलने लगती है तथा अधिनायकवादी रुख़ इख़्तियार करने लगती है। हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो सक्रिय नागरिकता की अभावग्रस्तता दिखाई देने लगी थी, इस प्रदर्शन के माध्यम से जेन-ज़ी यह साबित करने में सफल हुई कि हम मुर्दा नागरिक नहीं हैं। अगर सरकार हमारे साथ बर्बरता के साथ व्यवहार करेगी, तो हम अपनी जान का जोखिम नहीं देखेंगे और अपने अधिकारों व लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अंगारों से भी भिड़ जाएँगे, जो कि एक नागरिक के रूप में उनकी जीवंतता का प्रमाण है। बहरहाल, अपने बेहतर भविष्य व शिक्षा के अधिकार के लिए इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन को चिंगारी की भाँति भारत के विभिन्न छोटे-बड़े शहरों में फैलाने की असली वजह दिल्ली पुलिस का बर्बरतापूर्ण दमन का प्रयास रहा है। सरकार द्वारा छात्रों से बातचीत करने के बजाय जिस प्रकार निहत्थे छात्रों पर लाठियाँ बरसाई गईं तथा छात्राओं के साथ बर्बरता और अभद्रता की गई, उसने आग में घी का काम किया।
जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन, यूँ कहें तो, प्रारंभ में बहुत सीमित ही था, परंतु सरकार की अपनी ही ग़लतियों की वजह से इसने एक विशाल जनआंदोलन का रूप ले लिया। अगर सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों से लोकतांत्रिक तरीक़े से व्यवहार करती, तो यह ज्वाला समान नहीं भड़कता; परंतु सरकार में क़ाबिज़ सामंतवादी व अधिनायकवादी प्रवृत्ति के लोग यह भूल जाते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और वे इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार पर ही इस मक़ाम तक पहुँच पाए हैं।
यह आंदोलन सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल तक सामान्य-सा विरोध-प्रदर्शन लग रहा था। हालाँकि लोकतांत्रिक समाज में उसे भी पर्याप्त महत्व देना चाहिए और असहमति की आवाज़ों को सुना जाना चाहिए। जब सोनम वांगचुक को जबरन पुलिसिया कार्रवाई के माध्यम से डिटेन किया गया, उस वक़्त भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग में एक विरोध की हलचल-सी हुई, मगर मेरे हिसाब से यह भी उस आंदोलन को भड़काने के लिए काफ़ी नहीं था। जब दिल्ली पुलिस ने बर्बर तरीक़े से छात्रों को पीटा और इस कार्रवाई के साथ-साथ अन्य चीज़ें भी घटित हुईं, जैसे पुलिस द्वारा ख़तरनाक तरीक़े की बलप्रयोग, स्त्रियों के साथ पुलिसवालों द्वारा जानबूझकर की गई अभद्रता के वीडियो व रील्स जब लोगों तक पहुँचे, तो उनके भीतर मरणासन्न अवस्था में लगभग जा चुकी अपनी नागरिकता को सक्रिय नागरिक में बदलने का बोध हुआ। इस प्रकार इस नई पीढ़ी को इस प्रदर्शन में न शामिल होने पर अपराधबोध-सा महसूस होने लगा और तमाम युवाओं में एक अद्भुत-सी बेचैनी उत्पन्न हुई, जिसने प्रदर्शनकारियों के साथ अपनत्व की भावना को बढ़ाया।
अब अगर आप इस प्रदर्शन में देखेंगे, तो अधिकांश युवा ही थे और इन प्रदर्शनकारियों में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अधिकांशतः विरोध-प्रदर्शनों से बहुत इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता या उन्हें बहुत महत्व नहीं देता था। पुलिस की बर्बरता के पश्चात इन प्रदर्शनकारियों व इनके साथ जुड़ने वाले नए प्रदर्शनकारियों में रोष तो उत्पन्न हुआ ही, परंतु लाठी और गोली के भय का अभाव हो गया। इस रोष तथा भयाभावग्रस्तता ने इन युवाओं के मध्य अपने एक होने का भाव पैदा कर दिया। इस प्रदर्शन को देखने से लगा कि इनके बीच किसी भी अन्य तरीक़े का विभेद नहीं था—न छोटे-बड़े का विभेद, न ही लैंगिक विभेद, न ही कोई भाषाई, धार्मिक व जातीय भेदभाव। सब एक साथ रह रहे थे, एक-दूसरे की हौसला-अफ़ज़ाई कर रहे थे और सहयोग कर रहे थे। मुझे इस संबंध में प्रेमचंद के ‘गो-दान’ की पंक्ति याद आती है कि सुख के दिन आएँ, तो लड़ लेना; दुःख तो साथ रोने ही से कटता है। इसी भावना से सभी प्रेरित थे। दिन की बात ही अलग है, रात को भी इनमें शामिल स्त्रियों को किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा; वे बिल्कुल सुरक्षित महसूस कर रही थीं।
यह प्रदर्शन अपने आप में बिल्कुल अलग तरीक़े का था। छात्रों की भाषा, इशारे, पोस्टर—सब कुछ बिल्कुल अलग तरह का था। बहुत ही रचनात्मक नारे, पोस्टर व प्ले-कार्ड थे। उनमें से आपको कुछ अश्लील भी लग सकते हैं, लेकिन सभी कुछ अश्लीलता के नाम पर नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि उन प्रदर्शनकारियों के लिए वही एक तरह का समाज और सामाजिकता का माध्यम प्रदान कर रहा था। इस प्रदर्शन में एक अलग ही तरह का इकोसिस्टम तैयार हो गया, जो उनके विरोध-प्रदर्शन को और मजबूती प्रदान कर रहा था। वहाँ युवा जगह-जगह आपस में ही नाटक-नौटंकियाँ, गाने, मीम्स, कॉमेडी, हास्य-व्यंग्य, खेल और रचनात्मक तरीक़ों का प्रयोग कर रहे थे, एक-दूसरे की हौसला-अफ़ज़ाई करने हेतु। कुल मिलाकर, अगर कहें, तो अपने अधिकारों की लड़ाई ये एक नए ढंग से लड़ रहे थे और यह आंदोलन एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप लेता जा रहा था।
अंत में सरकार को एक महीने से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद इस नई पीढ़ी की सजगता, जुझारूपन और अपने अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाज़ा लग ही गया तथा प्रदर्शनकारियों की माँगों को मानने हेतु मजबूर होना पड़ा। भारतीय राज्यव्यवस्था में एक लंबे अरसे से जिस जवाबदेही व उत्तरदायित्व का लंबा अभाव-सा पैदा होता चला जा रहा था, शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा उस पर एक विराम के रूप में देखा जा रहा है। इस प्रकार भारत की जेन-ज़ी ने भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को लोकतांत्रिक होने के एहसास का पुनरुद्घाटन किया। यह जीत भारत की, भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की, भारतीयता की तथा भारतीय युवाओं की सामूहिक जीत है।
कुछ महत्वपूर्ण बिंदु, जिनका हमें इस आंदोलन की कामयाबी के रूप में उल्लेख करना चाहिए—यह आंदोलन हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को टिकाऊ, चलायमान व सिंचित करने की सक्षमता का सुखद संकेत देकर समाप्त हुआ। बेहतर शिक्षा के प्रति लोगों के मध्य जागरूकता तथा प्रभावी व विश्वसनीय शिक्षा व परीक्षा-प्रणाली के अधिकार व कार्यान्वयन हेतु एक सामाजिक लामबंदी में इसने निर्णायक भूमिका का निर्वहन किया। स्त्रियों की इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी उनके मजबूत इरादों व स्त्री आंदोलन के प्रति सकारात्मक संकेत व उत्साहवर्धक साबित होगी। सवाल करने की परंपरा, जिसका लगभग समापन निकटस्थ दिखाई दे रहा था, उसका पुनरुत्थान या पुनः वापसी हुई और एकाएक निष्क्रिय नागरिकता से सक्रिय नागरिकता के रूप में परिवर्तन होता दिखाई दिया। एक तरह से भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का प्रारंभिक परीक्षण हुआ और इसके माध्यम से यह दुबारा सिद्ध भी हुआ कि भारत में लोकतांत्रिक जड़ों को परखने वाले किस तरह हारे थे, हारे हैं और भविष्य में भी हारेंगे। परंतु इस प्रदर्शन के माध्यम से भारतीय पुलिसिंग व्यवस्था व उसके प्रशिक्षण पर गंभीर सवाल पैदा हो रहे हैं, ख़ासकर लैंगिक संवेदनशीलता तथा पुरुष पुलिसकर्मियों के मन में महिलाओं व उनके शरीर के प्रति कुंठा को उजागर करते हैं।
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बेला पॉपुलर
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