साइबर कथाएँ : डिजिटल दुनिया की छाया में छिपे साइबर ठगों की पड़ताल
राजीव रंजन
26 मार्च 2026
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने साइबर अपराधों के लिए कई नए रास्ते खोल दिए हैं। ज़रा कल्पना कीजिए कि किसी पिता से उसकी बेटी की आवाज़ में कोई व्यक्ति पैसे माँगने लगे। आज की तकनीक की मदद से यह संभव हो गया है कि किसी की आवाज़ की नक़ल की जा सके या किसी व्यक्ति का फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल और आपत्तिजनक वीडियो तैयार कर लिया जाए। ऐसे माध्यमों का उपयोग करके साइबर ठग लोगों को आसानी से अपना शिकार बना सकते हैं। तेज़ी से विकसित हो रहे तकनीकी संसाधनों के इस दौर में व्यक्ति की अपनी जानकारी और जागरूकता ही उसे ऐसे अपराधों से बचा सकती है।
यदि ‘साइबर कथाएँ : डिजिटल सुरक्षा की राह’ [लेखक : सुशील कुमार] पुस्तक के मूल उद्देश्य को एक वाक्य में व्यक्त करना हो, तो कहा जा सकता है कि यह पुस्तक पाठकों के बीच साइबर अपराधों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के उद्देश्य से लिखी गई है। इस किताब के क़िस्सा-नवीस का मैं शुक्रिया सिर्फ़ इस वजह से अदा नहीं कर रहा कि उन्होंने इंतिहाई मसरूफ़ प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों के बावजूद इस पुस्तक को मुकम्मल किया है, बल्कि यह भी है कि उनकी लेखन शैली में एक विशेष प्रकार की संवेदनशीलता और गहराई दिखाई देती है। लेखक ने पुस्तक लिखते समय पात्रों की निजता और संवेदनशीलता का विशेष ध्यान रखा है। वास्तविक घटनाओं से प्रेरित होने के बावजूद, उन्होंने पात्रों और स्थानों के लिए सांकेतिक नामों का प्रयोग किया है, ताकि किसी की व्यक्तिगत पहचान उजागर न हो। लेखक की भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली है। उन्होंने साइबर अपराधों से जुड़ी जटिल घटनाओं और तकनीकी अवधारणाओं को सहज और सुलभ शब्दों में प्रस्तुत किया है। ये सब मिलकर इस किताब की अदबी व अकादमिक क़द्र-ओ-क़ीमत को और ज़्यादा निखार देते हैं।
साइबर अपराधों के क्षेत्र में लेखक का पेशेवर तर्जुबात इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर झलकता है। बिहार सरकार में अपने कार्यकाल के दौरान एक पुलिस प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर अपनी दक्षता का परिचय देते हुए, साल दर साल अनेक साइबर अपराधों की रोकथाम में शामिल रहे होंगे। यही कारण है कि पुस्तक में प्रस्तुत कथानक केवल कल्पना नहीं, बल्कि अनुभव और यथार्थ के गहरे मेल से निर्मित हैं।
लेखक की दृष्टि और अनुभव को देखते हुए मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर याद आता है—
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
आज के समय में डिजिटल तकनीक और इंटरनेट हमारी जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स, ईमेल और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ने लोगों को अपनी बात रखने और अपनी पहचान व्यक्त करने का नया अवसर दिया है। विशेष रूप से महिलाओं और हाशिये पर खड़े समुदायों को अपनी आवाज़ अभिव्यक्त करने का एक नया मंच मिला।
किंतु दुर्भाग्यवश, यही डिजिटल स्वतंत्रता धीरे-धीरे साइबर अपराधों की भेट चढ़ गई। महिलाओं के मामले में साइबर बुलिंग, साइबर स्टॉकिंग, ऑनलाइन हैरेसमेंट जैसे कुछ अपराध नहीं उनकी आज़ादी ले ली। साइबर के रूप में मिली स्वतंत्रता को जल्द ही साइबर अपराधियों का ग्रहण लग गया।
साइबर अपराधों के कई रूप सामने आए, जैसे—
• कैटफ़िशिंग
• रिवेंज पोर्न
• फिशिंग
• ऑनलाइन बैंकिंग फ़्रॉड
• हैकिंग
• स्पायवेयर अटैक
• ईमेल स्पूफ़िंग
• म्यूल अकाउंट
• रिमोट एक्सेस टूल्स
• एपीके फ़ाइलों के माध्यम से धोखाधड़ी
ये अपराध केवल तकनीकी चुनौती नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उत्पन्न करते हैं।
अपराधशास्त्री एडविन एच सदरलैंड ने अपराधों को व्हाइट कॉलर और ब्लू कॉलर अपराधों में विभाजित किया था, परंतु साइबर अपराध इस पारंपरिक वर्गीकरण में पूरी तरह से सही नहीं बैठता। इनमें दोनों प्रकार के अपराधों के तत्व मिलते हैं, इसलिए इसे आधुनिक अपराधशास्त्र की एक नई श्रेणी के रूप में देखा जा सकता है।
लेखक ने अपने प्रशासनिक अनुभवों के आधार पर इन अपराधों से मुक़ाबला किया और साथ ही आम जनता को जागरूक करने के उद्देश्य से इस पुस्तक की रचना की। उन्होंने केवल समस्याओं को देखा ही नहीं, बल्कि उन्हें समझाने और उनसे बचाव के उपाय बताने के लिए क़लम उठाई।
इस संदर्भ में अब्बास ताबिश का एक शेर उल्लेखनीय है—
पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है
अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है
यह पुस्तक प्रशासनिक अनुभवों की वास्तविक घटनाओं को कथात्मक शैली में प्रस्तुत करती है। कहीं से भी यह एक साधारण पुलिस डायरी की तरह नहीं लगती। इसके विपरीत, लेखक ने वास्तविक जीवन में घटित साइबर अपराधों को अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ एक रोचक कथानक का रूप दिया है। यही कारण है कि पुस्तक केवल घटनाओं का दस्तावेज़ भर नहीं रह जाती, बल्कि एक प्रभावशाली साहित्यिक कृति के रूप में सामने आती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो लेखक केवल एक प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक कुशल अफ़साना-निगार (कथाकार) की भूमिका में भी दिखाई देते हैं।
इस पुस्तक की एक विशेषता ये भी है कि जितने भी संदर्भित जटिल और तकनीकी शब्द हैं, जो साइबर अपराधों से भी संबंधित हैं और इस पुस्तक की संरचना के अभिन्न अंग हैं—उसे बहुत सरल भाषा में अलग से समझाया गया है। इस पूरी पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरा ध्यान एक विशिष्ट बिंदु पर गया। साइबर अपराध को करने वाले लोग की आर्थिक सामाजिक और शैक्षणिक समझ क्या है? किताब यह भी बताती है कि साइबर अपराधियों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि हमेशा बहुत उच्च नहीं होती। अधिकतर मामले में वो मैट्रिकुलेशन तक भी उत्तीर्ण नहीं हैं, वही इसके विपरीत जो लोग इन साइबर अपराधों का शिकार हो रहे हैं, उस फ़ेहरिस्त में हर तरह के लोग सम्मिलित हैं। उनमें अमीर-ग़रीब, आम-ख़ास, ताक़तवर-कमज़ोर, आईटी प्रोफ़ेशनल से लेकर आम मज़दूर और किसान तक सब शामिल हैं। कोई खेत बेचकर बाप का इलाज कराता, कोई बेरोज़गार नौजवान—रविरंजन, कोई डॉक्टर—सुष्मिता, कोई अफ़सर, कोई प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी, हर तरह के लोग साइबर जुर्म का शिकार हो रहे हैं।
पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि साइबर अपराध किसी के साथ भी हो सकते हैं। यह किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता, शिक्षा या सामाजिक स्थिति से सीमित नहीं है। जैसे एक कुशल तैराक भी असावधानी से डूब सकता है और एक अनुभवी चालक के साथ भी दुर्घटना हो सकती है, उसी प्रकार डिजिटल दुनिया में थोड़-सी लापरवाही भी गंभीर परिणाम ला सकती है।
यह पुस्तक समाज के भीतर हर वर्ग के लोगों से एक प्रश्न पूछ रही है—वो क्या चीज़ है, जिसके आधार पर एक अनपढ़, बेरोज़गार नौजवान भी इतने पढ़े-लिखे दानिशमंद आईटी मामलों के जानकारों के साथ भी बहुत आसानी से साइबर क्राइम कर ले जाता है? मेरी समझ में साइबर अपराधियों ने लोगों के अंदर के भौतिकतावादी दृष्टिकोण को बहुत अच्छे से पहचान लिया है। बढ़ते ई-कॉमर्स और ऑनलाइन इस्तेमाल के दौर में हर शख़्स साइबर ठगों के ख़ूबसूरत झूठ का निशाना बन सकता है। इस स्थिति को समझाते हुए राहत इंदौरी का यह शेर अत्यंत प्रासंगिक लगता है—
तू जो चाहे तो तेरा झूठ भी बिक सकता है
शर्त इतनी है कि सोने का तराज़ू रख ले
पाठक के दृष्टिकोण से यह पुस्तक साइबर अपराधों की वास्तविकता को उजागर करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। यह पुस्तक न केवल अपराधों को बेनक़ाब करती है, बल्कि पाठकों को जागरूक भी बनाती है।
फिर भी, एक पाठक के रूप में लेखक से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपने इस प्रयास को आगे भी जारी रखें। साइबर अपराधों की जटिलता और तेज़ी से बदलती प्रकृति को देखते हुए इस विषय पर और भी विस्तृत अध्ययन और लेखन की आवश्यकता है। अकादमिक दृष्टिकोण से यह पुस्तक आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुरूप है और वर्तमान समाज की चुनौतियों को समझने में सहायक सिद्ध होती है।
अतः यह अपेक्षा की जा सकती है कि लेखक भविष्य में भी अपने अनुभवों और ज्ञान को और अधिक गहराई तथा विशिष्टता के साथ प्रस्तुत करेंगे, जिससे अकादमिक और प्रशासनिक जगत से जुड़े पेशेवर लोग भी इस पुस्तक का उपयोग अपनी दैनिक ज़िम्मेदारियों के निर्वहन में कर सकें। साथ ही एक विनम्र अनुरोध यह भी है कि जब इस पुस्तक का दूसरा भाग प्रकाशित हो, तो उसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) से संबंधित साइबर फ़्रॉड की संभावनाओं, कल्पनाओं और वास्तविकताओं को भी विस्तार से दर्ज किया जाए।
आज के दौर में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) ने साइबर अपराध के नए आयाम खोल दिए हैं, इसलिए इस विषय पर गंभीर चर्चा और अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि लेखक अपनी गहरी समझ और अनुभव के आधार पर इस महत्त्वपूर्ण विषय को और व्यापक रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करेंगे, ताकि जागरूकता और समझ दोनों का विस्तार हो सके।
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