C/O बंगाल : विजय का उत्सव, पराजय की स्मृति
बेबी शॉ
20 अक्तूबर 2026
कुछ ही देर में नीलकंठ पक्षी नीले पंख फैलाकर उड़ जाएगा। वह कैलाश में महादेव के पास जाएगा और संदेश पहुँचा देगा, “देवी दुर्गा लौट रही हैं।”
ढाक की थाप तीव्र हो उठी है। हवा में सिंदूर उड़ रहा है। कहीं शंखनाद गूँज रहा है, तो कहीं आँखों में छलकते आँसुओं के बीच गले मिलकर विदाई दी जा रही है। माँ दुर्गा की विदाई की घड़ी आ पहुँची है।
सप्तमी से दशमी तक, चार दिनों के शारदीय आनंदोत्सव का अंत हो रहा है। पंडालों में विसर्जन की तैयारियाँ चल रही हैं। ढाक की आवाज़ में विदाई की धुन घुल-मिल रही है। बंगालियों का मन उदास है। सिंदूर खेला और गले मिलकर विदाई देने की रस्में शुरू हो गई हैं। पुरुषों ने धोती-पंजाबी पहन रखी है। कुछ देर पहले तक जो पंडाल आनंद से गूँज रहा था, वहाँ अब विषाद की छाया है।
लाल किनारी वाली श्वेत साड़ियों में सजी बंगाली माताएँ देवी को सिंदूर लगाकर, मिठाई खिलाकर विदा कर रही हैं।
...और तब ही, एक शरारती लड़के ने असुर के मुँह में एक बहुत बड़ा रसगुल्ला ठूँस दिया है। चारों ओर सब लोग हँसने लगे।
विसर्जन की तैयारी, माँ की विदाई का विषाद, अगले वर्ष उनके फिर लौटने की प्रतीक्षा और इस बीच हँसी-मज़ाक़ के छोटे-छोटे क्षण सब मिलकर एक विचित्र, भावनापूर्ण वातावरण रचते हैं। बंगाल के इस शारदीय उत्सव में मिलन और बिछोह जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं।
लेकिन इस भीड़ से थोड़ी दूर दोबरू पन्ना खड़े हैं... विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘आरण्यक’ के उस पात्र की तरह, जो इस दृश्य के भीतर होते हुए भी सबसे अलग है। उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं है। उनकी आँखें छलछला रही हैं। असुर को लेकर यह हँसी-मज़ाक़ उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है। उनके लिए वही असुर पूर्वजों की स्मृति, आत्मपहचान का हिस्सा और खोए हुए इतिहास का प्रतीक है।
बंगालियों के लिए विजयादशमी देवी की विजय का दिन है, लेकिन भारत के आदिवासी समाज के कुछ समुदायों के लिए इन दिनों के साथ पराजय, शोक और पूर्वजों को स्मरण करने की परंपरा जुड़ी हुई है। एक ही पौराणिक कथा एक समाज में आनंद का स्रोत बन सकती है, तो दूसरे समाज में पीड़ा की स्मृति। इसी विरोधाभास के माध्यम से भारतीय संस्कृति का बहुस्वरात्मक चरित्र प्रकट होता है।
पौराणिक आख्यान के अनुसार, महिषासुर के अत्याचार से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए देवी दुर्गा का आविर्भाव हुआ। लंबे युद्ध के अंत में महिषासुर का विनाश अशुभ शक्ति की पराजय और शुभ शक्ति की विजय का प्रतीक है। इसी विश्वास को केंद्र में रखकर बंगाल में दुर्गोत्सव का विशाल आयोजन किया जाता है। देवी कभी महिषासुरमर्दिनी हैं, तो कभी घर की बेटी उमा। उनके आगमन पर आनंद और उनकी विदाई पर आँसू बहाए जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों से आगे बढ़कर दुर्गापूजा बंगालियों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का एक अविभाज्य हिस्सा बन गई है।
शारदीय दुर्गापूजा के साथ रामचंद्र की अकालबोधन की कथा जुड़ी हुई है। प्रचलित विश्वास के अनुसार रावण के साथ अंतिम युद्ध से पहले रामचंद्र ने शरद ऋतु में देवी दुर्गा की आराधना की थी, हालाँकि इस कथा के साथ वाल्मीकि रामायण और कृत्तिवासी रामायण का एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में रामचंद्र की दुर्गापूजा या अकालबोधन का उल्लेख नहीं है। वहाँ रावण के साथ युद्ध से पहले रामचंद्र द्वारा सूर्यदेव की उपासना का प्रसंग मिलता है। अगस्त्य मुनि उन्हें आदित्यहृदय स्तोत्र का उपदेश देते हैं। दूसरी ओर, पंद्रहवीं शताब्दी के कवि कृत्तिवास ओझा की श्रीराम पांचाली अथवा कृत्तिवासी रामायण में अकालबोधन की कथा को विशेष महत्त्व दिया गया है। लेकिन इस प्रचलित आख्यान के साथ-साथ भारत के कुछ आदिवासी समुदायों में महिषासुर को लेकर अलग लोकविश्वास भी प्रचलित हैं। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के जंगलमहल और झारखंड के कुछ क्षेत्रों में संथाल तथा अन्य आदिवासी समुदायों के कुछ समूह महिषासुर को हुदुड़ दुर्गा के नाम से स्मरण करते हैं। लेकिन यह हुदुड़ दुर्गा कौन हैं?
संथाली लोकगाथाओं और समाजशास्त्रीय विश्लेषण के अनुसार ‘हुदुड़’ शब्द का अर्थ है प्रचंड शक्तिशाली वायु-प्रवाह या तूफ़ान। वहीं यहाँ ‘दुर्गा’ शब्द किसी स्त्री-देवी का प्रतीक नहीं है, बल्कि एक उपाधि है जिसका अर्थ ‘दुर्भेद्य’ या ‘अजेय रक्षक’ माना जाता है। संथाल समुदाय के लिए ‘हुदुड़ दुर्गा’ उनके आदि-पुरुष और वीर योद्धा के रूप में एक देवतुल्य चरित्र हैं।
नृ-विज्ञानियों और इतिहासकारों के अनुसार आर्यों के भारत आगमन के दौरान इस भू-भाग के मूल निवासियों अथवा अनार्यों के साथ उनका लंबे समय तक संघर्ष हुआ। आर्य पशुपालक और घुमंतू जीवनशैली से जुड़े थे, जबकि अनार्य कृषि-आधारित सामाजिक व्यवस्था के अभ्यस्त थे। जब आर्य सिंधु घाटी से गंगा के मैदानी इलाक़ों की ओर बढ़ने लगे, तब उन्हें स्थानीय शक्तिशाली राजाओं और जनजातीय मुखियाओं के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
पौराणिक आख्यानों में जिन्हें ‘असुर’ के रूप में चित्रित किया गया है, आधुनिक इतिहास की कुछ व्याख्याओं में उन्हें स्थानीय मूलनिवासी अथवा आदिवासी समुदायों से जोड़कर देखा जाता है। ‘असुर’ शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विभिन्न मत प्रचलित हैं। आदिवासी समुदायों की कुछ लोक-मान्यताओं में असुर अजेय शक्ति से संपन्न योद्धाओं के रूप में स्मरण किए जाते हैं। हुदुड़ दुर्गा ऐसे ही एक अनार्य वीर के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्हें आर्यों के विस्तार का प्रबल प्रतिरोध करने वाले योद्धा के रूप में देखा जाता है।
ग्रामीण कृषि-प्रधान सभ्यता के वाहक अनार्यों के लिए असुर पूजनीय देवता हैं। प्रागैतिहासिक काल में हुदुड़ दुर्गा संथाल समाज के राजा थे। वे वीर योद्धा और न्यायप्रिय शासक थे। वे चाईचांपा नामक स्थान पर शासन करते थे। आर्य उनके निवास-स्थानों और उन कृषि-भूमियों पर क़ब्ज़ा करने आए थे; जिन्हें आदिवासियों ने जंगल साफ़ करके, दिन-रात मेहनत कर खेती योग्य बनाया था।
आदिवासी समाज में स्त्रियों का स्थान बहुत ऊँचा है और उन्हें पूजनीय माना जाता है। इसी विशेषता का लाभ उठाकर कूटनीतिक आर्यों ने एक सुंदर स्त्री के माध्यम से हुदुड़ दुर्गा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। हुदुड़ दुर्गा ने उस प्रस्ताव का सम्मान किया और छल के जाल में फँस गए।
षष्ठी से दशमी तक, जब बंगाल के घर-घर में उत्सव की धूम रहती है, तब आदिवासी समाज पर विषाद की छाया छाई रहती है। लोकगाथा के अनुसार युद्ध के एक चरण में जब वह स्त्री युद्धोन्मत्त रूप धारण कर हुड़ुर दुर्गा के सामने उपस्थित हुई, तो राजा हुड़ुर दुर्गा विस्मय से स्तब्ध रह गए। उन्होंने देखा कि उनके सामने एक स्त्री हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए खड़ी है। संथाल समुदाय की चिरंतन सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार, किसी स्त्री के विरुद्ध युद्ध करना कायरता है। हुड़ुर दुर्गा जानते थे कि यदि वे हथियार उठाएँगे तो विजय उनकी ही होगी, लेकिन ऐसा करने से उनके समुदाय के आदर्शों का हनन होगा। अपने सिद्धांतों और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने अपने हाथों में मौजूद ढाल-तलवार त्याग दी।
पौराणिक आख्यानों में हम देखते हैं कि दुर्गा त्रिशूल से महिषासुर का वध कर रही हैं, लेकिन अनार्य आख्यान के अनुसार यह कोई युद्ध नहीं था; बल्कि एक निहत्थे वीर की हत्या थी, जिसे एक स्त्री के माध्यम से आर्यों ने सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया था।
हुड़ुर दुर्गा की मृत्यु के बाद अनार्य समाज बिखर गया। उनकी भूमि पर अधिकार कर लिया गया। लेकिन आम लोग अपने प्रिय राजा की मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पाए। उनके मन में एक धुँधली-सी आशा शेष थी कि शायद राजा मरे नहीं हैं, बल्कि शत्रुओं से बचने के लिए जंगल की गहराइयों या किसी गुफा में छिप गए हैं। इसी ‘लापता राजा’ को खोजने की कोशिश कालांतर में ‘दाँसाई नृत्य’ के रूप में विकसित हुई। दुर्गापूजा का समय उनके लिए आनंद के बजाय शोक का माहौल लेकर आता है। आज भी ऐसे अनेक आदिवासी गाँव हैं, जहाँ दुर्गापूजा के दिनों में दीपक नहीं जलाए जाते और मांसाहार वर्जित रहता है।
लोक-गाथाओं में आयनम और काजल नाम की दो संथाल युवतियों का उल्लेख मिलता है, जो जंगल में लकड़ी और पत्तियाँ इकट्ठा करने गई थीं। आर्य समुदाय के कुछ लोगों ने उनका अपहरण कर लिया। उन महिलाओं की रक्षा के लिए हुदुड़ दुर्गा अकेले ही दौड़ पड़े। एक बड़ी शक्ति के विरुद्ध एकजुट होने में संथाल समाज को एक दिन का समय लगा। उन्होंने महिलाओं के वस्त्र धारण किए। लौकी के खोल में तीरों की नोक और अन्य हथियार छिपाकर वे हुदुड़ दुर्गा, आयनम और काजल की तलाश में निकल पड़े। बहुत बारिश के कारण उनकी खोज में और विलंब हुआ।
संथाली भाषा में ‘दाँसाय’ शब्द के ‘दाँ’ का अर्थ जल और ‘साय’ का अर्थ शमन माना जाता है। बारिश का पानी कम होने की प्रतीक्षा में उन्हें देर हुई। अपने प्रियजनों को तत्काल खोज न पाने के कारण वे ‘हाय, हाय’ की करुण ध्वनि के साथ गीत गाने लगे। ऐसे अनेक गीत आज भी प्रचलित हैं।
दाँसाय तथा दाँसाई नृत्य युद्धनृत्य है। यह नृत्य भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बाँकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर, बीरभूम तथा पूर्ववर्ती बर्धमान ज़िले के आसनसोल उपमंडल में लोकप्रिय है। इसके अलावा, झारखंड के संथाल परगना, धनबाद, राँची, हजारीबाग, बोकारो, रामगढ़ तथा पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में भी यह नृत्य प्रचलित है।
पश्चिम बंगाल में ही लगभग तीन सौ स्थानों पर आदिवासी समुदाय के लोग महिषासुर के स्मरण में बंगाल के उच्चवर्णीय ब्राह्मणवादी परंपरा के समानांतर दाँसाय पर्व मनाते हैं। सूखी लौकी के खोल से बने ‘भुआंग’ नामक वाद्ययंत्र का प्रयोग इस पर्व के नृत्य में किया जाता है। पुरुष साड़ी पहनते हैं और सिर पर मोरपंख सजाते हैं। स्त्रियों के आभूषण पहनकर भी पुरुष दाँसाय नृत्य करते हैं।
पुरुलिया के एक कोई कोई गाँव में अपनी सामुदायिक अस्मिता को सामने लाने के उद्देश्य में हुदुड़ दुर्गा अथवा महिषासुर स्मरण दिवस का आयोजन किया जाता है।
वास्तव में, झारखंड तथा पश्चिम बंगाल के कूचबिहार और अलीपुरद्वार क्षेत्रों में असुर जनजाति के लोग निवास करते हैं। 1911 की जनगणना के अनुसार उनकी जनसंख्या चार हज़ार से कुछ अधिक थी। अलीपुरद्वार में ‘असुर’ नाम का एक पूरा गाँव भी है।
हुदुड़ दुर्गा का ‘शहीद दिवस’ होने के बावजूद ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से शिक्षित समाज के लिए इसका कोई विशेष महत्त्व नहीं है। लेकिन यह एक लोक-संस्कृति है, इसलिए महत्त्वपूर्ण है...
समकालीन दौर में हुड़ुर दुर्गा की गाथा दलित और आदिवासी अस्मिता की राजनीति का एक अभिन्न हिस्सा बन गई है। बोगाजकोई लिपि से पता चलता है कि अनार्य असुर जाति अत्यंत विकसित थी। ‘ऋग्वेद’ के १.१०८.८ मंत्र से आर्य-अनार्य संघर्ष की कथा, आर्यों द्वारा किए गए शोषण और उनकी कूटनीति के इतिहास की जानकारी मिलती है। मुख्यधारा के हिंदू पौराणिक आख्यानों के बरअक्स इसने एक ‘वैकल्पिक इतिहास’ के रूप में अपनी जगह बनाई है। मानवशास्त्रियों के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन कृषि-आधारित सभ्यताओं और घुमंतू पशुपालक आर्यों के बीच हुए संघर्ष में ही इस उत्सव की मूल उत्पत्ति के सूत्र निहित हैं। ‘महिषासुर’ शब्द में ‘महिष’ यानी भैंस का उल्लेख इस ओर संकेत करता है कि संभवतः वह किसी भैंसपालक जनजाति के मुखिया थे। वैदिक आर्यों की इंडो-यूरोपीय संस्कृति और स्थानीय प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के बीच जो टकराव हुआ था, हुड़ुर दुर्गा की गाथा उसी का एक विकसित रूप मानी जाती है।
भारत की संस्कृति किसी एक धार्मिक आख्यान तक सीमित नहीं है। यहाँ अनेक भाषाएँ, धर्म, जातीय अस्मिताएँ और लोक-विश्वास एक साथ जीवित हैं। एक ही उत्सव अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग अर्थ और भावनाएँ लेकर आ सकता है। दुर्गापूजा और हुदुड़ दुर्गा से जुड़ी मान्यताएँ इसका एक उदाहरण हैं। जहाँ दुर्गापूजा अनेक लोगों के लिए आस्था, उल्लास और शुभशक्ति की विजय का प्रतीक है; वहीं कुछ आदिवासी समुदायों की लोक-स्मृतियों में इसी प्रसंग से जुड़ी मान्यताएँ शोक, पूर्वजों की स्मृति और सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति करती हैं। ये भिन्न दृष्टिकोण भारतीय समाज की विविध सांस्कृतिक परंपराओं और इतिहास-बोध को सामने लाते हैं। यही बहुलता, सह-अस्तित्व और विभिन्न समुदायों की स्मृतियों के प्रति सम्मान भारतीय संस्कृति को विशिष्ट और समृद्ध बनाते हैं।
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