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C/O बंगाल : नोबेल, बांग्ला और विश्वयोग

विश्व के सर्वोच्च सम्मानों में शुमार नोबेल पुरस्कार के इतिहास में जब कोलकाता के पदचिह्न तलाशते हैं, तो इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय खुलने लगता है। सर रोनाल्ड रॉस, रवींद्रनाथ ठाकुर, चंद्रशेखर वेंकट रमन, मदर टेरेसा, अमर्त्य सेन और अभिजीत विनायक बनर्जी—इन छह नोबेल पुरस्कार विजेताओं के जीवन और कार्यों का किसी न किसी रूप में कोलकाता से गहरा संबंध रहा है। इनमें से किसी ने यहाँ शोध किया, किसी का यहाँ जन्म हुआ, किसी ने यहाँ शिक्षा प्राप्त की, तो किसी ने यहाँ के लोगों की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। निस्संदेह, ये सभी बांग्लाभाषी या बंगाली नहीं हैं और न ही इन सबका कोलकाता से जुड़ाव एक जैसा है। फिर भी इनकी जीवन-गाथाओं में कोलकाता एक ऐसे सूत्र की तरह बार-बार उभरता है, जो अलग-अलग जीवनानुभवों और उपलब्धियों को जोड़ता है। यह संयोग के भीतर बंगाल की ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और विश्व के साथ उसके ऐतिहासिक संवाद की अनेक परतें छिपी हुई हैं।

और बंगालियों का नोबेल पुरस्कार से संबंध? वह तो और भी गहरा, और भी भावनात्मक है।

1913 का वर्ष। साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए रवींद्रनाथ ठाकुर। ‘गीतांजलि’ के अँग्रेज़ी अनुवाद ने उन्हें पाश्चात्य पाठक-समुदाय के बीच परिचित कराया। लेकिन रवींद्रनाथ कविता, गीत, लघुकथा, उपन्यास, नाटक, निबंध, शिक्षा संबंधी चिंतन और चित्रकला ऐसा कौन-सा क्षेत्र है; जहाँ उन्होंने अपनी छाप नहीं छोड़ी? मनुष्य की स्वतंत्रता, प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध, धार्मिक संकीर्णता के विरुद्ध मानवीयता और राष्ट्रवाद के अंधेपन को लेकर उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। बांग्ला भाषा में उनकी विपुल रचनात्मक संपदा को विश्वमंच तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन कोलकाता से जुड़े नोबेल पुरस्कार विजेताओं की सूची में सबसे पहले सर रोनाल्ड रॉस का नाम आता है। उन्हें 1902 में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। मलेरिया के संक्रमण में मच्छरों की भूमिका को लेकर उनका शोध इस बीमारी के प्रसार को समझने की दिशा में एक युगांतरकारी उपलब्धि साबित हुआ।

रॉस के बाद रवींद्रनाथ ठाकुर। फिर चंद्रशेखर वेंकट रमन। 1930 में उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रकाश के प्रकीर्णन पर उनके शोध और ‘रमन इफ़ेक्ट’ के नाम से प्रसिद्ध घटना की खोज के लिए उन्हें यह सम्मान मिला था। रमन का जन्म तमिलनाडु में हुआ था, लेकिन उनके वैज्ञानिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय कोलकाता से जुड़ा हुआ है। 1917 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्राध्यापक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस की प्रयोगशाला में किए गए उनके शोध का एक महत्त्वपूर्ण इतिहास भी है।

1979 में मदर टेरेसा को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। उनका जन्म स्कोप्ये में एक अल्बानियाई मूल के परिवार में हुआ था। 1929 में भारत आने के बाद उन्होंने कोलकाता में शिक्षिका के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने स्वयं को शहर के ग़रीबों, बीमारों और असहाय लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया। 1950 में उन्होंने मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की कोलकाता में के साथ।

नोबेल लॉरियेट अमर्त्य सेन का कोलकाता से संबंध शिक्षा और अर्थशास्त्र की दुनिया से जुड़ा है। शांतिनिकेतन में जन्म, प्रेसीडेंसी कॉलेज में शिक्षा और बाद में यादवपुर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग की स्थापना के कार्य से जुड़ाव, उनके जीवन में बंगाल बार-बार लौटकर आता है। 1998 में उन्हें आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कल्याणकारी अर्थशास्त्र, अकाल, ग़रीबी, सामाजिक चयन और मानवीय स्वतंत्रता पर उनके शोध ने अर्थशास्त्र को एक नया दिशा प्रदान किया।

इसके बाद 2019 में अभिजीत विनायक बनर्जी, एस्थर डुफ़्लो और माइकल क्रेमर को आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल स्मृति पुरस्कार मिला। कोलकाता में पले-बढ़े अभिजीत ने साउथ पॉइंट स्कूल में शिक्षा प्राप्त की और प्रेसीडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। उनकी जीवन-गाथा में प्रेसीडेंसी कॉलेज और कोलकाता के शैक्षिक परिवेश का विशेष उल्लेख मिलता है।

लेकिन क्या नोबेल पुरस्कार की चर्चा में सिर्फ़ उन्हीं लोगों का उल्लेख होना चाहिए, जिन्हें यह पुरस्कार मिला है? बांग्ला में ऐसे कई नाम हैं, जिनकी रचनाएँ विश्व साहित्य, विश्व विज्ञान की व्यापक चर्चा में कहीं अधिक पहचान पाने की हक़दार हैं।

बांग्ला साहित्य में लेखक ताराशंकर बंद्योपाध्याय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राढ़ बंगाल की मिट्टी, ग्रामीण जीवन, जाति-व्यवस्था, धार्मिक विश्वास, सामाजिक सत्ता, आर्थिक विषमता और बदलते हुए समाज की तस्वीर ताराशंकर के कथा-साहित्य में ये सभी तत्त्व मिलकर एक विशाल मानवीय संसार का निर्माण करते हैं।

नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक नामांकन अभिलेखागार में ताराशंकर बंद्योपाध्याय का नाम वर्ष 1971 के साहित्य संबंधी नामांकन में दर्ज है। ताराशंकर का निधन 14 सितंबर 1971 को हुआ था। इसलिए उनके निधन के बाद के वर्षों की अभिलेखीय प्रविष्टियों को उनके जीवनकाल में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने की संभावना का प्रमाण मानकर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। इस तथ्य का महत्त्व यह है कि बांग्ला भाषा में रचा गया उनका साहित्य अंतरराष्ट्रीय नामांकन के दायरे तक पहुँचा था।

बांग्ला भाषा के इतिहास और उसकी संरचना पर गहन शोध करने वाले विद्वानों में सुनीतिकुमार चट्टोपाध्याय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भाषाविद्, शिक्षाविद् और साहित्यकार के रूप में उनके शोध ने बांग्ला भाषा के इतिहास, ध्वनिविज्ञान तथा भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक अभिलेखागार में वर्ष 1972 के साहित्य संबंधी नामांकन में उनका नाम दर्ज है।

1894 में कोलकाता में जन्मे सत्येंद्रनाथ बोस ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। क्वांटम भौतिकी के विकास के दौर में उन्होंने प्रकाश-कणों के सांख्यिकीय व्यवहार पर एक महत्त्वपूर्ण शोध किया। उनके शोधपत्र को शुरुआत में प्रकाशन का अवसर नहीं मिला। बाद में उन्होंने इसे अल्बर्ट आइंस्टीन के पास भेजा। आइंस्टीन ने इस शोध के महत्त्व को समझा और सिद्धांत को आगे विस्तार दिया। इसी शोध से बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी का विकास हुआ। उनके नाम पर ही एक प्रकार के मूलभूत कण को ‘बोसॉन’ कहा जाता है।

बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी आधुनिक भौतिकी की मूलभूत अवधारणाओं में से एक है। सत्येंद्रनाथ बोस का नाम अंतरराष्ट्रीय भौतिकी की शब्दावली में भी स्थायी रूप से दर्ज है। सत्येंद्रनाथ बोस को 1956, 1959 और 1962 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। वर्ष 1962 के आधिकारिक अभिलेख में कोलकाता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक के रूप में उनकी पहचान दर्ज है। फिर भी नोबेल पुरस्कार उन्हें नहीं मिला। 2001 में बोस-आइंस्टीन संघनन पर प्रायोगिक शोध के लिए एरिक कॉर्नेल, वोल्फगैंग केटरले और कार्ल वाइमन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सत्येंद्रनाथ बोस को यह पुरस्कार नहीं मिला, हालाँकि इन वैज्ञानिकों के शोध की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि का उनके कार्य से गहरा संबंध है।

मेघनाद साहा एक और बंगाली वैज्ञानिक, जिनके शोध ने विश्वविज्ञान के इतिहास में स्थायी स्थान बना लिया है। सितारों के प्रकाश से उनके तापमान, आयनीकरण की अवस्था और भौतिक विशेषताओं के बारे में जानकारी कैसे प्राप्त की जा सकती है? इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए साहा ने जिस आयनीकरण समीकरण का प्रतिपादन किया, उसने खगोलभौतिकी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूर आकाश में स्थित तारों के भीतर की भौतिक अवस्थाओं के रहस्यों को समझने की दिशा में उनका कार्य एक बड़ी उपलब्धि थी।

नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक नामांकन अभिलेखागार में मेघनाद साहा का नाम कई बार दर्ज हुआ है। अभिलेखागार में 1930, 1937, 1939, 1940, 1951 और 1955 के भौतिकी संबंधी नामांकनों में उनका नाम मिलता है। 1930 में देवेंद्र बोस और शिशिर मित्र ने उन्हें नामांकित किया था। 1937 में नामांकनकर्ता आर्थर कॉम्पटन थे। 1939, 1951 और 1955 के अभिलेखों में शिशिर मित्र का नाम दर्ज है। वहीं 1940 के एक अभिलेख में साहा का नाम अर्नेस्ट लॉरेंस और ओटो स्टर्न के साथ एक ही नामांकन-प्रविष्टि में मिलता है।

नोबेल पुरस्कार के संभावित दावेदारों में एक और युगद्रष्टा वैज्ञानिक का नाम उल्लेखनीय है, उपेंद्रनाथ ब्रह्मचारी। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान विशेष रूप से कालाजार जैसी घातक बीमारी के उपचार से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इस बीमारी के इलाज के लिए यूरिया स्टिबामीन नामक औषधि विकसित की, जो चिकित्सा के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि साबित हुई।

नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक नामांकन अभिलेखागार में उनके नाम से संबंधित 1929 और 1942 के नामांकन दर्ज हैं। वर्ष 1942 के नामांकन संबंधी अभिलेख में कालाजार के उपचार में यूरिया स्टिबामीन के योगदान का विशेष उल्लेख मिलता है।

जगदीशचंद्र बोस का नाम आते ही बंगालियों के गौरव के साथ अक्सर एक कसक भी जुड़ जाती है, इतने महान् वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला?

1858 में जन्मे जगदीशचंद्र बोस ने भौतिकी और पादप-शरीरक्रिया विज्ञान के अनुसंधान में अग्रणी भूमिका निभाई। 1895 में उन्होंने कोलकाता में विद्युतचुंबकीय तरंगों के बेतार संचरण और ग्रहण का प्रदर्शन किया। मिलीमीटर तरंगों पर उनके प्रयोग, तरंगों के संचालन और उनकी पहचान के लिए स्वयं उपकरणों का निर्माण तथा पौधों की प्रतिक्रियाओं को मापने से संबंधित उनके शोध ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जगत में एक विशिष्ट स्थान दिलाया।

1896 में मरक्यूरस नाइट्राइट पर आचार्य प्रफुल्लचंद्र रॉय के शोध को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। बाद के वर्षों में उन्होंने विभिन्न नाइट्राइट तथा सल्फ़रयुक्त यौगिकों पर भी शोध किया और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक अभिलेखागार में वर्ष 1935 के रसायन विज्ञान संबंधी नामांकन में ‘Prafulla Ray’ का नाम एक नामांकनकर्ता के रूप में दर्ज है। यह अलग तथ्य है कि इस अभिलेख में वह स्वयं पुरस्कार के लिए नामांकित नहीं थे, उन्होंने दूसरे वैज्ञानिक पॉल कारेर को नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया था। हालाँकि किसी व्यक्ति को नोबेल पुरस्कार मिला है या नहीं, सिर्फ़ इस कसौटी पर उसकी प्रतिभा और योगदान का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। निस्संदेह, नोबेल पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय मान्यता के सबसे प्रतिष्ठित प्रतीकों में से एक है, लेकिन यह किसी साहित्यकार या वैज्ञानिक की सृजनात्मक प्रतिभा का अंतिम मूल्यांकन नहीं है।

बांग्ला साहित्य की ओर देखने पर यह बात विशेष रूप से महसूस होती है। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की ‘पथेर पांचाली’, ‘आरण्यक’ और ‘अपराजित’, माणिक बंद्योपाध्याय की ‘पद्मा नदीर माझि’ और ’पुतुलनाचेर इतिकथा’, ताराशंकर बंद्योपाध्याय की ‘गणदेवता’ और ‘हांसुली बांकेर उपकथा’ रचनाओं की मानवीय गहराई, सामाजिक यथार्थ और कलात्मक महत्ता विश्व साहित्य के व्यापक परिदृश्य में कहीं अधिक विस्तृत चर्चा की माँग करती है। इसी प्रकार कमलकुमार मजूमदार की विशिष्ट भाषा-शैली और जटिल कलाबोध, देवेश राय की इतिहास-सचेत कथन-शैली, महाश्वेता देवी की रचनाओं में हाशिए पर पड़े लोगों के जीवन और संघर्ष का चित्रण, सतीनाथ भादुड़ी की राजनीतिक एवं सामाजिक अंतर्दृष्टि और अद्वैत मल्लबर्मन का उपन्यास ‘तितास एकटि नदीर नाम’ सबने बांग्ला कथा-साहित्य को ऐसी ऊँचाई प्रदान की है; जिसका महत्त्व किसी एक भाषा या भूगोल तक सीमित नहीं रहता है।

कविता के क्षेत्र में भी यही बात लागू होती है। जीवनानंद दास की निर्जन आधुनिकता, विष्णु दे का बौद्धिक और सौंदर्यशास्त्रीय संसार, सुधींद्रनाथ दत्त की चिंतनशील काव्यभाषा, शक्ति चट्टोपाध्याय की विशिष्ट कवि-संवेदना, विनय मजूमदार की कविताओं में गणितीय तर्क और प्रेम का अद्भुत मेल तथा उत्पलकुमार बसु की कविताओं में यात्रा, भूगोल और भाषा के प्रयोगों से निर्मित अभिनव काव्य-संसार सभी को विश्व कविता की चर्चा में और अधिक स्थान मिलना चाहिए। इसी क्रम में शंख घोष, सुभाष मुखोपाध्याय, जय गोस्वामी और अनेक अन्य कवियों की रचनाओं में ऐसे अनुभव और कलाबोध मौजूद हैं; जो भाषाई सीमाओं को पार करके व्यापक मानवीय अनुभवों से जुड़ सकते हैं।

लेकिन प्रश्न यह है कि बांग्ला साहित्य की यह विशाल संपदा अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक कितनी पहुँची है? बांग्ला के कितने उपन्यास, कहानियाँ और कविता-संग्रह विश्व की प्रमुख भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अनुवाद के माध्यम से नियमित रूप से पाठकों तक पहुँच पाए हैं? बांग्ला साहित्य की कितनी रचनाएँ विदेशों के विश्वविद्यालयों में शोध का विषय बनी हैं, अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थानों के माध्यम से नए पाठक प्राप्त कर सकी हैं अथवा विश्व साहित्य की चर्चा में स्थायी स्थान बना पाई हैं?

यहीं बांग्ला साहित्य की अंतरराष्ट्रीय यात्रा की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक सामने आती है—अनुवाद का संकट।

बांग्ला साहित्य में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी उस प्रतिभा को दूसरी भाषाओं के पाठकों तक पहुँचाने की एक सुव्यवस्थित व्यवस्था की है। साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद का अर्थ है किसी भाषा की सांस्कृतिक स्मृति, क्षेत्रीय जीवनबोध, लोक-अनुभव, सामाजिक यथार्थ, रूपक, छंद और अंतर्निहित संवेदनाओं को दूसरी भाषा में नए सिरे से जीवंत करना। विभूतिभूषण की प्रकृति, माणिक की सामाजिक यथार्थपरकता, कमलकुमार की जटिल भाषा अथवा देवेश राय की इतिहास-दृष्टि का अनुवाद करने के लिए सिर्फ़ भाषाज्ञान पर्याप्त नहीं है, इसके लिए गहरी साहित्यिक समझ, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और कला के प्रति प्रतिबद्धता भी आवश्यक है।

दुर्भाग्यवश, बांग्ला से अँग्रेज़ी, स्पेनिश, फ़्रेंच, जर्मन, अरबी, चीनी तथा विश्व की अन्य भाषाओं में अनुवाद के क्षेत्र में अब भी पर्याप्त योजना, निरंतर आर्थिक सहायता, कुशल अनुवादकों के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन-जगत से जुड़ाव का अभाव है। अनुवाद हो जाने पर भी कई बार उसके संपादन, प्रकाशन, प्रचार और विपणन के लिए आवश्यक पहल नहीं की जाती। परिणामस्वरूप, कोई महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृति अनूदित होकर प्रकाशित तो हो जाती है; पर व्यापक पाठक-समुदाय तक नहीं पहुँच पाती।

दूसरी ओर विश्व साहित्य में किसी रचना की पहचान स्थापित करने के लिए अनुवाद के अतिरिक्त साहित्यिक एजेंटों, अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थानों से संपर्क, साहित्यिक उत्सवों में भागीदारी, विदेशी विश्वविद्यालयों में शोध, पुस्तकों-समीक्षाओं और दीर्घकालिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी आवश्यकता होती है। विश्व की अनेक भाषाओं के साहित्य ने इसी प्रकार की पहलों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय पाठक-वर्ग तैयार किया है। बांग्ला साहित्य को भी इस वास्तविकता को समझना होगा।

यहाँ एक और बात याद रखना आवश्यक है, नोबेल पुरस्कार किसी साहित्यकार की योग्यता का स्वतःसिद्ध मापदंड नहीं है। जिस साहित्य का जितना अधिक अनुवाद होता है, जो जितने अधिक पाठकों तक पहुँचता है और जितनी अधिक अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक तथा शोधपरक चर्चाओं का हिस्सा बनता है; उसकी पहचान का दायरा भी उतना ही विस्तृत होने की संभावना रहती है।

बांग्ला साहित्य की अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ाने के लिए सबसे पहले एक सुविचारित अनुवाद आंदोलन की आवश्यकता है। बांग्ला के चुनिंदा उपन्यासों, कहानियों, कविताओं, नाटकों और निबंधों का विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करने की पहल की जानी चाहिए। अनुवादकों के प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति और सम्मानजनक पारिश्रमिक की व्यवस्था होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों, साहित्य अकादमियों, प्रकाशन संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा। साथ ही बांग्ला साहित्य की महत्त्वपूर्ण रचनाओं की विश्वसनीय ग्रंथसूचियाँ, लेखकों के परिचय और अनुवाद संबंधी जानकारियाँ अंतरराष्ट्रीय पाठकों तथा शोधकर्ताओं के लिए सहज रूप से उपलब्ध करानी होंगी।

बांग्ला साहित्य की विपुल विविधता, गहन जीवनबोध, विशिष्ट सौंदर्यबोध और सामाजिक यथार्थ के साथ उसके गहरे जुड़ाव को विश्व के पाठकों तक पहुँचाने का प्रमुख माध्यम अनुवाद ही है। मातृभाषा में रची गई कोई साहित्यिक कृति कितनी ही उत्कृष्ट क्यों न हो, यदि वह भाषा की भौगोलिक सीमाओं को पार करके अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक नहीं पहुँच पाती, तो उसके समुचित मूल्यांकन की संभावनाएँ भी सीमित रह जाती हैं। बांग्ला साहित्य के सामने एक बड़ी बाधा आज भी अनुवाद की सीमाएँ हैं। बांग्ला साहित्य की अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अब तक स्तरीय अँग्रेज़ी और अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद नहीं हो पाया है। जिन रचनाओं का अनुवाद हुआ भी है, उनमें से अनेक को विश्वसाहित्य के व्यापक परिदृश्य में पर्याप्त प्रचार और पहचान नहीं मिल सकी है। परिणामस्वरूप, बांग्ला साहित्य की सृजनात्मक शक्ति और उसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान के बीच एक दूरी बनी हुई है। इस दूरी को दूर करने के लिए सुविचारित और सुनियोजित अनुवाद-प्रयासों, कुशल अनुवादकों के निर्माण, अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थानों के साथ संपर्क तथा बांग्ला साहित्य को विश्व के पाठकों तक पहुँचाने की दीर्घकालिक सांस्कृतिक योजना की आवश्यकता है।

नोबेल पुरस्कार निस्संदेह सम्मान और गौरव का विषय है, लेकिन नोबेल ही अंतिम लक्ष्य नहीं है। आज सबसे ज़रूरी है बांग्ला साहित्य की विश्वयात्रा को व्यापक और गतिशील बनाना, ताकि उसकी समृद्ध सृजनशीलता विश्व के पाठकों तक पहुँच सके। इसके लिए अनुवाद, प्रकाशन और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक संवाद को बढ़ावा देने वाले एक स्वस्थ, सक्रिय और उत्तरदायी सांस्कृतिक ढाँचे की आवश्यकता को स्वीकार करना ही होगा।

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इस स्तंभ में प्रस्तुत तथ्य/सूत्र-स्रोत के लिए यहाँ देखिए : https://www.nobelprize.org | अन्य C/O बंगाल यहाँ पढ़िए : C/O बंगाल

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