भौकाली ज़लज़ले से लैस मास्टर, मास्टरी और कोचिंग्स की दुनिया
धीरेंद्र धवल
18 जून 2026
भौतिक प्रदर्शन का दबाव इतना बढ़ता जा रहा है कि शिक्षक समुदाय भी उसके चपेट में है। माना जाता है कि समाज में शिक्षक समुदाय के सात्त्विक व्यवहार, वस्त्र-विन्यास और जीवन-मूल्यों का बड़ा असर होता है; लेकिन तरह-तरह की दुहाई और सच-झूठ के आवरण में इस दौर के ख़ासकर हिंदी-पट्टी के तमाम टीचर्स के तथाकथित भौकाल का ज़लज़ला बढ़ता ही जा रहा है।
पहले बात कोचिंग-गुरुओं की ही करते हैं। हाल ही में कोचिंग-गुरुओं के ऊपर पर एक मीडिया-हाउस के एंकर द्वारा बड़ा ही करारा शाब्दिक हमला हुआ। दरअस्ल, मूल बात मीडिया के हमले की नहीं है, बात यह है कि कोचिंग-गुरुओं के यहाँ बड़ी-बड़ी काली-काली गाड़ियाँ, काली ड्रेस वाले गार्ड्स और रायफ़ल, बंदूक़, गोली बड़ी आम बात होती जा रही है। सवाल यह है कि शिक्षकों के यहाँ इस तरह के अशोभनीय दृश्यों की बारंबारता बढ़ती कैसे गई? बढ़ती ही जा रही है।
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से कोचिंग का उभार बड़ी तेज़ी से हुआ था। नई आर्थिक नीतियाँ आकार ले रहीं थीं। निजीकरण के दबाव और प्रभाव से भारी-भरकम फ़ीस वाले तमाम निजी संस्थान खुलने लगे। हिंदी-प्रदेशों में भी अँग्रेज़ी का बोलबाला बढ़ने लगा। कारण था कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों में BCA/ MCA/ BBA/ MBA/ B.TECH/ M.TECH जैसे पाठ्यक्रमों की माँग बढ़ने लगी। प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा में CSAT जोड़ दिया गया। इन सब वजहों से कोचिंग-व्यवसाय का उदय व्यापक स्तर पर हुआ। तमाम सरकारी शिक्षक भी कोचिंग-संस्थानों का धड़ाधड़ हिस्सा होने लगे। उनके अपने निजी कॉलेज खुलने लगे। इस व्यवसाय में बढ़ते मुनाफ़े से तमाम कोचिंग-टीचर्स एवं सरकारी स्कूलों के भी कई शिक्षक एवं कॉलेज प्राध्यापक भी चमकती-दमकती एक नई ही दुनिया में उड़ने लगे। जहाँ अकूत धन हासिल कर लेने का अवसर मिला, फिर उसी पैसे का ख़ूब भौंडा प्रदर्शन भी होने लगा।
प्रतियोगी परीक्षाओं का गढ़ समझे जाने वाले इलाहाबाद में इक्कीसवीं सदी के पहले और दूसरे दशक में कोचिंग और कोचिंग-गुरुओं के भौकाल की यात्रा से जुड़ा हुआ एक छोटा-सा संस्मरण यहाँ साझा कर रहा हूँ। संभवतः साल 2004 से 2014 तक इलाहाबाद के कोचिंग-व्यवसाय में छात्र-नेताओं का बड़ा दबदबा रहता था। दरअस्ल, जो प्रतियोगी विश्वविद्यालय के छात्र-नेताओं या हॉस्टल के किसी दबंग सीनियर के संपर्क में सीधे या किसी अन्य माध्यम से आते थे, उनके लिए कोचिंग की निर्धारित फ़ीस लगभग आधी हो जाती थी। कोचिंग वालों तक फ़ीस एक चौथाई पहुँचती थी, बहुत बार तो कुछ नहीं। (दबाव में कुछ नि:शुल्क जेनुइन मामले भी होते थे।) इसका ख़ामियाज़ा यह होता था कि बच्चे को या तो कोचिंग में पढ़ने नहीं दिया जाता था या कुछ दिन के बाद उन्हें ज़लील करके उन्हें कोचिंग के क्लासरूम से बाहर कर दिया जाता था। कोचिंग-फ़ीस की कमी-बेसी को लेकर छात्र-नेताओं या हॉस्टल्स के दबंग सीनियर के साथ कोचिंग वालों के साथ कई बार मारपीट की नौबत बन जाती थी। कई बार तो कोचिंग में ही भयंकर गाली-गलौज और मारपीट हो जाती थी।
शायद 2012-2013 का साल था। इलाहाबाद में रीजनिंग के लिए मशहूर हो चुके एक कोचिंग गुरु ने संयुक्त कोचिंग व्यवस्था से निकलकर अपना एक अलग ही कोचिंग संस्थान शुरू कर दिया। शहर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स, बैनर पोस्टर लगने शुरू हुए। अख़बारों में बड़ा-बड़ा विज्ञापन आने लगा। ज़ाहिर है कि वहाँ भी फ़ीस का लोचा बढ़ने लगा। एक दिन कोचिंग-गुरु ने फ़ीस के किचकिच में अपने निजी गार्ड्स एवं पोषित दबंग युवाओं से ही एक छात्रनेता पर करारा हमला बुलवा दिया। छात्रनेता घायल हो गए। उसके बाद प्रत्युत्तर में बड़ा वबाल हुआ। अब इस घटना के बाद कोचिंग गुरु ने दो-एक ही मज़बूत छात्र-नेताओं को अपने पाले में किया। उनकी ही कम फ़ीस वाली पर्ची को स्वीकार करने लगे।
ख़ैर, उस घटना के बाद से ही इलाहाबाद के तमाम कोचिंग-गुरुओं ने अपने प्राइवेट गार्ड्स रखने शुरू किए। फ़ीस को ऑनलाइन सिस्टम से जोड़ दिया। कोचिंग से होने वाली भरपूर कमाई से तमाम लक्जरी गाड़ियाँ निकलने लगी। तमाम कोचिंग-गुरुओं ने सोने के मोटे-मोटे सिक्कड़ पहनने शुरू कर दिए। वह शिक्षक के बजाय अपनी पहचान एक माफियाई ज़लज़ले से लैस रुतबे वाले मास्टर के तर्ज़ पर बनाने लगे।
दिल्ली के तमाम कोचिंग्स के प्रतिनिधि मजबूत धनगुरुओं का पूछना ही क्या! एक कोचिंग गुरु तो लोकतंत्र में राजा बनाने वाले गुरु के अवतार में सबको राजा बनाने के ही सूत्र समझाते घूमते हैं। उनके पास कॉपी, किताब के समांतर गोली, बम-बारूद की दुनिया के क़िस्से भी ज़ोर-शोर से होते हैं। अभी कुछ दिन पहले वह ‘आम आदमी’ के राजनीतिक गलियारे में थे, अब शायद उन्होंने योगधाम में कोचिंग-व्यवसाय की राह पकड़ी है। लोक सेवा आयोगों में हिंदी माध्यम को मज़बूत करने वाले एक सौम्य भाषा वाले गुरु जी का ज़लज़ला बढ़ता ही जा रहा है। हिंदी-प्रदेशों में उनकी भव्य कोचिंग्स की शृंखला रुक ही नहीं रही। कोचिंग के लुभावने विज्ञापनों में सिविल सर्वेंट्स की पूरी पलटन ही निकलती है। कमाल की बात यह है कि लगभग वही पलटन लगभग हर कोचिंग के पोस्टर पर दिखती है।
मौजूदा स्थिति यह है कि कोचिंग्स संस्थानों के IAS/ PCS/ PCS-J/ NEET/ IIT/ SSC/ रेलवे/ शिक्षक भर्ती/ दारोगा भर्ती/ सिपाही भर्ती सहित आदि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित लाखों-लाख के अख़बारी एवं डिजिटल विज्ञापनों से लाखों-लाख प्रतियोगी भ्रमित होते जा रहे हैं। वहाँ शहरी ख़ासकर देहाती दुनिया के प्रतियोगी अपनी भारी-भरकम जमापूँजी गँवा देते हैं। कोचिंग्स के पास अपनी स्क्रीनिंग व्यवस्था होती नहीं। हर बच्चा एक समान भाव से उनके यहाँ स्वीकार्य होता है, जो एक समान धन की आपूर्ति के साथ कोचिंग में प्रवेश लेने को आतुर होते हैं। आरक्षण फ़िल्म के कुछ संवाद भी यहाँ याद आ रहे हैं। उस फ़िल्म के मंत्री जी एक संवाद में प्राइवेट कॉलेज और कोचिंग के धंधे से प्रभावित होकर कहते हैं, “एजुकेशन के बड़ा कोई व्यवसाय नहीं। पेड सर्विस विदआउट गारंटी।”
कोचिंग गुरुओं के अलावा अब तो सरकारी शिक्षक भी ख़ासकर प्रोफ़ेसरान लोग सरकारी विभागों में निर्माण संबंधी कार्यों का ठेका लेने वाले A ग्रेड के ठेकेदारों वाली वेशभूषा को शौक से धारण कर रहे हैं। तमाम डिग्री कॉलेजों के प्राध्यापकों को तो छोड़ ही दिया जाए, अब तो कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के आचार्यगण (प्रोफ़ेसरान) भी अजीब-अजीब वेशभूषा और माहौल धारण किए घूम रहे हैं। वह अपने गले में राजनीतिक दलों के प्रतीक-चिह्नों को यथासंभव लटकाए हुए रहते हैं। झक् सफ़ेद कुर्ता-पैजामा पहने, गले में मोटे-मोटे सोने के सिक्कड़ डाले, प्रतिदिन महायान पर सवार होकर हट्टे-कट्टे लड़कों के साथ विभागों में प्रवेश करना उनका शौक़ है। राजपुरुषों के दरबार में हाज़िरी की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया पर गर्व से साझा करते हैं। वे इन सब कार्यों को अपने दबदबे-ज़लज़ले के रूप में देखते हैं। इन सब दृश्य-रूपों के दबाव का नतीजा यह होता है कि तमाम प्रोफ़ेसरान अपने को हीन समझने लगते हैं। वह अपनी छोटी गाड़ियों को ‘हीनयान’ समझकर और अपनी सीमित साहित्यिक-सामाजिक दुनिया को निरर्थक मानकर एहसास-ए-कमतरी का शिकार होते रहते हैं।
अच्छा-ख़ासा वेतन प्राप्त करने वाले अनेक टीचर्स/प्रोफ़ेसरान का एक और भी पहलू है। जबरदस्त लाभ-लोभ में निजी शिक्षण संस्थान और कोचिंग का व्यवसाय। ‘आरक्षण’ फ़िल्म में मिथिलेश सिंह एक ट्रस्ट कॉलेज के टीचर हैं। उस कॉलेज से अधिक वह अपने भाई के भारी-भरकम फ़ीस वाली कॉमर्शियल केके कोचिंग में भी जाकर पढ़ाते हैं। उस फ़िल्म के एक संवाद में आदर्शवादी शिक्षक के रूप में मौजूद डॉ. प्रभाकर आनंद ने मिथिलेश सिंह को जो कहा, वही आज के तमाम सरकारी वेतनभोगी शिक्षकों की भी कहानी बनती जा रही है। प्रभाकर आनंद कहते हैं, “आप जैसे टीचर जानबूझकर क्लास लेते नहीं और मुनाफ़े के लिए बच्चों को मजबूर करते हैं—प्राइवेट कमर्शियल कोचिंग के लिए।” एक अन्य संवाद में डॉ. प्रभाकर आनंद कहते हैं, “यह समानांतर व्यावसायिक शिक्षा-प्रणाली जो कोचिंग और कैपिटेशन पर आधारित है, जो तेज़ी से फैल रही है, सब कुछ बर्बाद कर देगी।”
इन परिस्थितियों और तथ्यों के आलोक में क्या यह समझा जाना चाहिए कि अब यह सब समाज के ज़िम्मेदार वर्ग के पतन का प्रतीक है या इसके अभाव में शिक्षक होना निरीह होना है या ऐसा न कर पाना कोई गुनाह है!
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