बौद्धिक परिसर या सामंती अखाड़े : डीयू में सिसकती नैतिकता और कल के प्रोफ़ेसर
शिवानी
03 नवम्बर 2026
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के नॉर्थ कैंपस की लाल ईंटों वाली इमारतें, कला संकाय (Arts Faculty) की सीढ़ियाँ और पटेल चेस्ट की नुक्कड़ वाली चाय की टपरियाँ—बाहर से देखने पर यह पूरी दुनिया प्रगतिशीलता, क्रांति और आधुनिकता की सबसे मुखर प्रयोगशाला नज़र आती है। यहाँ हवा में फ़ैज़ की नज़्में तैरती हैं, झोलों पर प्रतिरोध के बिल्ले टँगे होते हैं और हर दूसरी मेज़ पर ‘पितृसत्ता के विनाश’ तथा ‘जातिवाद के ख़ात्मे’ को लेकर गंभीर बहसें चलती हैं। लेकिन क्या यह तथाकथित बौद्धिक समाज सचमुच उतना ही आज़ाद और समतावादी है, जितना यह अपने पर्चों, पोस्टरों और सोशल मीडिया हैंडल्स पर दिखाई देता है?
सचाई इसके ठीक उलट और बेहद बदरंग है। इस चमकदार, अँग्रेज़ीदाँ और बौद्धिक लबादे के ठीक नीचे वही सामंती, जातिवादी और अवसरवादी सोच पल रही है, जो सदियों से हमारे समाज की रीढ़ रही है। आधुनिकता यहाँ कोई वैचारिक मूल्य नहीं, बल्कि अपनी आदिम कुंठाओं को छिपाने का एक सुविधाजनक ‘कवर’ बन चुकी है। क्लासरूम में कार्ल मार्क्स और आंबेडकर के सिद्धांतों पर सबसे ऊँची आवाज़ में बोलने वाले शोधार्थी और छात्र जब निजी जीवन, विवाह या रिश्तों की चौखट पर पहुँचते हैं, तो अपने ही सवर्ण दंभ, गोत्र और खानदानी प्रतिष्ठा के खोल में सिमट जाते हैं। किसी क़स्बाई या ग़ैर-सवर्ण पृष्ठभूमि से आने वाले साथी के श्रम, समय और भरोसे का इस्तेमाल अपनी पढ़ाई और अकेलेपन के लिए तो पूरी बेशर्मी से कर लिया जाता है, लेकिन सामाजिक स्वीकार्यता की बारी आते ही वही सामंती अहंकार दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। डीयू का माहौल आज इसी गहरे अंतर्विरोध के चौराहे पर खड़ा है—यहाँ किताबें तो आधुनिक हो गई हैं, लेकिन चेतना अब भी उसी सड़ी-गली मध्यकालीन मानसिकता में क़ैद है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की लाल दीवारों के साए में, आर्ट्स फ़ैकल्टी की सीढ़ियों से लेकर हॉस्टल तक, मैंने अनगिनत युवा आवाज़ों को सुना है। एक स्वतंत्र लेखिका और संवेदनशील प्रेक्षक के तौर पर जब अलग-अलग राज्यों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आई लड़कियाँ अपनी आपबीती साझा करती हैं, तो एक भयावह पैटर्न उभरता है, जो अकादमिक जगत के मुँह पर करारा तमाचा है। ज्ञान के इन परिसरों में रिश्तों का स्वरूप कई बार बौद्धिक और भावनात्मक अवसरवाद से कम नहीं रह जाता। विश्वविद्यालयों की शिक्षा यदि अपने ही परिसरों में घट रही इस मनोवैज्ञानिक और चारित्रिक हिंसा पर मौन रहे, तो वह चाटुकारिता से भिन्न नहीं।
हमारे विश्वविद्यालयों में बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं। स्त्रीवाद, सबाल्टर्न अध्ययन, एथिक्स और उत्तर-आधुनिकता पर पर्चे पढ़े जाते हैं। जेआरएफ़ निकालने और पीएचडी करने की होड़ में शामिल ये ‘होनहार’ लोग मंचों पर खड़े होकर आधी आबादी के अधिकारों पर भारी-भरकम व्याख्यान देते हैं। लेकिन यह दोहरा चरित्र केवल कमरों और सेमिनारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि चाय की टपरियों और ढाबों पर उसी लंपट ‘ब्रो-कोड’ के रूप में सार्वजनिक हो जाता है। माइक बंद होते ही, सिगरेट के खोखे पर खड़े होकर इनकी नज़रें कहाँ टिकती हैं? कैंपस से गुज़रती किसी छात्रा के कपड़ों, उसकी चाल-ढाल और उसकी देह पर फब्तियाँ कसते हुए आहें भरने में!
सोचकर रूह काँप उठती है कि आज जो लोग लाइब्रेरी की ठंडी रोशनी में बैठकर एथिक्स के नोट्स रट रहे हैं और बाहर आकर लड़कियों की देह और कपड़ों को अपनी घटिया हवस का पैमाना बना रहे हैं, कल जब वे इंटरव्यू पास करके किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में ‘प्रोफ़ेसर’ बनकर खड़े होंगे, तो क्या उनके सामने बैठी स्वतंत्र चेतना वाली नई पीढ़ी की छात्राएँ सुरक्षित रह पाएँगी? यह सवाल पूरे छात्र समुदाय या पुरुष वर्ग पर नहीं, बल्कि उस गिरोहबंद ‘ब्रो-कोड’ और पाखंडी सोच पर है, जो योग्यता की आड़ में स्त्री-विरोधी मानसिकता को पालती-पोसती है। परिसर में संवेदनशील और सच्चे साथी भी हैं, लेकिन जब ऐसा विकृत तबक़ा शिक्षक की कुर्सी की ओर बढ़ता है, तो चिंता पूरे समाज की बन जाती है। जो छात्र जीवन में स्त्री को सिर्फ़ उपभोग की वस्तु समझता रहा, उसके कपड़ों पर फब्तियाँ कसता रहा और जातिगत अहंकार में डूबा रहा, वह शिक्षक की गरिमामयी कुर्सी पर बैठकर छात्राओं को ज्ञान और संरक्षण की दृष्टि से देखेगा या उसी पुरानी हवस और शिकारी नज़रिए से?
यह तीखा सवाल विश्वविद्यालयों के नीति-नियंताओं, विभागाध्यक्षों और आदरणीय प्रोफ़ेसरों से है—आप कक्षाओं में दर्शन, इतिहास, व्याकरण और सिद्धांत तो ख़ूब पढ़ा रहे हैं, लेकिन बुनियादी नैतिकता, चरित्र और स्त्री के प्रति वास्तविक सम्मान का पाठ कब सिखाएँगे? अगर उच्च शिक्षा की बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ पाकर भी कोई छात्र जातिवादी सामंती मानसिकता और स्त्री-विरोधी व्यवहार से मुक्त नहीं हो पाता, तो आपकी इन डिग्रियों की क़ीमत रद्दी काग़ज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है। जब ज्ञान के परिसरों से मानवीय संवेदनशीलता और सत्यनिष्ठा विदा हो जाती है, तो वे विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि नैतिक लाशों के कारख़ाने बनकर रह जाते हैं।
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