बोलते नयन-नक़्श वाली
bolte nayan naqsh wali
कल रात सपने में
एक औरत देखी
जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था
पर मिलते ही लगा
कि इस बोलते नयन-नक़्श वाली औरत को
कहीं देखा भी हुआ है
हो न हो यह वही है
जो मेरी कल्पनाओं के बाग़ में
अक्सर आकर
फूलों-फलों से खेलती दिखती रही
जहाँ मिले थे
वह जगह बहुत नई थी—
मेरे लिए
पर बहुत हरी-भरी
फूलों से टहलते हुए
पता ही नहीं लगा
कब उसका घर आ गया
उसका घर भी
बोलते नयन-नक़्श वाली की तरह
बोल रहा था—
गिनती की सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ें
घर की सजावट भी थीं
और ज़रूरत भी
फ़ालतू चीज़ें घर में कहीं भी
न होने के कारण
घर खुला-खुला लग रहा था—
ख़ूबसूरत, दिलचस्प और सादा
अपनी तरह का एक ही
बिल्कुल अपनी घर वाली जैसा
जहाँ सादगी ख़ूबसूरती को बढ़ा रही थी
और ख़ूबसूरती सादगी को
अमीरी फ़कीरी दोनों उसके स्वभाव मे दिख रही हैं
वह कविता लिखती है
लिखकर हवा के हवाले कर देती है
रात बीत गई है
पर सपना नहीं बीता
वह अभी भी बोलने नयन-नक़्श वाली क साथ
कहीं चल रहा है...
- पुस्तक : अमृता के लिए नज़्म जारी है (पृष्ठ 68)
- रचनाकार : इमरोज़
- प्रकाशन : हिंद पॉकेट बुक्स
- संस्करण : 2008
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