मुबारक की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 14
गोरे मुख पर तिल लसे ताहि करौ परनाम।
मानहु चंद बिछाइकै बैठे सालिगराम॥
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गोरे मुख पर तिल लसत मेटत है दुख द्वंद।
मानहु बेटा भानु को रह्यो गोद लै चंद॥
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तिय निहात जल अलक ते, चुवत नयन की कोर।
मनु खंजन मुख देत अहि, अमृत पोंछि निचोर॥
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विधि कपोल टिकिया करी, तहँ तिल धरो बनाय।
यह मन छधित फकीर ज्यों, रहैं टकटकी लाय॥
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छूटो चंदन भाल तें, अलक ऊपर छबि देत।
डसी उलटि मनु नागिनी उदर बिराजत सेत॥
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