सन् 1876-77 के भीषण अकाल में—जब मैं केवल सोलह वर्ष का बालक था—मुझे पहले-पहल यह मालूम हुआ कि हमारे देशवासी अन्य देशों में बसने के लिए जाते या ले जाए जाते हैं। उसी समय मैंने आरकाटियों और एजेंटों को देखा, जो हृष्ट-पुष्ट मज़बूत मई-औरतों को भरती करके नेटाल और मारीशस भेजते थे। मुझे भी उन्होंने 50) रुपया मासिक की क्लर्की का लालच दिया था, परंतु मैं अपनी वृद्ध माता के विचार से उनके जाल में न फँस सका। तभी से मैं प्रवासियों की बातों में दिलचस्पी रखता हूँ। मैं अकसर सुनता था कि भोलेभाले नवयुवक पुरुष-स्त्रियों को आरकाटी लोगों ने किस तरह बहकाकर लंका, मलाया, नेटाल और मारीशस आदि को चालान कर दिया है।
भारतीय नेशनल कांग्रेस के सम्मुख प्रवासी भारतीयों का प्रश्न सबसे पहले मद्रास कांग्रेस में उठा था। उस समय मि. एल्फ्रेड वेब—कांग्रेस के सभापति—ने गूटी-पीपुल्स ऐसोसियेशन के, जिसका मैं मंत्री था, कहने पर, नेटाक्ष में भारतीयों के म्यूनिसिपल अधिकार छिन जाने पर प्रतिवाद किया था। तब से प्रवासियों के प्रश्न पर बराबर लोगों का ध्यान बढ़ता गया, और गांधाजी के दक्षिण अफ़्रीका के सत्याग्रह-संग्राम के समय से तो वह बड़ा महत्त्वपूर्ण हो गया है। जब से में मद्रास-कौंसिल में गया, तब से मैं अपनी क्षुद्र शक्ति के अनुसार बराबर प्रवासी भाइयों की सेवा करता रहा।
औपनिवेशिक सरकारों ने कुलियों को बहकाकर इकट्टा रखने के लिए जो डिपो खोल रखे थे, उनमें भारतीय पुलिस तक को बिना इजाज़त जाने की मुमानियत थी। मैंने इसे दूर करने की कौंसिल में बढ़ी कोशिश की, परंतु वह बेकार हुई।
भारत के गोरे प्लैन्टरों के फ़ायदे के लिए जो क़ानून बना था, उसमें काम छोड़कर चले आने वाले मज़दूरों के लिए सज़ा का विधान था। मैंने उसके विरुद्ध भी बहुत आंदोलन किया। इसी बीच में लंका की भारतीय कांफ़्रेंस का सभापति बनकर लंका गया। वहाँ मुझे भारतीय मज़दूरों की दुर्दशा प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिला। वहाँ उनकी हालत देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैंने मद्रास-कौंसिल में उनके संबंध में बीसियों प्रश्न किए। देश में भी इस विषय पर ज़ोरदार आंदोलन हुआ, जिसका फल यह हुआ कि अब लंका, मलाया आदि में सरकार ने एजेंट और प्रवासियों के रक्षक (Protectors of Emigrants) नियत कर दिए हैं। फिर गांधीजी तथा स्वर्गीय गोखले और मि. ऐण्ड्रूज़ के ज़ोरदार आंदोलन से शर्तबंदी कुली-प्रथा उठा दी गई।
कुली-प्रथाकी बंदी से ब्रिटिश-गायना और फिजी के प्लैंटरों का बहुत नुक़सान हुआ। प्रवासियों को बुलाने के लिए वहाँ से डेपूटेशन आए और उन्होंने प्रवासियों के लिए बड़ी अच्छी शर्तें पेश कीं। इस पर भारत-सरकार ने ब्रिटिश-गायना और फिजी को डेपूटेशन भेजने का विचार किया। ब्रिटिश-गायना के डेपूटेशन में जाने के लिए मद्रास-सरकार के ला-मेंबर ने मुझसे कहा। मैं जाने के लिए राज़ी हो गया। उस समय तक मेरे लिए ब्रिटिश-गायना, जमै का, ट्रिनीडाड आदि केवल भौगोलिक नाम थे। मुझे केवल यह ज्ञान था कि इन स्थानों में भारतीय कुली बनाकर भेजे गए थे। मैं 69 वर्ष का वृद्ध पुरुष था, इसलिए मैं अपने साथ अपने पुत्र श्री गोविंदाराज को भी ले गया था। मैं ही इस डेपुटेशन का सभापति नियुक्त हुआ था।
डेपूटेरान यहाँ से रवाना होकर फ़्रांस होता हुआ इंग्लैंड पहुँचा। जाड़े के दिन थे। इंग्लैंड में बड़ी सर्दी पड़ती थी। वहाँ पहुँचकर मैं बीमार पड़ गया और तीन सप्ताह तक बीमार रहा। अच्छा होने पर मैंने तत्कालीन भारत मंत्री मि. मांटेग्यूस से भेंट की। उन्होंने कहा कि डेपुटेशन को निष्पक्ष होकर अपनी खरी-खरी रॉय देनी चाहिए। यहाँ मुझे श्रीयुत पोलक से भी बड़ी सहायता मिली।
इंग्लैंड में डेयूटेशन के अन्य सदस्य श्री वेंकटेशनारायण तिवारी और मि. जी. एफ. कीटिंग मिले। उन्होंने कमज़ोर दशा देखकर भारत लौट जाने की सलाह दी, लेकिन मैं राज़ी नहीं हुआ और 19 जनवरी सन् 1922 को हम सब ब्रिटिश-गायना के लिए रवाना हुए।
तूफ़ानी समुद्र होने के कारण जहाज़ पर हम सबको बड़ा कष्ट हुआ। अंत में 6 फ़रवरी को बारवेडोज़ द्वीप पहुँचने पर कुछ जान-में-जन आई। एक दिन यहाँ रहकर हम लोग आठवीं फ़रवरी को ग्रेनाडा पहुँचे। वहाँ से रात-भर समुद्र-यात्रा करके ट्रिनीडाड के बंदरगाह पहुँच गए। वहाँ रेवरेयड सी. डी. लाला, एम. एल. सी. ने हम लोगों का स्वागत किया। हम लोग जहाज़ पर चढ़े-चढ़े तंग आ गए थे, परंतु रेवरेयड सी. डी. लाला के मकान पर उनकी धर्म-पत्नी, लड़कियों और पिता ने हमारा जो स्वागत किया, उससे हमें बड़ी शक्ति मिली। लाला महाशय के पिता उस समय 104 वर्ष के थे। वे श्रीकृष्ण और भागवत पुराण पर हिंदी में ख़ूब बातें किया करते थे। यहाँ इम लोगों को हफ़्तों के बाद श्रीमती लाला ने बड़े प्रेम से भारतीय भोजन कराया। यहाँ से दूसरे दिन हम लोग फिर चले, और 12 फ़रवरी को ब्रिटिश गायना की राजधानी जार्जटाउन में पहुँच गए। यहाँ हमारे देश-वासियों ने बड़े उत्साह और प्रेम से हमारा स्वागत किया। एक दिन टाउन-हॉल में हम लोगों का सार्वजनिक स्वागत हुआ, जिसमें यहाँ के गवर्नर, उच्च अधिकारी और उपनिवेश-भर के भारतीयों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
गायना के तत्कालीन गवर्नर घर विश्वफ्रेड कालेट बड़े नम्र सज्जन थे, परंतु साथ ही ये पक्के बनिये भी थे। हम लोगों के गायना पहुँचने के दूसरे ही दिन उन्होंने हम लोगों को चाय पीने का निमंत्रण दिया। जब हम लोग गवर्मेंट-हाउस की सीढ़ियों पर पहुँचे, तो उन्होंने स्वयं आकर हमारा स्वागत किया तथा कमरे में ले जाकर हमें बिठलाया। उस समय उनका कोई शरीर-रक्षक भी उपस्थित नहीं था। उन्होंने स्वयं चाय उँडेलकर हम लोगों को दी और अपनी नम्रता से सबको बहुत प्रसन्न किया।
कुछ दिन बाद हम लोग कौंसिल हॉल में एकत्रित हुए और हमारे डेपूटेशन के विषय पर वाद-विवाद प्रारंभ हुआ। इस अवसर पर गवर्नर महोदय सभापति थे। उन्होंने प्रवासियों के विषय की योजना उपस्थित की। मगर यह योजना उस योजना से एकदम भिन्न थी, जो आनरेबुल मि. लक्खू और नूनन के डेपुटेशन ने—जो भारत गया था—पेश की थी। पूछने पर गवर्नर ने कहा कि मि. लक्खू की योजना गायना-सरकार से स्वीकृत नहीं थी।
तब हम लोगों ने अपनी जाँच आरंभ की। हम लोगों ने मज़दूरों के बास-स्थान देखे, भारतीयों के प्रतिनिधियों से बातचीत की, शकर की स्टेटों पर घूमे तथा सरकारी और ग़ैर-सरकारी लोगों की गवाहियाँ लीं। इन सब बातों में हमें यहाँ की सरकार से पूरी सहायता मिली।
7 अप्रैल को हम लोग फिर जहाज़ पर चले और ट्रिनीडाड आए। यहाँ भी हमारे देशवासियों ने पोर्ट ऑफ़ स्पेन के कौंसिल-भवन में हमारा सार्वजनिक स्वागत किया। यहाँ के गवर्नर उसके सभापति थे। हम लोगों को अभिनंदन पत्र भी दिया गया, जिसका मैंने उत्तर दिया।
अब हम लोगों ने जाँच शुरू की। मि. कीटिंग ने द्वीप के एक ओर जाँच आरंभ की और मैंने तथा श्री तिवारीजी ने द्वीप के दूसरी ओर, अपने देश-भाइयों और प्रोटेक्टर ऑफ़ इमीग्रांट की सहायता से जाँच-पड़ताल शुरू की। यहाँ से हम लोग 17 अप्रैल को रवाना हुए। मि. कीटिंग सीधे लंदन चले गए और हम लोग न्यूयार्क होकर लंदन गए।
लंदन में हम लोग फिर एकट्ठे हुए और आपस में वाद-विवाद करके हम लोगों ने अपनी रिपोर्ट तैयार की। मि. कीटिंग के कुछ विचार हम लोगों के विचारों से एकदम भिन्न थे। अतः उन्होंने अपनी रिपोर्ट अलग दी, और मैंने और पंडित वेंकटेशनारायण तिवारी ने अपनी सम्मिलित रिपोर्ट अलग लिखी। इन दोनों रिपोर्टों को भाग्य-सरकार ने दो भागों में प्रकाशित किया है।
ब्रिटिश-गायना में कई भारतीय जैसे मि. जे. ए. लक्खू, डॉक्टर ह्वारटव, मि. वीर स्वामी, और मि. श्रीराम आदि—बैरिस्टर, डॉक्टर और मैज़िस्ट्रेट आदि के उच्च पदों पर हैं। इन लोगों ने अनेकों कठिनाइयों को अतिक्रम करके समाज में उच्च स्थान प्राप्त किए हैं। बहुत से हिंदू, मुसलमान भी, जो यहाँ प्रवासी बनकर आए थे, आज अपनी मेहनत से धनी और संपत्तिशाली बन गए हैं। यहाँ 96,000 हिंदू, 18,000 मुसलमान, 11,000 भारतीय ईसाई और 244 पारसी हैं। यहाँ हिंदुओं के मंदिर और मुसलमानों की मस्जिदें हैं। यहाँ युक्तप्रांत-वासियों और मदरासियों में आपस में शादी-विवाह हो जाते हैं। यहाँ जात-पांत का विशेष बंधन नहीं है और न खानपान ही का कोई विचार है।
ट्रिनीडाड में हम लोग बड़े आनंद से रहे। रेवेरेराड लालाजी ने हमें घुमाया तथा हमें भारतीय मज़दूरों और किसानों से मिलने की सुविधा दी। हमने मि. सोब्रियन के घर की, जो एक सफल कोकोआ बनाने वाले भारतीय हैं, यात्रा भी की। मि. सिनानन ने, जो एक बड़े भारतीय व्यापारी हैं, हम लोगों को एक गार्डन-पार्टी दी, जिसमें हमें यहाँ के शिक्षित भारतीयों से मिलने का अवसर मिला। वहाँ के कॉलेज में यहाँ के मेयर की अध्यक्षता में भी एक सभा हुई, जिसमें श्रीयुत तिवारीजी ने भारतीय संस्कृति पर और मैंने अशोक और हरिश्चंद्र पर व्याख्यान दिए। यहाँ से चलते समय का दृश्य भी बड़ा करुणाजनक था और हमारे मित्र रैवरेंड लाला के तो आँसू झरने लगे थे।
सन् 1927 में मि. सोब्रियन का एक पत्र मुझे मिला था, उसमें उन्होंने लिखा था—कल मैंने आपको पोर्ट ऑफ़ स्पेन गैज़ेट की एक कॉपी भेजी है। उसमें एक तार से मालूम होता है कि शायद कुँवर महाराज सिंह दक्षिण अफ़्रीका में भारत के एजेंट या कौंसिल नियत होंगे। आप नेता लोग इस बात की कोशिश क्यों नहीं करते कि प्रत्येक देश में जहाँ भारतीय बसे हों एक-एक कौंसिल नियत किया जाए?
हम लोगों ने यही शिफ़ारिश की थी कि प्रत्येक उपनिवेश में भारत-सरकार का एक प्रतिनिधि रहना चाहिए। भारत से गए हुए प्रवासियों की संतानें अधिक साहसी और उदार होती है, अतः उनके संसर्ग और सहयोग से मातृभूमि का भी हित होगा।
san 1876 77 ke bhishan akal men—jab main keval solah varsh ka balak tha—mujhe pahle pahal ye malum hua ki hamare deshavasi anya deshon mein basne ke liye jate ya le jate hain. usi samay mainne bharkatiyon aur ejenton ko dekha, jo hrisht pusht mazbut mai aurton ko bharti karke nethal aur marishas bhejte the. mujhe bhi unhonne 50) rupya masik ki karki ka lalach diya tha, parantu main apni vriddha mata ke vichar se unke jaal mein na phans saka. tabhi se main prvasiyon ki baton mein dilchaspi rakhta hoon. main aksar sunta tha ki bholebhale navyuvak purush striyon ko arkati logon ne kis tarah bahkakar lanka, malaya, netal aur marishas aadi ko chalan kar diya hai.
bharatiy neshnal kangres ke sammukh pravasi bhartiyon ka parashn sabse pahle madras kangres mein utha tha. us samay mi० elphreD veb—kangres ke sabhapati—ne guti pipuls aisosiyeshan ke, jiska main mantri tha, kahne par, netaksh mein bhartiyon ke myunisipal adhikar chhin jane par prativad kiya tha. tabse prvasiyon ke parashn par barabar logon ka dhyaan baDhta gaya, aur gandhaji ke dakshin afrika ke satyagrah sangram ke samay se to wo baDa mahattvpurn ho gaya hai. jabse mein mashas kaunsil mein gaya, tab se main apni khud shakti ke anusar barabar pravasi bhaiyon ki seva karta raha.
aupaniveshik sarkaron ne kuliyon ko bahkakar ikatta rakhne ke liye jo Dipo khol rakhe the, unmen bharatiy pulis tak ko bina ijazat jane ki mumaniyat thi. mainne ise door karne ki kaunsil mein baDhi koshish ki, parantu wo bekar hui.
bharat ke gore plaintaraki fayde ke liye jo qanun bana tha, usmen kaam chhoDkar chale aane vale mazduron ke liye saza ka vidhan tha. mainne uske viruddh bhi bahut andolan kiya.
isi beech mein lanka ki bharatiy kamfrens ka sabhapati bankar lanka gaya. vahan mujhe bharatiy mazduron ki durdasha pratyaksh dekhne ka avsar mila. vahan unki haalat dekhkar mujhe baDa duःkha hua. mainne madras kaunsil mein unke sambandh mein bisiyon parashn kiye. desh mein bhi is vishay par zordar andolan hua, jiska phal ye hua ki ab lanka, malaya aadi mai sarkar ne ejent aur prvasiyon ke rakshak (protectors of emigrants) niyat kar diye hain. phir gandhiji tatha svargiy gokhale aur mi० airaDra ke zordar andolan se shartbandi kuli pratha utha di gai.
kuli prthaki bandi se british gayna aur phiji ke laintron ka bahut nuqsan hua. prvasiyon ko bulane ke liye vahan se Deputeshan bhaye aur unhonne prvasiyon ke liye baDi achchhi sharten pesh keen. ispar bharat sarkar ne british gayna aur phiji ko Deputeshan bhejneka vichar kiya. british gayna ke Deputeshan mein jane ke liye madras sarkar ke la membar ne mujhse kaha. main jane ke liye razi ho gaya. us samay tak mere liye british gayna, jamai ka, triniDaD aadi keval bhaugolik naam the. mujhe keval ye gyaan tha ki in sthanon mein bharatiy kuli banakar bheje ge the. main hai 1 varsh ka vriddh purush tha, isliye main apne saath apne putr shri govindaraj ko bhi ke gaya tha. main hi is Deputeshan ka sabhapati niyukt hua tha.
Deputeran yahan se ravana hokar phraans hota hushbha inglainD pahuncha. jaDe ke din the. inglainD baDi sardi paDti thi. vahan pahunchakar main bimar paD gaya aur teen saptah tak bimar raha. achchha hone par mainne tatkalin bharat mantri mi० matigyuse bhent ki. unhonne kaha ki Deputeshan ko nishpaksh hokar apni khari khari rauy deni chahiye. yahan mujhe shriyut polak se bhi baDi sahayata mili.
inglainD mein Deyuteshan ke anya sadasya shri bainkteshnarayan tivari aur mi० jee० eph० kiting mile. unhonne kamzor dasha dekhkar bharat laut jane ki salah di, lekin main razi nahin hua aur 19 janavri san 1922 ko hum sab british gayna ke liye ravana hue.
tufani samudr hone ke karan jahaz par hum sabko baDa kasht hua. ant mein 6 faravri ko barveDoz dveep pahunchne par kuch jaan men jan aai. ek din yahan rahkar hum log athvin faravri ko grenaDa pahunche. vahan se raat bhar samudr yaka karke triniDaD ke bandargah pahunch ge. vahan revreyaD see० Dee० lala, em० el० see० ne hum logon ka. svagat kiya. hum log jahaz par baDe baDe tang aa ge the, parantu revreyaD saan Di lala ke makan par unki charm patni, laDakiyon aur pita ne hamara jo svagat kiya, usse hamein baDi shakti mili. lala mahashay ke pita us samay 104 varsh ke the. ve shrikrishn aur bhagvat puran par hindi mein khoob baten kiya karte the. yahan im logon ko hafton ki baad shrimti lala ne baDe prem se bharatiy bhojan karaya. yahan se dusre din hum log phir chakhe, aur 12 faravri ko british gayna ki rajdhani jarjtaun mein pahunch ge. yahan hamare deshvasiyon ne baDe utsaah aur prem se hamara svagat kiya. ek din taun haul mein hum logon ka sarvajnik sthagat hua, jismen mahon ke gavarnar, uchch adhikari aur upnivesh bhar ke bhartiyon ke pratinidhi upasthit the.
gayna ke tatkalin gavarnar ghar vishvaphreD kalet baDe nam sajjan the, parantu saath hi ye pakke baniye bhi the. hum logon ke gayna pahunchne ke dusre hi din unhonne hum logon ko chaay pineka nimantran diya. jab hum log gavarment haas ki siDhiyon par pahunche, to unhonne svayan bhakar hamara svagat kiya tatha kamre mein le jakar hamein bithlaya. us samay unka koi sharir rakshak bhi upasthit nahin tha. unhonne svayan chaay unkelakar hum logon ko di aur apni namrata se sabko bahut prasann kiya.
kuch din baad hum log kaunsil haul mein ekatrit hue aur hamare Deputeshan ke vishay par vaad vivad prarambh hua. is avsar par gavarnar mahoday sabhapati the. unhonne prvasiyon ke vishay ki yojna upasthit ki. magar ye yojna us yojna se ekdam bhinn thi, jo anrebul mi० lakkh aur nunan ke Deputeshan ne—jo bharat gaya tha—pesh ki thi. puchhne par gavarnar ne kaha ki mi० lakkhu ki yojna gayna sarkar se svikrit nahin thi.
tab hum logon ne apni anch arambh ki. hum logon ne mazduron ke baas sthaan dekhe, bhartiyon ke pratinidhiyon se batachit ki, shakar ki steton par ghume tatha sarkari aur ghair sarkari logon ki gavahiyan leen. in sab baton mein hamein yahan ki sarkar se puri sahayata mili.
7 april ko hum log phir jahaz par chale aur triniDaD aaye. yahan bhi hamare deshvasiyon ne port auf spen ke kaunsil bhavan mein hamara sarvajnik svagat kiya. yahan ke gavarnar uske sabhapati the. hum logon ko abhinandan patr bhi diya gaya, jiska mainne uttar diya.
ab hum logon ne jaanch shuru ki. mi० kiting ne dveep ke ek or anch arambh ki aur mainne tatha shri tivariji ne dveep ke dusri or, apne desh bhaiyon aur protektar auf imigrant ki sahaytase jaanch paDtal shuru ki. yahan se hum log 17 april ko ravana hue. mi० kiting sidhe landan chale ge aur hum log nyuyark hokar landan ge.
landan mein hum log phir ekatte hue aur aapas mein vaad vivad karke hum logon ne apni riport tayyar ki. mi० kiting ke kuch vichar hum logon ke vicharon se ekdam bhinn the. atः unhonne apni riport alag di, aur mainne bhaur panDit venkteshnarayan tivari ne apni sammilit riport alag likhi. in donon riporto ko bhagya sarkar ne do bhagon mein prakashit kiya hai.
british gayna mein kai bharatiy jaise mi० je० e० lakkhu, Dauktar hartan, mi० beer svami, aur mi० shriram adi—bairistar, Dauktar aur maizistret aadi ke uchch padon par hain. in logon ne anekon kathinaiyon ko atikram karke samaj mein uth sthaan praapt kiye hain. bahutse hindu, musalman bhi, jo yahan pravasi bankar aaye the, aaj apni mehnat se dhani aur sampattishali ban ge hain. yahan 99,000 hindu, 18,000 musalman, 11,000 bharatiy iisai aur 244 parsi hain. yahan hinduon ke mandir aur musalmanon ki masjiden hain. yahan yuktaprant vasiyon aur madrasiyon mein aapas mein shadi vivah ho jate hain. yahan jaat paant ka vishesh bandhan nahin hai aur na khanpan hi ka koi vichar hai.
triniDaD mein hum log baDe anand se rahe. revereraD lalaji ne hamein ghumaya tatha hamein bharatiy mazduron aur kisanon se milne ki suvidha di. hamne mi० sobriyan ke ghar ki, jo ek saphal kokoa banane vale bharatiy hain, yatra bhi thi. mi० sinanan ne, jo ek baDe bharatiy vyapari hain, hum logon ko ek garDan parti di, jismen hamein yahan ke shikshit bhartiyon se milne ka avsar mila. vahan ke kaulej mein yahan ke meyar ki adhyakshata mein bhi ek sabha hui, jismen shriyut tivariji ne bharatiy sanskriti par aur mainne ashok aur harishchandr par vyakhyan diye. yahan se chalte samay ka drishya bhi baDa karunajnak tha aur hamare mitr raivrenD lala ke to ansu jharne lage the.
san 1927 mein mi० sobriyan ka ek patr mujhe mila tha, usmen unhonne likha tha—kal mainne aapko port auf spen gaizet ki ek kaupi bheji hai. usmen ek taar se malum hota hai ki shayad kunvar maharaj sinh dakshin afrika mein bharat ke ejent ya kaunsil niyat honge. aap neta log is baat ki koshish kyon nahin karte ki pratyek desh mein jahan bharatiy base hon ek ek kaunsil niyat kiya jaye?
hum logon ne hum yahi shifarish ki thi ki pratyek upnivesh mein bharat sarkar ka ek pratinidhi rahna chahiye. bharat se ge hue prvasiyon ki santanen adhik sahasi aur udaar hoti hai, atः unke sansge aur sahyog se matribhumika bhi hit hoga.
san 1876 77 ke bhishan akal men—jab main keval solah varsh ka balak tha—mujhe pahle pahal ye malum hua ki hamare deshavasi anya deshon mein basne ke liye jate ya le jate hain. usi samay mainne bharkatiyon aur ejenton ko dekha, jo hrisht pusht mazbut mai aurton ko bharti karke nethal aur marishas bhejte the. mujhe bhi unhonne 50) rupya masik ki karki ka lalach diya tha, parantu main apni vriddha mata ke vichar se unke jaal mein na phans saka. tabhi se main prvasiyon ki baton mein dilchaspi rakhta hoon. main aksar sunta tha ki bholebhale navyuvak purush striyon ko arkati logon ne kis tarah bahkakar lanka, malaya, netal aur marishas aadi ko chalan kar diya hai.
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kuli prthaki bandi se british gayna aur phiji ke laintron ka bahut nuqsan hua. prvasiyon ko bulane ke liye vahan se Deputeshan bhaye aur unhonne prvasiyon ke liye baDi achchhi sharten pesh keen. ispar bharat sarkar ne british gayna aur phiji ko Deputeshan bhejneka vichar kiya. british gayna ke Deputeshan mein jane ke liye madras sarkar ke la membar ne mujhse kaha. main jane ke liye razi ho gaya. us samay tak mere liye british gayna, jamai ka, triniDaD aadi keval bhaugolik naam the. mujhe keval ye gyaan tha ki in sthanon mein bharatiy kuli banakar bheje ge the. main hai 1 varsh ka vriddh purush tha, isliye main apne saath apne putr shri govindaraj ko bhi ke gaya tha. main hi is Deputeshan ka sabhapati niyukt hua tha.
Deputeran yahan se ravana hokar phraans hota hushbha inglainD pahuncha. jaDe ke din the. inglainD baDi sardi paDti thi. vahan pahunchakar main bimar paD gaya aur teen saptah tak bimar raha. achchha hone par mainne tatkalin bharat mantri mi० matigyuse bhent ki. unhonne kaha ki Deputeshan ko nishpaksh hokar apni khari khari rauy deni chahiye. yahan mujhe shriyut polak se bhi baDi sahayata mili.
inglainD mein Deyuteshan ke anya sadasya shri bainkteshnarayan tivari aur mi० jee० eph० kiting mile. unhonne kamzor dasha dekhkar bharat laut jane ki salah di, lekin main razi nahin hua aur 19 janavri san 1922 ko hum sab british gayna ke liye ravana hue.
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tab hum logon ne apni anch arambh ki. hum logon ne mazduron ke baas sthaan dekhe, bhartiyon ke pratinidhiyon se batachit ki, shakar ki steton par ghume tatha sarkari aur ghair sarkari logon ki gavahiyan leen. in sab baton mein hamein yahan ki sarkar se puri sahayata mili.
7 april ko hum log phir jahaz par chale aur triniDaD aaye. yahan bhi hamare deshvasiyon ne port auf spen ke kaunsil bhavan mein hamara sarvajnik svagat kiya. yahan ke gavarnar uske sabhapati the. hum logon ko abhinandan patr bhi diya gaya, jiska mainne uttar diya.
ab hum logon ne jaanch shuru ki. mi० kiting ne dveep ke ek or anch arambh ki aur mainne tatha shri tivariji ne dveep ke dusri or, apne desh bhaiyon aur protektar auf imigrant ki sahaytase jaanch paDtal shuru ki. yahan se hum log 17 april ko ravana hue. mi० kiting sidhe landan chale ge aur hum log nyuyark hokar landan ge.
landan mein hum log phir ekatte hue aur aapas mein vaad vivad karke hum logon ne apni riport tayyar ki. mi० kiting ke kuch vichar hum logon ke vicharon se ekdam bhinn the. atः unhonne apni riport alag di, aur mainne bhaur panDit venkteshnarayan tivari ne apni sammilit riport alag likhi. in donon riporto ko bhagya sarkar ne do bhagon mein prakashit kiya hai.
british gayna mein kai bharatiy jaise mi० je० e० lakkhu, Dauktar hartan, mi० beer svami, aur mi० shriram adi—bairistar, Dauktar aur maizistret aadi ke uchch padon par hain. in logon ne anekon kathinaiyon ko atikram karke samaj mein uth sthaan praapt kiye hain. bahutse hindu, musalman bhi, jo yahan pravasi bankar aaye the, aaj apni mehnat se dhani aur sampattishali ban ge hain. yahan 99,000 hindu, 18,000 musalman, 11,000 bharatiy iisai aur 244 parsi hain. yahan hinduon ke mandir aur musalmanon ki masjiden hain. yahan yuktaprant vasiyon aur madrasiyon mein aapas mein shadi vivah ho jate hain. yahan jaat paant ka vishesh bandhan nahin hai aur na khanpan hi ka koi vichar hai.
triniDaD mein hum log baDe anand se rahe. revereraD lalaji ne hamein ghumaya tatha hamein bharatiy mazduron aur kisanon se milne ki suvidha di. hamne mi० sobriyan ke ghar ki, jo ek saphal kokoa banane vale bharatiy hain, yatra bhi thi. mi० sinanan ne, jo ek baDe bharatiy vyapari hain, hum logon ko ek garDan parti di, jismen hamein yahan ke shikshit bhartiyon se milne ka avsar mila. vahan ke kaulej mein yahan ke meyar ki adhyakshata mein bhi ek sabha hui, jismen shriyut tivariji ne bharatiy sanskriti par aur mainne ashok aur harishchandr par vyakhyan diye. yahan se chalte samay ka drishya bhi baDa karunajnak tha aur hamare mitr raivrenD lala ke to ansu jharne lage the.
san 1927 mein mi० sobriyan ka ek patr mujhe mila tha, usmen unhonne likha tha—kal mainne aapko port auf spen gaizet ki ek kaupi bheji hai. usmen ek taar se malum hota hai ki shayad kunvar maharaj sinh dakshin afrika mein bharat ke ejent ya kaunsil niyat honge. aap neta log is baat ki koshish kyon nahin karte ki pratyek desh mein jahan bharatiy base hon ek ek kaunsil niyat kiya jaye?
hum logon ne hum yahi shifarish ki thi ki pratyek upnivesh mein bharat sarkar ka ek pratinidhi rahna chahiye. bharat se ge hue prvasiyon ki santanen adhik sahasi aur udaar hoti hai, atः unke sansge aur sahyog se matribhumika bhi hit hoga.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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