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चौधरी बिहारीलाल

chaudhari biharilal

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

चौधरी बिहारीलाल

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

और अधिककन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर

    तुम कन्हैयालाल हो?

    जी हाँ।

    तो मैं बिहारीलाल हूँ मेरे दोस्त!

    चेहरा अनजाना-अनपहचाना, तो नाम अनसुना-सा, पर व्यवहार लंगोटिए यार का। यह है कौन? मैंने सोचा और तब देखा ग़ौर से उनकी तरफ़—रंग गाढ़ा-पक्का, आँखें बड़ी-बड़ी चंचल, बिना हँसे भी हँस पड़ते-से होंठ, पान की लाली से रचे मसूड़े और दाँत, लंबी छरहरी देह और बिना रूप के भी एक रूपवान व्यक्तित्व; स्वादी के वेश से झकाझक एक लीडरनुमा इंसान यह।

    चाय आई, बातें चली, जाना—आप है देहरादून निवासी चौधरी बिहारीलाल हरिजन नेता, मेरी तहसील से उत्तरप्रदेश असेंबली के भावी उम्मीदवार; सिगरेट के 'चेन स्मोकर' कि एक बुझे, तो एक जले और कश यों खीचें कि गुर्राटा लगे। मैंने कहा—अँग्रेज़ों को तो तुम इस धुएँ में ही उड़ा दोगे चौधरी साहब! बोले—अँग्रेज़ तो बाद में उड़ेगा, पहले तो यह मेम्बरी उड़ानी है। और इतने ज़ोर से हँसे कि क्या कहूँ—बरसों बाद भी वह चेहरा आँखों में घूम रहा है, हँसी कानों में गूँज रही है!

    यह है अक्टूबर 1936 की बात, जब देश अपने भाग्य निर्णायक चुनाव में जूझने की तैयारी कर रहा था।

    तलवार लेकर तो सभी मैदान मार लेते हैं, पर तारीफ़ तो उसकी है, जो ख़ाली हाथ मुक़ाबला करे और मैदान मार ले। चौधरी बिहारीलाल ऐसे ही बहादुरों में थे। उन्होंने भारत रैदासी हरिजन जाति में जन्म लिया था।

    बाद में तो देश की सूरत ही बदल गई—हर खिड़की और झरोखे से प्रकाश बरस पड़ा, पर बीसवीं शताब्दी के एक दम आरंभ में यह बात नहीं थी। तब किसी बालक का पढ़ने की हिम्मत करना ही पाप था, पर बिहारीलाल अंधकार में खो जाने को नहीं, उसे खा जाने को पैदा हुए थे। वे उनमें थे, जिन्हें बाधाओं की काली दीवारें अपने रास्ते से कभी डिगा नहीं पार्टी। बाधाओं से लड़कर, उन्हें लाँधकर उन्होंने हिंदी-उर्दू और अँग्रेज़ी की शिक्षा प्राप्त की और सरकार के सर्वेक्षण विभाग में नौकर हो गए। सरकारी कुर्सी पर एक चमार, उस युग में तो यह करश्मा ही था!!

    यह आया 1920 और यह उठी गाँधीजी की आँधी। देश ने करवट बदली और भारत माता ने अपने सपूतों को पुकारा। बिहारीलाल उस दिन अपने अँग्रेज़ अफ़सर की मेज़ के सामने जा खड़े हुए और एक काग़ज़ उसके सामने रख दिया।

    क्या है बिहारीलाल? तरक्की चाहता है? अँग्रेज़ अफ़सर ने अपनी अदा से पूछा और इठलाकर बिहारीलाल ने कहा—जी हाँ, अब मैं तरक्की चाहता हूँ।

    हम तुम्हारे काम से बहुत खुश हैं। तुम्हें हम एक स्पेशल इनक्रीमेंट (विशेष उन्नति) देंगे। अफ़सर ने लाड़ से कहा तो बिहारीलाल बोले—सर, आपकी मेहरबानी का शुक्रिया, पर मैं अब अपनी नहीं, अपने मुल्क-की तरक्की चाहता हूँ और यह मेरा प्रार्थना-पत्र नहीं, त्याग-पत्र है।

    अँग्रेज़ अफ़सर जैसे आकाश से गिर पड़ा। उसने इन्हें समझाया, लुभाया, परचाया और डाराया, पर देश-भक्ति का नशा कहीं समझाने-डराने-से उतरता है? चौधरी बिहारीलाल ने नौकरी छोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़े। अब वे दफ़्तर के दबे-बुचे बाबू नहीं, एक दहकता अँगारा थे। मंच पर या दमकते कि लोग देखें और बिजली की तरह तड़पकर यों बोलते कि बाद में भी उनके बोल कानों में गूँजा करें। सचमुच उनके व्याख्यानों ने चारों तरफ़ आग-सी बरसा दी, लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ उठा लिए ।'

    हथकड़ियाँ उनके हाथों को चूमने रहीं थीं कि गाँधीजी ने आंदोलन रोक दिया, पर बिहारीलाल बढ़कर रुक जाने वालों में थे। वे अब देश के रचनात्मक कामों में जुट पड़े। अछूत जातियों का संगठन, उनमें शिक्षा का प्रचार, नशा-निवारण और दूसरे अनेक कार्यों में उन्होंने अपने को खपा दिया।

    बवंडर तेल के दीपकों को बुझा देता है और विप्लव हृदय के अनेक दीपकों को जला देता है। बिहारीलाल भी एक विप्लवी दीपक ही थे, पर समय ने बताया कि वे उनमें थे, जो झमक कर बुझ जाते हैं, वे उनमें थे, जो जल उठते हैं, तो फिर जलते ही रहते हैं। सच्चाई यह है कि वे मिट्टी के मामूली दीपक थे कि दूसरों के जलाए जलें और दूसरों के बुझाए बुझ जाएँ। उनके जीवन में उनकी अपनी लौ थी; वे जीवन-आकाश के एक चमकते नक्षत्र थे।

    राष्ट्रीयता का ज्वार देश में उतरा कि सांप्रदायिकता की आग बरस पड़ी। मस्जिद के सामने बाजे का सवाल उठा और हिंदू-मुस्लिम-दंगों की लहर आई। बड़े-बड़े बह गए, जो बह पाए, वे बचकर बैठ गए, पर 1925 की एक घटना ने बताया कि बिहारीलाल तब भी अपने पूरे जलाल पर थें।

    उन दिनों स्थानीय बोर्डों में एक हरिजन सरकार द्वारा नामजद मेंबर हुआ करता था, पर चौधरी बिहारीलाल ने एक सवर्ण सीट पर चुनाव लड़ने की घोषणा की और शान से मेंबर हो गए। सारे देश में वे ही पहले हरिजन थे, जो चुनाव द्वारा किसी स्थानीय बोर्ड में आम सीट से सदस्य निर्वाचित हुए—यह जनता द्वारा चौधरी साहब के व्यक्तित्व की स्वीकृति ही तो थी।

    असल में अब उनका व्यक्तित्व देहरादून या उत्तरप्रदेश का नहीं, सारे देश का हो चला था और हरिजनों की दृष्टि से तो उनका व्यक्तित्व ही नहीं, नेतृत्व भी अब अखिल भारतीय था। वे गाँधीजी के अत्यंत विश्वासपात्र सैनिक थे और राष्ट्र की सामाजिक प्रवृत्तियों के कर्णधार लाला लाजपतराय तो उन्हें अपना मित्र ही मानते थे।

    अजमेर में राजपूताना और मालवा के हरिजनों का जो सम्मेलन हुआ, उसके वे सभापति चुने गए। सभापति पद से आपने जो भाषण दिया, वह देश भर के पत्रों में छपा और सभी कोनों में उसकी प्रशंसा हुई। ऐसा लगता था कि सांप्रदायिकता को बाढ़ के उस नारकीय युग में भी वे 1920 की हवा में ही जी-जाग रहे थे। वह भाषण इतना गर्म था कि कई दिनों तक उनके गिरफ़्तार होने की अफ़वाहें उड़ती रहीं।

    चौधरी बिहारीलाल हरिजनों के प्रश्न को, एक बड़ी बात है कि उस युग में भी एक बड़ी नज़र से देखते थे। उनके लिए हरिजनों का प्रश्न विशाल-भारत का एक प्रश्न था—सिर्फ़ उनकी जाति का नहीं। यही कारण है कि उत्तरप्रदेश के मज़दूरों का लखनऊ में जो महोत्सव हुआ, उसके सभापति भी वे ही चुने गए। अपनी विशाल दृष्टि के कारण वे राष्ट्र की दलित-पीड़ित मानवता के प्रतिनिधि हो गए थे।

    मुंगेर-बिहार में पूरे भारत के रैदासी हरिजनों का जो सम्मेलन हुआ, उसके सभापति पद से चौधरी बिहारीलाल ने कहा था—हरिजनों का मसला हिन्दुस्तान की नई ज़िंदगी का मसला है और हिन्दुस्तान की नई ज़िंदगी का मसला सारी दुनिया की दलित-पीड़ित इंसानियत का मसला है। हम उसे बिना हल किए कैसे चैन से बैठ सकते हैं?

    भारत की विभिन्न पार्टियों का जो सर्वदल सम्मेलन बुलाया गया, उसमें अछूत जातियों का प्रतिनिधित्व चौधरी बिहारीलाल ने किया और अपना पार्ट इतनी शान और ऊँचाई से अदा किया कि मालवीयजी महाराज उन पर लट्टू हो गए।

    मालवीयजी ने खुले आम उनका कंधा क्या थपथपाया, उन्हें अपने साथ ही बाँध लिया, पर मालवीयजी उन दिनों हिंदू महासभा का नेतृत्व कर रहे थे और उस वातावरण में खप सकना इनके बस का था, इसलिए यह संयोग कुछ ही दिन चला, चलकर टूट गया। जाति, धर्म या वर्ग की भाषा में सोचना उस राष्ट्र-दृष्टि पुरुष के लिए संभव ही था! वे ज़िला कांग्रेस कमेटी के मंत्री, कांग्रेस महासमिति के सदस्य और नगरपालिका के उपाध्यक्ष के रूप में अपना काम करते रहे।

    शांति हो या क्रांति, वे उनमें थे, जिन्हें चुप नहीं बैठना था—काम किए जाना था; तो साइमन कमीशन क्या आया, देश में जोश की सोई आँधी उमड़-उड़ी-'साइमन लौट जाओ' के नारों से वातावरण लरज उठा। चौधरी बिहारीलाल अब इलाक़े घोड़े पर सवार थे—आज यहाँ तो कल वहाँ, रात दिन कमीशन के बहिष्कार को धुन; इस धुन में उनकी लगन और योग्यता दोनों का ऐसा सुंदर प्रदर्शन हुआ कि लाला लाजपतराय ने शत-शत मुखों से उनकी प्रशंसा की।

    लगभग 10 वर्ष देश में आंदोलन बंद रहने और 1924 से 1928 तक धुआँधार सांप्रदायिक दंगों का मायाजाल देश भर में बिछ जाने से अँग्रेज़ का भारत की राष्ट्रीय चेतना के मर जाने का वहम कमीशन के बायकाट की गर्मी में झुलस गया, तो उसने राष्ट्र की हिंदू महाशक्ति को हमेशा के लिए क्षत-विक्षत करने का एक नया दाव गाँठा। वह था अछूतों में आदि हिंदू आंदोलन!

    इस आंदोलन की घोषणा थी कि अछूत लोग भारत के मूल निवासी हैं और हिंदू लोगों ने बाहर से आकर ताक़त के ज़ोर से इन मूल निवासियों को अछूत बना लिया है। यह एक बहुत तेज़ ज़हर था, जो देश की राष्ट्रीय चेतना पर छिड़का जा रहा था। इसके एक नेता थे स्वामी अछूतानंद और उनका मुख्य क्षेत्र था—उत्तर प्रदेश। गवर्नर के इशारे पर हर ज़िले का अँग्रेज़ कलेक्टर और कप्तान स्वामी जी का सहायक था।

    चौधरी साहब मेरा नाम बिहारीलाल है और इस तहसील से यू. पी. असेंबली का चुनाव लड़ने का काम मुझे कांग्रेस ने सींपा है। और वे इस तरह उनसे मिले, जैसे दोनों पुराने दोस्त हों। साइकिल ख़राब हो जाने से वे उस दिन पैदल थे। चौधरी साहब ने ज़िद करके उन्हें मोटर में बैठाया और 7 मील छोड़कर लौटे। वे अपने इस विरोधी उम्मीदवार की लगन-हिम्मत के सदा प्रशंसक रहे और जीतने के बाद एक दिन पूरे सम्मान के साथ उन्होंने होटल में उन्हें चाय पिलाई।

    उन्होंने कहा था—मेरे पीछे काँग्रेस की शक्ति है, मित्रों का सहयोग है, आर्थिक सहायता है, फिर भी यह इकला हर गाँव में मुझसे पहले पहुँचा है। मैं इने चुनाव में जीत सकता हूँ, दिल में नहीं। वे हमेशा भाई बहादुर सिंह के प्रशंसक रहे और जब जहाँ मिलते, उन्हें ज़रूर पूछते थे।

    चौधरी बिहारीलाल सचमुच बहुत उम्दा इंसान थे। वे आदमी की इज़्ज़त करना जानते थे, आदमी को प्यार करना जानते थे, आदमी से काम लेना जानते थे। उनमें कहीं बनावट थी, दंभ था, दर्प था—वे नेता होकर भी कार्यकर्ता थे और कार्यकर्ता होकर भी नेता थे।

    चुनाव जीतकर, मंत्रिमंडल बना और वे एक्साइज़ विभाग के पार्लामेंट्री सेक्रेटरी बनाए गए। उनके साथ अब लाल बनात के अंगरखे का अर्दली रहता था, वे सरकार थे, पर सबके साथ अब भी उनका व्यवहार वही घरेलू था।

    1938 की काँग्रेस में जाते हुए वे मार्ग में बीमार पड़े और 1940 में 42 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। उनकी उम्र मरने की उम्र थी, फिर भी वे अपना काम कर गए—मिट्टी में मिलने से पहले अपनी मिट्टी का पूरा मोल मातृभूमि को दे गए। जिन्होंने उन्हें नहीं देखा, वे उन्हें उत्तरप्रदेश के मंत्री और उनके छोटे भाई चौधरी गिरधारीलाल की आँखों और मुस्कुराहटों में झाँकता देख सकते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दीप जले, शंख बजे (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : कन्हैयालाल सहल
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
    • संस्करण : 1951

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