चेहरा अनजाना-अनपहचाना, तो नाम अनसुना-सा, पर व्यवहार लंगोटिए यार का। यह है कौन? मैंने सोचा और तब देखा ग़ौर से उनकी तरफ़—रंग गाढ़ा-पक्का, आँखें बड़ी-बड़ी चंचल, बिना हँसे भी हँस पड़ते-से होंठ, पान की लाली से रचे मसूड़े और दाँत, लंबी छरहरी देह और बिना रूप के भी एक रूपवान व्यक्तित्व; स्वादी के वेश से झकाझक एक लीडरनुमा इंसान यह।
चाय आई, बातें चली, जाना—आप है देहरादून निवासी चौधरी बिहारीलाल हरिजन नेता, मेरी तहसील से उत्तरप्रदेश असेंबली के भावी उम्मीदवार; सिगरेट के 'चेन स्मोकर' कि एक बुझे, तो एक जले और कश यों खीचें कि गुर्राटा लगे। मैंने कहा—अँग्रेज़ों को तो तुम इस धुएँ में ही उड़ा दोगे चौधरी साहब! बोले—अँग्रेज़ तो बाद में उड़ेगा, पहले तो यह मेम्बरी उड़ानी है। और इतने ज़ोर से हँसे कि क्या कहूँ—बरसों बाद भी वह चेहरा आँखों में घूम रहा है, हँसी कानों में गूँज रही है!
यह है अक्टूबर 1936 की बात, जब देश अपने भाग्य निर्णायक चुनाव में जूझने की तैयारी कर रहा था।
तलवार लेकर तो सभी मैदान मार लेते हैं, पर तारीफ़ तो उसकी है, जो ख़ाली हाथ मुक़ाबला करे और मैदान मार ले। चौधरी बिहारीलाल ऐसे ही बहादुरों में थे। उन्होंने भारत रैदासी हरिजन जाति में जन्म लिया था।
बाद में तो देश की सूरत ही बदल गई—हर खिड़की और झरोखे से प्रकाश बरस पड़ा, पर बीसवीं शताब्दी के एक दम आरंभ में यह बात नहीं थी। तब किसी बालक का पढ़ने की हिम्मत करना ही पाप था, पर बिहारीलाल अंधकार में खो जाने को नहीं, उसे खा जाने को पैदा हुए थे। वे उनमें थे, जिन्हें बाधाओं की काली दीवारें अपने रास्ते से कभी डिगा नहीं पार्टी। बाधाओं से लड़कर, उन्हें लाँधकर उन्होंने हिंदी-उर्दू और अँग्रेज़ी की शिक्षा प्राप्त की और सरकार के सर्वेक्षण विभाग में नौकर हो गए। सरकारी कुर्सी पर एक चमार, उस युग में तो यह करश्मा ही था!!
यह आया 1920 और यह उठी गाँधीजी की आँधी। देश ने करवट बदली और भारत माता ने अपने सपूतों को पुकारा। बिहारीलाल उस दिन अपने अँग्रेज़ अफ़सर की मेज़ के सामने जा खड़े हुए और एक काग़ज़ उसके सामने रख दिया।
क्या है बिहारीलाल? तरक्की चाहता है? अँग्रेज़ अफ़सर ने अपनी अदा से पूछा और इठलाकर बिहारीलाल ने कहा—जी हाँ, अब मैं तरक्की चाहता हूँ।
हम तुम्हारे काम से बहुत खुश हैं। तुम्हें हम एक स्पेशल इनक्रीमेंट (विशेष उन्नति) देंगे। अफ़सर ने लाड़ से कहा तो बिहारीलाल बोले—सर, आपकी मेहरबानी का शुक्रिया, पर मैं अब अपनी नहीं, अपने मुल्क-की तरक्की चाहता हूँ और यह मेरा प्रार्थना-पत्र नहीं, त्याग-पत्र है।
अँग्रेज़ अफ़सर जैसे आकाश से गिर पड़ा। उसने इन्हें समझाया, लुभाया, परचाया और डाराया, पर देश-भक्ति का नशा कहीं समझाने-डराने-से उतरता है? चौधरी बिहारीलाल ने नौकरी छोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़े। अब वे दफ़्तर के दबे-बुचे बाबू नहीं, एक दहकता अँगारा थे। मंच पर या दमकते कि लोग देखें और बिजली की तरह तड़पकर यों बोलते कि बाद में भी उनके बोल कानों में गूँजा करें। सचमुच उनके व्याख्यानों ने चारों तरफ़ आग-सी बरसा दी, लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ उठा लिए ।'
हथकड़ियाँ उनके हाथों को चूमने आ रहीं थीं कि गाँधीजी ने आंदोलन रोक दिया, पर बिहारीलाल बढ़कर रुक जाने वालों में न थे। वे अब देश के रचनात्मक कामों में जुट पड़े। अछूत जातियों का संगठन, उनमें शिक्षा का प्रचार, नशा-निवारण और दूसरे अनेक कार्यों में उन्होंने अपने को खपा दिया।
बवंडर तेल के दीपकों को बुझा देता है और विप्लव हृदय के अनेक दीपकों को जला देता है। बिहारीलाल भी एक विप्लवी दीपक ही थे, पर समय ने बताया कि वे उनमें न थे, जो झमक कर बुझ जाते हैं, वे उनमें थे, जो जल उठते हैं, तो फिर जलते ही रहते हैं। सच्चाई यह है कि वे मिट्टी के मामूली दीपक न थे कि दूसरों के जलाए जलें और दूसरों के बुझाए बुझ जाएँ। उनके जीवन में उनकी अपनी लौ थी; वे जीवन-आकाश के एक चमकते नक्षत्र थे।
राष्ट्रीयता का ज्वार देश में उतरा कि सांप्रदायिकता की आग बरस पड़ी। मस्जिद के सामने बाजे का सवाल उठा और हिंदू-मुस्लिम-दंगों की लहर आई। बड़े-बड़े बह गए, जो बह न पाए, वे बचकर बैठ गए, पर 1925 की एक घटना ने बताया कि बिहारीलाल तब भी अपने पूरे जलाल पर थें।
उन दिनों स्थानीय बोर्डों में एक हरिजन सरकार द्वारा नामजद मेंबर हुआ करता था, पर चौधरी बिहारीलाल ने एक सवर्ण सीट पर चुनाव लड़ने की घोषणा की और शान से मेंबर हो गए। सारे देश में वे ही पहले हरिजन थे, जो चुनाव द्वारा किसी स्थानीय बोर्ड में आम सीट से सदस्य निर्वाचित हुए—यह जनता द्वारा चौधरी साहब के व्यक्तित्व की स्वीकृति ही तो थी।
असल में अब उनका व्यक्तित्व देहरादून या उत्तरप्रदेश का नहीं, सारे देश का हो चला था और हरिजनों की दृष्टि से तो उनका व्यक्तित्व ही नहीं, नेतृत्व भी अब अखिल भारतीय था। वे गाँधीजी के अत्यंत विश्वासपात्र सैनिक थे और राष्ट्र की सामाजिक प्रवृत्तियों के कर्णधार लाला लाजपतराय तो उन्हें अपना मित्र ही मानते थे।
अजमेर में राजपूताना और मालवा के हरिजनों का जो सम्मेलन हुआ, उसके वे सभापति चुने गए। सभापति पद से आपने जो भाषण दिया, वह देश भर के पत्रों में छपा और सभी कोनों में उसकी प्रशंसा हुई। ऐसा लगता था कि सांप्रदायिकता को बाढ़ के उस नारकीय युग में भी वे 1920 की हवा में ही जी-जाग रहे थे। वह भाषण इतना गर्म था कि कई दिनों तक उनके गिरफ़्तार होने की अफ़वाहें उड़ती रहीं।
चौधरी बिहारीलाल हरिजनों के प्रश्न को, एक बड़ी बात है कि उस युग में भी एक बड़ी नज़र से देखते थे। उनके लिए हरिजनों का प्रश्न विशाल-भारत का एक प्रश्न था—सिर्फ़ उनकी जाति का नहीं। यही कारण है कि उत्तरप्रदेश के मज़दूरों का लखनऊ में जो महोत्सव हुआ, उसके सभापति भी वे ही चुने गए। अपनी विशाल दृष्टि के कारण वे राष्ट्र की दलित-पीड़ित मानवता के प्रतिनिधि हो गए थे।
मुंगेर-बिहार में पूरे भारत के रैदासी हरिजनों का जो सम्मेलन हुआ, उसके सभापति पद से चौधरी बिहारीलाल ने कहा था—हरिजनों का मसला हिन्दुस्तान की नई ज़िंदगी का मसला है और हिन्दुस्तान की नई ज़िंदगी का मसला सारी दुनिया की दलित-पीड़ित इंसानियत का मसला है। हम उसे बिना हल किए कैसे चैन से बैठ सकते हैं?
भारत की विभिन्न पार्टियों का जो सर्वदल सम्मेलन बुलाया गया, उसमें अछूत जातियों का प्रतिनिधित्व चौधरी बिहारीलाल ने किया और अपना पार्ट इतनी शान और ऊँचाई से अदा किया कि मालवीयजी महाराज उन पर लट्टू हो गए।
मालवीयजी ने खुले आम उनका कंधा क्या थपथपाया, उन्हें अपने साथ ही बाँध लिया, पर मालवीयजी उन दिनों हिंदू महासभा का नेतृत्व कर रहे थे और उस वातावरण में खप सकना इनके बस का न था, इसलिए यह संयोग कुछ ही दिन चला, चलकर टूट गया। जाति, धर्म या वर्ग की भाषा में सोचना उस राष्ट्र-दृष्टि पुरुष के लिए संभव ही न था! वे ज़िला कांग्रेस कमेटी के मंत्री, कांग्रेस महासमिति के सदस्य और नगरपालिका के उपाध्यक्ष के रूप में अपना काम करते रहे।
शांति हो या क्रांति, वे उनमें थे, जिन्हें चुप नहीं बैठना था—काम किए जाना था; तो साइमन कमीशन क्या आया, देश में जोश की सोई आँधी उमड़-उड़ी-'साइमन लौट जाओ' के नारों से वातावरण लरज उठा। चौधरी बिहारीलाल अब इलाक़े घोड़े पर सवार थे—आज यहाँ तो कल वहाँ, रात दिन कमीशन के बहिष्कार को धुन; इस धुन में उनकी लगन और योग्यता दोनों का ऐसा सुंदर प्रदर्शन हुआ कि लाला लाजपतराय ने शत-शत मुखों से उनकी प्रशंसा की।
लगभग 10 वर्ष देश में आंदोलन बंद रहने और 1924 से 1928 तक धुआँधार सांप्रदायिक दंगों का मायाजाल देश भर में बिछ जाने से अँग्रेज़ का भारत की राष्ट्रीय चेतना के मर जाने का वहम कमीशन के बायकाट की गर्मी में झुलस गया, तो उसने राष्ट्र की हिंदू महाशक्ति को हमेशा के लिए क्षत-विक्षत करने का एक नया दाव गाँठा। वह था अछूतों में आदि हिंदू आंदोलन!
इस आंदोलन की घोषणा थी कि अछूत लोग भारत के मूल निवासी हैं और हिंदू लोगों ने बाहर से आकर ताक़त के ज़ोर से इन मूल निवासियों को अछूत बना लिया है। यह एक बहुत तेज़ ज़हर था, जो देश की राष्ट्रीय चेतना पर छिड़का जा रहा था। इसके एक नेता थे स्वामी अछूतानंद और उनका मुख्य क्षेत्र था—उत्तर प्रदेश। गवर्नर के इशारे पर हर ज़िले का अँग्रेज़ कलेक्टर और कप्तान स्वामी जी का सहायक था।
चौधरी साहब मेरा नाम बिहारीलाल है और इस तहसील से यू. पी. असेंबली का चुनाव लड़ने का काम मुझे कांग्रेस ने सींपा है। और वे इस तरह उनसे मिले, जैसे दोनों पुराने दोस्त हों। साइकिल ख़राब हो जाने से वे उस दिन पैदल थे। चौधरी साहब ने ज़िद करके उन्हें मोटर में बैठाया और 7 मील छोड़कर लौटे। वे अपने इस विरोधी उम्मीदवार की लगन-हिम्मत के सदा प्रशंसक रहे और जीतने के बाद एक दिन पूरे सम्मान के साथ उन्होंने होटल में उन्हें चाय पिलाई।
उन्होंने कहा था—मेरे पीछे काँग्रेस की शक्ति है, मित्रों का सहयोग है, आर्थिक सहायता है, फिर भी यह इकला हर गाँव में मुझसे पहले पहुँचा है। मैं इने चुनाव में जीत सकता हूँ, दिल में नहीं। वे हमेशा भाई बहादुर सिंह के प्रशंसक रहे और जब जहाँ मिलते, उन्हें ज़रूर पूछते थे।
चौधरी बिहारीलाल सचमुच बहुत उम्दा इंसान थे। वे आदमी की इज़्ज़त करना जानते थे, आदमी को प्यार करना जानते थे, आदमी से काम लेना जानते थे। उनमें कहीं बनावट न थी, दंभ न था, दर्प न था—वे नेता होकर भी कार्यकर्ता थे और कार्यकर्ता होकर भी नेता थे।
चुनाव जीतकर, मंत्रिमंडल बना और वे एक्साइज़ विभाग के पार्लामेंट्री सेक्रेटरी बनाए गए। उनके साथ अब लाल बनात के अंगरखे का अर्दली रहता था, वे सरकार थे, पर सबके साथ अब भी उनका व्यवहार वही घरेलू था।
1938 की काँग्रेस में जाते हुए वे मार्ग में बीमार पड़े और 1940 में 42 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। उनकी उम्र मरने की उम्र न थी, फिर भी वे अपना काम कर गए—मिट्टी में मिलने से पहले अपनी मिट्टी का पूरा मोल मातृभूमि को दे गए। जिन्होंने उन्हें नहीं देखा, वे उन्हें उत्तरप्रदेश के मंत्री और उनके छोटे भाई चौधरी गिरधारीलाल की आँखों और मुस्कुराहटों में झाँकता देख सकते हैं।
tum kanhaiyalal ho?
ji haan.
to main biharilal hoon mere dost!
chehra anjana anpahchana, to naam ansuna sa, par vyvahar langotiye yaar ka. ye hai kaun? mainne socha aur tab dekha ghaur se unki taraf—rang gaDha pakka, ankhen baDi baDi chanchal, bina hanse bhi hans paDte se honth, paan ki lali se rache masuDe aur daant, lambi chharahri deh aur bina roop ke bhi ek rupavan vyaktitv; svadi ke vesh se jhakajhak ek liDaranuma insaan ye.
chaay aai, baten chali, jana aap hai dehradun nivasi chaudhari biharilal harijan neta, meri tahsil se uttraprdesh asembli ke bhavi ummidvar; sigret ke chen smokar ki ek bujhe, to ek jale aur kash yon khichen ki gurrata lage. mainne kaha—angrezon ko to tum is dhuen mein hi uDa doge chaudhari sahach! bole—angrez to baad mein uDega, pahle to ye membari uDani hai. aur itne zor se hanse ki kya kahun—barson baad bhi wo chehra ankhon mein ghoom raha hai, hansi kanon mein goonj rahi hai!
ye hai aktubar 1936 ki baat, jab desh apne bhagya nirnayak chunav mein jujhne ki taiyari kar raha tha.
talvar lekar to sabhi maidan maar lete hain, par tarif to uski hai, jo khali haath muqabala kare aur maidan maar le. chaudhari biharilal aise hi bahaduron mein the. unhonne bharat raidasi harijan jati mein janm liya tha.
baad mein to desh ki surat hi badal gai—har khiDki aur jharokhe se parkash baras paDa, par bisvin shatabdi ke ek dam arambh mein ye baat nahin thi. tab kisi balak ka paDhne ki himmat karna hi paap tha, par biharilal andhkar mein kho jane ko nahin, use kha jane ko paida hue the. ve unmen the, jinhen badhaon ki kali divaren apne raste se kabhi Diga nahin parti. badhaon se laDkar, unhen laandh kar unhonne hindi urdu aur angrezi ki shiksha praapt ki aur sarkar ke sarvekshan vibhag mein naukar ho gaye. sarkari kursi par ek chamar, us yug mein to ye karashma hi tha!!
ye aaya 1920 aur ye uthi gandhiji ki andhi. desh ne karvat badli aur bharat mata ne apne saputon ko pukara. biharilal us din apne angrez afsar ki mez ke samne ja khaDe hue aur ek kaghaz uske samne rakh diya.
kya hai biharilal? taraqqi chahta hai? angrez afsar ne apni ada se puchha aur ithlakar biharilal ne kaha—ji haan, ab main taraqqi chahta hoon.
ham tumhare kaam se bahut khush hain. tumhein hum ek speshal inakriment (vishesh unnati) denge. afsar ne laDse kaha to biharilal bole—sar, apaki mehrbani ka shukriya, par main ab apni nahin, apne mulk ki tarakki chahta hoon aur ye mera pararthna patr nahin, tyaag patr hai.
angrez afsar jaise akash se gir paDa. usne inhen samjhaya, lubhaya, parchaya aur Daraya, par desh bhakti ka nasha kahin samjhane Darane se utarta hai? chaudhari biharilal ne naukari chhoD di aur andolan mein kood paDe. ab ve daftar ke dabe buche babu nahin, ek dahakta angara the. manch par ya damakte ki log dekhen aur bijli ki tarah taDapkar yon bolte ki baad mein bhi unke bol kanon mein gunja karen. sachmuch unke vyakhyanon ne charon taraf aag so barsa di, logonne unhen hathon haath utha liye.
hathakaDiyan unke hathon ko chumne aa rahin theen ki gandhiji ne andolan rok diya, par biharilal baDhkar ruk jane valon mein na the. ve ab deshke rachnatmak kamon mein jut paDe. achhut jatiyon ka sangthan, unmen shiksha ka parchar, nasha nivaran aur dusre anek karyon mein unhonne apne ko khapa diya.
bavanDar tel ke dipkon ko bujha deta hai aur viplav hriday ke anek dipkon ko jala deta hai. biharilal bhi ek viplavi dipak hi the, par samayne bataya ki ve unmen na the, jo jhamak kar bujh jate hain, ve unmen the, jo jal uthte hain, to phir jalte hi rahte hain. sachchai ye hai ki ve mitti ke mamuli dipak na the ki dusron ke jalaye jalen aur dusron ke bujhaye bujh jayen. unke jivan mein unki apni li thee; ve jivan akara ke ek chamakte nakshatr the.
rashtriyata ka jyaar desh mein utra ki samprdayikta ki aag baras paDi. masjid ke samne baje ka saval utha aur hindu muslibh dangonki lahr aai. baDe baDe bah ge, jo ye na pae, ve bachchkar baith ge, par 1625 ki ek ghatnane bataya ki biharilal tab bhi apne pure jalal par the.
un dinon sthaniy borDon mein ek harijan sarkar dvara namajad membar hua karta tha, par chaudhari biharilalne ek savarn seet par chunav laDne ki ghoshna ki aur shaan se membar ho ge. sare desh mein ve ho pahle harijan the, jo chunav dvara kisi sthaniy borD mein aam seet se sadasya nirvachit hue—yah janta dvara chaudhari sahay ke vyaktitv ki svikriti hi to thi.
asal mein ab unka vyaktitv dehradun ya uttraprdesh ka nahin, sare desh ka ho chala tha aur harijnon ki drishtise to unka vyaktitv hi nahin, netritv bhi ach akhil bharatiy tha. ve gandhiji ke atyant vishvasapatr sainik the aur rashtrki samajik prvrittiyon ke karndhar lala lajapatray to unhen apna mitr hi mante the.
ajmer mein rajaputana aur malava ke harijnon ka jo sammelan hua, uske ve sabhapati chune ge. sabhapati pad se aapne jo bhashan diya, bah desh bhar ke patronmen chhapa aur sabhi konon mein uski prshansa hui. aisa lagta tha ki samprdayikta ko baaDh ke us narakiy yugam bhi ve 1620 ki hava mein hi ji jaag rahe the. wo bhashan itna garam tha ki kai dinon tak unke giraftar hone ki afvahen uDti rahin.
chaudhari biharilal harijnon ke parashn ko, ek baDi baat hai ki us yug mein bhi ek baDi nazar se dekhte the. unke liye harijnon ka parashn vishal bharatka ek parashn tha—sirf unki jatika nahin. yahi karan hai ki uttraprdesh ke mazduron ka lakhanuu mein jo mahotsav hua, uske sabhapati bhi ve hi chune ge. apni vishal drishti ke karan ve raashtr ki dalit piDit manavta ke pratinidhi ho ge the.
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bharat ki vibhinn partiyonka jo sarvadal sammelan bulaya gaya, usmen achhut jatiyon ka pratinidhitv chaudhari niharilal ne kiya aur apna paart itni shaan aur uunchai se ada kiya ki malviyji maharaj un par lattu ho ge.
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shanti ho ya kranti, ve unmen the, jinhen chup nahin baithna tha—kam kiye jana tha; to saiman kamishan kya aaya, desh mein josh ki soi andhi umaD uDi saiman laut jao ke naron se vatavran laraj utha. chaudhari biharilal ab ilaqe ghoDe par savar the—aj yahan to kal vahan, raat din kamishan ke bahishka rako dhun; is dhun mein unki lagan aur yogyata donon ka aisa sundar pradarshan hua ki lala lajapatray ne shat shat mukhon se unki prshansa ki.
lagbhag 10 varsh desh mein andolan band rahne aur 1624 se 1628 tak dhuandhar samprdayik dangon ka mayajal desh bhar mein bichh jane se angrez ka bharat ki rashtriy chetna ke mar jane ka vahm kamishan ke bayakat ki garmi mein jhulas gaya, to usne raashtr ki hindu mahashakti ko hamesha ke liye kshat vikshat karne ka ek naya daav gantha. wo tha achhuton mein aadi hindu andolan!
is andolan ki ghoshna thi ki achhut log bharat ke mool nivasi hain aur hindu logon ne bahar se aakar taqat ke zor se in mool nivasiyon ko achhut bana liya hai. ye ek bahut tez zahr tha, jo deshki rashtriy chetna par chhiDka ja raha tha. iske ek neta the svami achhutanand aur unka mukhya kshetr tha—uttar pardesh. gavarnar ke ishare par har zile ka angrez kalektar aur kaptan svami ji ka sahayak tha.
chaudhari sahab mera naam biharilal hai aur is tahsil se yu०pi० asembli ka chunav laDne ka kaam mujhe kangres ne simpa hai. aur ve is tarah unse mile, jaise donon purane dost hon. saikil kharab ho janese ve us din paidal the. chaudhari sahayne zid karke unhen motar mein baithaya aur 7 meel chhoDkar laute. ve apne is virodhi ummidvar ki lagan himmat ke sada prshansak rahe aur jitne ke baad ek din pure samman ke saath unhonne hotal mein unhen chaay pilai.
unhonne kaha tha—mere pichhe kangres ki shakti hai, mitronka sahyog hai, arthik sahayata hai, phir bhi ye ikla har gaanv mein mujhse pahle pahuncha hai. main ine chunav mein jeet sakta hoon, dil mein nahin. ve hamesha bhai bahadur sinh ke prshansak rahe aur jab jahan milte, unhen zarur puchhte the.
chaudhari biharilal sachmuch bahut umda insaan the. ve adami ki izzat karna jante the, adami ko pyaar karna jante the, adami se kaam lena jante the. unmen kahin banavat na thi, dambh na tha, darp na tha—ve neta hokar bhi karyakarta the aur karyakarta hokar bhi neta the.
chunav jitkar, mantrimanDal bana aur ve eksaiz vibhag ke parlasentri sekretari banaye ge. unke saath ach laal banat ke angadarkhe ka ardali rahta tha, ve sarkar the, par sabke saath ab bho unka vyvahar vahi gharelu tha.
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un dinon sthaniy borDon mein ek harijan sarkar dvara namajad membar hua karta tha, par chaudhari biharilalne ek savarn seet par chunav laDne ki ghoshna ki aur shaan se membar ho ge. sare desh mein ve ho pahle harijan the, jo chunav dvara kisi sthaniy borD mein aam seet se sadasya nirvachit hue—yah janta dvara chaudhari sahay ke vyaktitv ki svikriti hi to thi.
asal mein ab unka vyaktitv dehradun ya uttraprdesh ka nahin, sare desh ka ho chala tha aur harijnon ki drishtise to unka vyaktitv hi nahin, netritv bhi ach akhil bharatiy tha. ve gandhiji ke atyant vishvasapatr sainik the aur rashtrki samajik prvrittiyon ke karndhar lala lajapatray to unhen apna mitr hi mante the.
ajmer mein rajaputana aur malava ke harijnon ka jo sammelan hua, uske ve sabhapati chune ge. sabhapati pad se aapne jo bhashan diya, bah desh bhar ke patronmen chhapa aur sabhi konon mein uski prshansa hui. aisa lagta tha ki samprdayikta ko baaDh ke us narakiy yugam bhi ve 1620 ki hava mein hi ji jaag rahe the. wo bhashan itna garam tha ki kai dinon tak unke giraftar hone ki afvahen uDti rahin.
chaudhari biharilal harijnon ke parashn ko, ek baDi baat hai ki us yug mein bhi ek baDi nazar se dekhte the. unke liye harijnon ka parashn vishal bharatka ek parashn tha—sirf unki jatika nahin. yahi karan hai ki uttraprdesh ke mazduron ka lakhanuu mein jo mahotsav hua, uske sabhapati bhi ve hi chune ge. apni vishal drishti ke karan ve raashtr ki dalit piDit manavta ke pratinidhi ho ge the.
munger bihar mein pure bharat ke raidasi harijnon ka jo sammelan hua, uske sabhapati pad se chaudhari biharilal ne kaha tha—harijnon ka masla hindustan ki nai zindagi ka masla hai aur hindustan ki nai zindagi ka masla sari duniya ki dalit piDit insaniyat ka masla hai. hum use bina hal kiye kaise chain se baith sakte hain?
bharat ki vibhinn partiyonka jo sarvadal sammelan bulaya gaya, usmen achhut jatiyon ka pratinidhitv chaudhari niharilal ne kiya aur apna paart itni shaan aur uunchai se ada kiya ki malviyji maharaj un par lattu ho ge.
malviyji ne khule aam unka kandha kya thapthapaya, unhen apne saath hi baandh liya, par malviyji un dinon hindu mahasabha ka netritv kar rahe the aur us vatavran mein khap sakna inke bas ka na tha, isliye ye sanyog kuch hi din chala, chalkar toot gaya. jati, dharm ya varg ki bhasha mein sochna us raashtr drishti purush ke liye sambhav hi na tha! ve jila kangres kameti ke mantri, kangres mahasamiti ke sadasya aur nagarpalika ke upadhyaksh ke roop mein apna kaam karte rahe.
shanti ho ya kranti, ve unmen the, jinhen chup nahin baithna tha—kam kiye jana tha; to saiman kamishan kya aaya, desh mein josh ki soi andhi umaD uDi saiman laut jao ke naron se vatavran laraj utha. chaudhari biharilal ab ilaqe ghoDe par savar the—aj yahan to kal vahan, raat din kamishan ke bahishka rako dhun; is dhun mein unki lagan aur yogyata donon ka aisa sundar pradarshan hua ki lala lajapatray ne shat shat mukhon se unki prshansa ki.
lagbhag 10 varsh desh mein andolan band rahne aur 1624 se 1628 tak dhuandhar samprdayik dangon ka mayajal desh bhar mein bichh jane se angrez ka bharat ki rashtriy chetna ke mar jane ka vahm kamishan ke bayakat ki garmi mein jhulas gaya, to usne raashtr ki hindu mahashakti ko hamesha ke liye kshat vikshat karne ka ek naya daav gantha. wo tha achhuton mein aadi hindu andolan!
is andolan ki ghoshna thi ki achhut log bharat ke mool nivasi hain aur hindu logon ne bahar se aakar taqat ke zor se in mool nivasiyon ko achhut bana liya hai. ye ek bahut tez zahr tha, jo deshki rashtriy chetna par chhiDka ja raha tha. iske ek neta the svami achhutanand aur unka mukhya kshetr tha—uttar pardesh. gavarnar ke ishare par har zile ka angrez kalektar aur kaptan svami ji ka sahayak tha.
chaudhari sahab mera naam biharilal hai aur is tahsil se yu०pi० asembli ka chunav laDne ka kaam mujhe kangres ne simpa hai. aur ve is tarah unse mile, jaise donon purane dost hon. saikil kharab ho janese ve us din paidal the. chaudhari sahayne zid karke unhen motar mein baithaya aur 7 meel chhoDkar laute. ve apne is virodhi ummidvar ki lagan himmat ke sada prshansak rahe aur jitne ke baad ek din pure samman ke saath unhonne hotal mein unhen chaay pilai.
unhonne kaha tha—mere pichhe kangres ki shakti hai, mitronka sahyog hai, arthik sahayata hai, phir bhi ye ikla har gaanv mein mujhse pahle pahuncha hai. main ine chunav mein jeet sakta hoon, dil mein nahin. ve hamesha bhai bahadur sinh ke prshansak rahe aur jab jahan milte, unhen zarur puchhte the.
chaudhari biharilal sachmuch bahut umda insaan the. ve adami ki izzat karna jante the, adami ko pyaar karna jante the, adami se kaam lena jante the. unmen kahin banavat na thi, dambh na tha, darp na tha—ve neta hokar bhi karyakarta the aur karyakarta hokar bhi neta the.
chunav jitkar, mantrimanDal bana aur ve eksaiz vibhag ke parlasentri sekretari banaye ge. unke saath ach laal banat ke angadarkhe ka ardali rahta tha, ve sarkar the, par sabke saath ab bho unka vyvahar vahi gharelu tha.
1638 ki kangres mein jate hue ve maarg mein bimar paDe aur 1640 mein 42 varsh ki umr mein unka dehant ho gaya. unki umr marne ki umr na thi, phir bhi ve apna kaam kar ge—mitti mein milne se pahle apni mitti ka pura mol matribhumiko de ge. jinhonne unhen nahin dekha, ve unhen uttraprdesh ke mantri aur unke chhote bhai chaudhari girdhari laal ki ankhon aur muskurahton mein jhankta dekh sakte hain.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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