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आ रही लज्जा मुझे...

aa rahi lajja mujhe. . .

ज्ञानराज माणिकप्रभु

ज्ञानराज माणिकप्रभु

आ रही लज्जा मुझे...

ज्ञानराज माणिकप्रभु

और अधिकज्ञानराज माणिकप्रभु

    रही लज्जा मुझे प्रभु याचना करते हुए।

    क्षुद्र औ' नश्वर सुखों की कामना करते हुए॥

    मैं स्वयं सुखरूप होकर क्यों सुखों की चाह हो।

    भास हो क्यों न्यूनता का क्यों दुःखों का दाह हो।

    भय लगे प्रारब्ध का क्यों सामना करते हुए॥

    छिद्रयुत यह कामना का घट कभी भरता नहीं।

    अग्निज्वाला को कभी भी शांत घृत करता नहीं।

    आयु घटती तृप्ति की संकल्पना करते हुए॥

    वहन करते तुम प्रभो मम योग का औं' क्षेम का।

    मूल्यमापन कर सकता मैं तुम्हारे प्रेम का।

    क्यों हो संतुष्टि मन में प्रार्थना करते हुए॥

    कल्पतरु तुम हो मुझे यह स्मरण क्यों रहता नहीं।

    शरण में 'ज्ञान' क्योंकर चरण तव धरता नहीं।

    मरण हो प्रभु 'जयतु जय' की गर्जना करते हुए॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : ज्ञानराज माणिकप्रभु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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