साहिब ये खेल आपका कितना अजीब है...
sahib ye khel aapka kitna ajib hai. . .
ज्ञानराज माणिकप्रभु
Gyanraj Manikprabhu
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साहिब ये खेल आपका कितना अजीब है...
sahib ye khel aapka kitna ajib hai. . .
Gyanraj Manikprabhu
ज्ञानराज माणिकप्रभु
और अधिकज्ञानराज माणिकप्रभु
साहिब ये खेल आपका कितना अजीब है।
शामिल हूँ मैं भी इसमें ये मेरा नसीब है।
झुकने पे सर नज़र गई सीने पे तब लगा।
समझा था दूर मैं जिसे वो तो क़रीब है।
परछाइयाँ मैं देखता हर शै में आपकी।
वल्लाह ये नज़र बड़ी ही ख़ुशनसीब है।
दुश्मन हैं यहाँ लोग मेरी जान के मगर।
कोई न आपके सिवा मेंरा हबीब है।
दिखलाऊँ नब्ज़ ग़ैर को अपनी मैं किसलिए।
आलम में आप सा भी क्या कोई तबीब है।
जो भी है आन-बान-शान 'ज्ञान' की यहाँ।
वाक़ई में है वो आपकी, बंदा ग़रीब है।
- रचनाकार : ज्ञानराज माणिकप्रभु
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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