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प्रति-रचनात्मकता : रचनात्मकता का भ्रम और नया समाजशास्त्र

प्रति-रचनात्मकता : रचनात्मकता का भ्रम और नया समाजशास्त्र

आदित्य शुक्ल 13 दिसम्बर 2023

वाल्टर बेंजामिन का एक प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण निबंध है—‘द वर्क ऑफ़ आर्ट इन द एज ऑफ़ मेकेनिकल रिप्रोडक्शन'। बीसवीं सदी में लिखा हुआ यह निबंध आज पहले से भी कहीं अधिक प्रासंगिक और ज्वलंत दिखाई देता है। बीसवीं सदी में यांत्रिक पुनरुत्पादन के बारे में लिखते हुए भी शायद बेंजामिन ने यह कल्पना तक नहीं की होगी कि आने वाली शताब्दी में यह पुनरुत्पादन इतना अधिक बढ़ जाएगा कि कलाकृतियों के बीच समय का कोई अंतराल ही नहीं बचेगा या यूँ कहें कि समय का बोध ही नष्ट हो जाएगा। इक्कीसवीं शताब्दी में कला का उत्पादन और पुनरुत्पादन, दोनों ही अंधाधुंध है। कभी-कभी मन में विचार आता है कि इतनी अधिक मात्रा में जिन कलाकृतियों का उत्पादन हो रहा है, उनका स्रोत कहाँ है? क्या रचना-प्रक्रिया इतनी तीव्र गति से संभव है? इन्हीं विषयों पर विचार करते हुए एक मित्र ने एक शब्द का प्रयोग किया—प्रति-रचनात्मकता।

तकनीक और सुविधाओं के इस भँवरजाल में जीते हुए हमने अपना समयबोध और रचनाबोध दोनों ही गँवा दिया है, ऐसा जान पड़ता है। सूचनाएँ हम तक इतनी तीव्र गति से पहुँचती हैं कि हम अभी पुरानी सूचना को पचा ही पाएँ, तब तक एक नई सूचना हमारे सामने होती है। घटनाएँ, दुर्घटनाएँ तक टिकती नहीं; जैसे सब कुछ किसी तीव्र गति के प्रवाह में हो और इसकी गति को नियंत्रित ही न किया जा सके? क्या इतनी तीव्र गति से बहते इस सूचना-प्रवाह को रोका जा सकता है? यह असंभव जान पड़ता है। ऐसे में रचनात्मकता के विषय को संबोधित करते हुए यही समझ में आता है कि आज रचनाकारों के पास रचना करने का समय ही नहीं है। रचनाएँ—हम जो देखते हैं—वे अधिकतर प्रतिक्रियात्मक होती हैं, बजाय इसके कि वह किसी वस्तुनिष्ठ विचार और रचना-प्रक्रिया से होकर अपना आकार हासिल करें।

रचनात्मकता है क्या? कोई रचनाकार क्यों बनता है?

वे लोग जो इन सवालों और इस प्रक्रिया से जुड़े हैं, इस बात को स्वीकार करेंगे कि रचना-प्रक्रिया कहीं न कहीं एक नैसर्गिक प्रक्रिया होती है; लेकिन क्या हम जिसे एक नैसर्गिक प्रेरणा मानकर चल रहे हैं—सच में पूरी तरह प्राकृतिक है? फ़िलहाल ये कुछ बहुत जटिल प्रश्न हैं, जिनका अनुसंधान साहित्य के पंडित करते ही रहते हैं। इस प्रेरणा को बहुत भौतिक अर्थों में एक ख़ास तरह के लोगों के लिए अभिव्यक्ति का साधन माना जा सकता है, जो उनके जीवनानुभव और पारिस्थितिकी से उपजता है। लेकिन उन्हें इस बात का ज्ञान होना कि रचना की तयशुदा विधाएँ हैं, नैसर्गिक नहीं है। यह ज्ञान हमें संस्थाओं द्वारा दिया जाता है—परिवार की संस्था हो, राष्ट्र की संस्था हो या बुद्धिजीवियों और संस्कृति-उद्योग की तमाम संस्थाएँ हों। इस मामले में यह ज्ञान पूरी तरह से ऐतिहासिक और सामाजिक होने के साथ मनोवैज्ञानिक भी है। लेकिन सिर्फ़ इस आधार पर इस ज्ञान को निरस्त नहीं किया सकता जो कि आज सामाजिक-राजनैतिक विमर्शों में एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है।

मेरी यह समझ है कि साहित्य और अन्य सभी दूसरी कलाएँ कभी न कभी एक नैसर्गिक प्रेरणा से पैदा हुई होंगी। आज भी बहुत से कलाकार इस नैसर्गिक प्रेरणा से प्रेरित होते हैं, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कालांतर में सभी कलाएँ संस्थाओं की ग़ुलाम होकर रह गईं। आज के सामाजिक परिदृश्य में आपके कलाकार होने का मापन इससे नहीं किया जाता कि आप कितने नैसर्गिक कलाकार हैं, (हालाँकि क्या चीज़ नैसर्गिक है, इसके निर्धारण में भी बहुत-सी दिक़्क़तें हैं। नैसर्गिकता की परिभाषा भी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित है, लेकिन आप देखेंगे कि संस्थाओं द्वारा निर्धारित मानकों से परे जाकर बार-बार नए कलाकार क्षितिज पर उभरे—अज्ञेय, निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखक संस्थाओं के मानकों के लेखक नहीं हैं, उन्होंने अपने मानक खुद बनाए हैं; लेकिन यहाँ दूसरी दिक़्क़त शुरू होती है—रचनाकारों को नया मानक बना दिया जाता है और मानकों को नए आधार पर नियंत्रित किया जाता है। यह आलसी एकेडमिशियन और पूँजी के भूखे संस्कृति-उद्योग का मिला-जुला षड्यंत्र है…) बल्कि इस बात से किया जाता है कि कला की संस्थाओं और उस संस्था के नीति-निर्धारक, आलोचक आपकी कला को कितना महत्त्व देते हैं या फिर आपकी कलाकृति चाहने वालों की संख्या कितनी है। फिर भी यह मामला उतना स्याह और सफ़ेद नहीं है, जितना उपर्युक्त वाक्यों को पढ़कर लगता है।

कला की संस्थाएँ जो अब एक संस्कृति उद्योग में बदल चुकी हैं—अलग बहस का मुद्दा हैं। यदि आप थियोडोर अडोर्नो के विचारों से अवगत हैं तो समझते होंगे कि किस प्रकार संस्कृति उद्योग का इस्तेमाल आम जनता पर नियंत्रण रखने के लिए किया जाता है।

आज के समय में रचनात्मकता का पूरा समाजशास्त्र संस्कृति उद्योग के आस-पास मँडराता है। आज हम जिस युग में जी रहे हैं, वहाँ अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करने के लिए हमारे पास नए-नए टूल, प्लेटफ़ॉर्म और तंत्र हैं।

मुझे नहीं मालूम मेरी इस बात से कितने लोग सहमत होंगे, बल्कि मैं ख़ुद भी इससे पूरी तरह मुतासिर नहीं हूँ; लेकिन मुझे लगता है कि साहित्य यानी लेखन-विधा अब अपनी आख़िरी साँसें गिन रही है! अब हम दृश्य-कलाओं के युग में जी रहे हैं। किसी कविता को सिर्फ़ टेक्स्ट के रूप में प्रसारित करने और उसके पोस्टर को प्रसारित करने पर यह भेद स्पष्ट दिखाई देता है। लोग तात्कालिकताओं में जीने के आदी हो गए हैं। यहाँ पर यह सवाल करना कि तात्कालिकता सही है या ग़लत—ख़ुद में एक ग़लत सवाल है। तात्कालिकता इस युग का एक सच है, जिसे सिर्फ़ स्वीकार किया जा सकता है। और इसी तात्कालिकता से निकलकर आती है—प्रति-रचनात्मकता।

ऊपरी तौर पर देखने में यह समझ आता है कि सारी रचनात्मकता एक प्रतिक्रिया है, (जो कि है भी) लेकिन हम प्रति-रचनात्मकता जैसे शब्द के लिए तात्कालिकता से उपजी रचनात्मकता को केंद्र में रखेंगे; जैसे किसी राजनीतिक घटना पर दी हुई फ़ौरी प्रतिक्रया, किसी दूसरे लेखक के लिखे हुए पर प्रतिकार में लिखा हुआ साहित्य या किसी का अपमान करते हुए लिखा हुआ साहित्य।

यहाँ पर पोलेमिक्स (Polemics) और प्रति-रचनात्मकता (anti-creativity) में भेद करना आवश्यक है। पोलेमिक्स जहाँ स्थापित विचारों और संस्थाओं को संबोधित करते हुए एक उसके प्रतिकार में महा-आख्यान तैयार करता है, प्रति-रचनात्मकता छोटी-छोटी घटनाओं पर लगातार प्रतिक्रिया-स्वरूप घटित होती है, यूँ तो प्रति-रचनात्मकता भी पोलेमिक्स का हिस्सा है, लेकिन इसमें तात्कालिक प्रतिक्रिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका है; जो विचारात्मक रूप से असंगठित और कमज़ोर होती है। फिर भी ऐसा नहीं है कि प्रति-रचनात्मकता से निकली हुई सभी रचनाएँ व्यर्थ हैं, लेकिन रचना-प्रक्रिया का यांत्रिक हो जाना; हमसे बहुत सारा अनावश्यक, असंगठित और दिशाहीन श्रम कराता है।

आज प्रति-रचनात्मकता का एक पूरा बाज़ार खड़ा हो चुका है। चाहे वह सोशल मीडिया पर उपस्थित साहित्य हो या मीम्स या वीडियो। कैरी मिनाटी और भुवन बाम जैसे लोगों ने अपनी तथाकथित रचनात्मकता से मूर्खों की एक पूरी नस्ल पैदा कर दी है। छोटे स्तर पर बहुत से लोग यही काम कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपने लेखन-कौशल से छोटे-बड़े स्तर पर पाठक हासिल कर लेने वाले लेखकों का भी कमोबेश यही हाल है।

सोशल मीडिया पर सामाजिक न्याय के योद्धाओं ने बौद्धिकता के ख़िलाफ़ एक अलग जंग छेड़ी हुई है, हालाँकि उनकी शिकायत नाजायज़ नहीं है। उनका यह कहना कि रचनात्मक शुद्धतावाद के नाम पर संस्थाओं पर एक वर्ग विशेष का क़ब्ज़ा है, बिल्कुल सच है। इन सभी संस्थाओं पर मध्यवर्गीय हिंदू सवर्णों का एकाधिकार है, जिसके तमाम सामाजिक दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं। इस वर्ग विशेष ने न सिर्फ़ इन संस्थाओं पर क़ब्ज़ा कर रखा है, बल्कि उन्होंने सामाजिक समता के पूरे विमर्श को इस तरह से विकृत कर दिया है कि वे अंततः सत्ता पर क़ाबिज़ रहें और पॉलिटिकल करेक्टनेस भी बरक़रार रहे। यूँ कहें कि सत्ता और विपक्ष ने मिलकर एक ऐसा केऑस तैयार किया है, जिसके प्रभाव से ख़ुद को बचा पाना असंभव लगने लगा है।

सोशल मीडिया के आने से रचनात्मकता का पूरा विद्यमान संस्थागत ढाँचा बदला तो है, जिसे बहुत से लोग रचनात्मकता का लोकतंत्र समझते हैं, लेकिन यह सिर्फ़ इस घटना का एक छोटा-सा पहलू है; इंटरनेट लोकतंत्र ने रचनाओं की ऐसी असीमित भीड़ इकट्ठी कर दी है, हमारे दिमाग़ को इतना अधिक माल सप्लाई करना शुरू कर दिया है कि हम इनकी अधिकता के दबाव से झुककर मर जाएँ। थोक के भाव आने वाली अर्थहीन कविताएँ, फ़ैशनपरस्त पॉलिटिकल करेक्टनेस और मीम्स का अंतहीन प्रवाह हमें एकदम यांत्रिक बना चुका है।

लोग लगातार हँस रहे हैं—लोग चुटकुलों, मीम्स और वीडियो देखकर पागलों की तरह हँसते ही जा रहे हैं। इस सामूहिक हँसी के दृश्य को एक दूरी से देखने पर ऐसा लगता है, मानो पूरी सभ्यता पागलपन का शिकार हो चुकी है। और यह कोई स्वस्थ हँसी भी नहीं है। यह हँसी सिर्फ़ दूसरों का मख़ौल बनाने वाली हँसी है—श्रेष्ठताबोध से उपजी हँसी, दूसरों को ग़लत साबित करने की जल्दबाज़ी वाली हँसी।

एक दृश्य की कल्पना कीजिए जिसमें सभी लोग लगातार दूसरे की ओर उँगली करके एक दूसरे पर हँस रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस दृश्य में सारी हँसी फ़िज़ूल की हँसी है। सामूहिक दृश्य में यह सब एक विचित्र क़िस्म के पागलपन जैसा जान पड़ता है। इस हँसी के अभियंता कई तरह के रचनाकार हैं। ये रचनाकार नहीं हैं। ये प्रति-रचनाकार हैं। ये हमें ठहरकर, सोचने-समझने की शक्ति नहीं देते, प्यार करना नहीं सिखाते, ये हमें सिर्फ़ व्यस्त रखते हैं। ये मनोरंजन की चाह में अंतहीन व्यस्तता वाली सभ्यता का निर्माण करने वाले अभियंता हैं।

यहाँ रचनात्मकता अपनी सच्चाई और झूठ में एक वहम भर है, जिसका सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही उद्देश्य है और वह है सत्ता द्वारा समूची सभ्यता के मनोविज्ञान पर मज़बूत नियंत्रण और इसमें उसे भरपूर सफ़लता हासिल हुई है।

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