यह पुस्तक श्री राहुल सांकृत्यायन जी का एक शोधग्रंथ हैं। इस ग्रंथ में सिद्ध सरहपाद की कविता भोट-भाषा में रूपांतरित है, जिसकी अविकल छाया प्राचीन हिंदी में स्वयं राहुलजी ने प्रस्तुत की है। मूल और छाया के साथ कहीं-कहीं जो पाद-टिप्पणियां हैं और ग्रंथ के अंत में जो परिशिष्ट है,उनसे राहुलजी के कठोर परिश्रम तथा अथक अध्यवसाय का अनुमान किया जा सकता है। उनकी विस्तृत भूमिका के अध्ययन से भी प्राचीन हिंदी के संबंध में अनुसंधान करनेवालों को काफ़ी प्रकाश मिलता है। यह ग्रंथ वस्तुतः हिंदी को राहुलजी की एक अपूर्व देन है।